सुभाष धूलिया
अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इस्लामी दुनिया का दिल जीतने के लिए नई पहल के साथ अपनी पारी की शुरुआत की थी लेकिन अभी हाल ही में उन्होंने कहा है कि ‘हिंसक उग्रवाद’ के खिलाफ अमेरिका का संघर्ष केवल अफगानिस्तान और पाकिस्तान तक ही सीमित नहीं रहेगा। इसके तत्काल बाद यमन में एक अमेरिकी विमान को उड़ाने के विफल प्रयास के बाद अमेरिका ने यमन के तथाकथित अलकायदा के ठिकानों पर हवाई हमले किए जिनमें अनेक निर्दोष लोग मारे गए। 9/11 के आतंकवादी हमलों के उपरांत अमेरिका ने ‘आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक युद्ध’ छेड़ने की घोषणा की थी अब यह ‘हिंसक उग्रवाद के खिलाफ संघर्ष’ के रूप में पारिभाषित हो चुका है। लेकिन धरातल की वास्तविकता तो यही है कि यह संघर्ष इस्लामी दुनिया में एक बड़े युद्ध या कई युद्धों का रूप धारण करता चला जा रहा है।
अमेरिकी हमले सउदी अरब की सीमा से लगे यमन के शिया बहुल प्रांत में किए गए। इसके साथ ही यमन की अमेरिकीपरस्त तानाशाही सरकार ने भी अल कायदा के गढ़ों को ध्वस्त करने के लिए सैनिक अभियान छेड़ दिया है। इस अभियान में सउदी अरब की अमेरिकी पिठ्ठू सामंती सत्ता ने भी इस प्रांत में सैनिक कार्रवाईयां की हैं। मिस्त्र भी इस टकराव में कूद पड़ा है और सऊदी अरब के साथ इसने भी यमन में इस इस्लामी उग्रवाद के लिए ईरान को दोषी ठहराया है।
इस दृष्टि से ये घटनाक्रम एक छोटे से देश यमन के एक प्रांत में सैनिक कार्रवाई तक ही सीमित नहीं रह गया है बल्कि एक ओर अमेरिका और उसके समर्थक स्वयं यमन सरकार, सऊदी अरब और मिस्त्र और दूसरी ओर विरोधी ईरान भी इस टकराव से संबंद्ध हो गए हैं। यमन पर अमेरिका के हवाई हमले ऐसे समय में हुए हैं जब अफगानिस्तान में अमेरिका ने 30 हजार और सैनिक तैनात कर दिये हैं और पाकिस्तान की अफगानिस्तान से लगी सीमा पर विशेष दस्तों की गुप्त कार्रवाईयों के अलावा चालकविहीन विमान (ड्रोन) के हमले भी तेज हो गए हैं।
एक ओर तो अफगानिस्तान की स्थिति संभाले नहीं संभल रही है और दूसरी ओर पाकिस्तान पर बढ़ रहे हमलो से पाकिस्तान के भीतर भी नाजुक स्थिति पैदा हो रही है। साथ ही अमेरिका ने पाकिस्तान ने इस समय एक नई तरह की सैनिक उपस्थिति कायम कर ली है और अपने प्रतिष्टठानों की सुरक्षा के नाम पर एक निजी सुरक्षा एजेंसी ‘ब्लैकवाटर’ के दस्ते भी तैयार कर लिए हैं। दरअसल ब्लैकवाटर अमेरिकी की एक ऐसी निजी सुरक्षा एजेंसी है जिसे अमेरिकी सुरक्षातंत्र के अत्यंत प्रशिक्षित सेनानिवृत सुरक्षाकर्मी चलाते हैं। इसकी सैनिक और खुफिया क्षमता अमेरिकी एजेंसियों से किसी भी मायने में कम नहीं है। इराक और कई अन्य देशों में हिंसक कार्रवाईयों के लिए ये संस्था पहले ही काफी बदनाम हो चुकी है। अमेरिका ने इस एजेंसी के दस्तों को समय-समय पर ऐसे दशों में तैनात किया जिनमें अमेरिका प्रत्यक्ष रूप से युद्द में शामिल नहीं हो या किन्हीं अन्य कारणों से अमेरिकी सैनिकों की तैनाती का मसला संवेदनशील रहा है- पाकिस्तान भी इस श्रेणी के देशों में आता है। पाकिस्तान का सत्तातंत्र पहले ही ही अस्त-व्यस्त है और ऐसे में अमेरिका की इन कार्रवाईयों से इस पर संकट के नए बादल मंडरा रहे हैं।
पाकिस्तान में ऐसे समय में सत्ता के अनेक केन्द्र पैदा हो गए हैं जब इसे एक केन्द्रीकृत मजबूत सरकार की सबसे अधिक जरूरत है। राष्ट्रपति जरदारी के बारे में आम धारणा यह है कि वह अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए अमेरिका को रिझाने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं। यहां तक कि पाकिस्तान के सुरक्षातंत्र को एक तरह से अमेरिका के हवाले कर दिया है। उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान को अमेरिका से मिल रही अरबों डॉलर की मदद में एक शर्त यह भी है कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई और पाकिस्तानी सेना को यह प्रमाणपत्र देना होगा कि वे आतंकवाद के खिलाफ मजबूती से लड़ रहे हैं। अमेरिकी की इन तमाम तरह की दखल से अमेरिक –विरोधी रुझान प्रबल हो रहे हैं। ऐसे में पाकिस्तानी सत्ता के लोकप्रिय समर्थन में भारी ह्रास हो रहा है और इससे ‘सीमित पाकिस्तानी लोकतंत्र’ का भविष्य खतरे में पड़ता नजर आ रहा है।
अब ‘हिसंक उग्रावाद’ के खिलाफ अमेरिकी संघर्ष युद्ध इराक, अफगानिस्तान और पाकिस्तान तक ही सीमित नहीं रह गया है बल्कि यमन तक इसका विस्तार हो गया है और सउदी अरब और मिस्त्र भी इसमें कूद पड़े हैं। ईरान पहले ही अमेरिका के निशाने पर है और तमाम संकेत यही हैं कि ईरान नाभिकीय प्रोद्योगिकी विकसित करने के अपने कार्यक्रम से पीछ नहीं हटेगा और ऐसे में ईरान पर अमेरिकी-इजराइल हमला निश्चित सा जान पड़ता है। ईरान की नाभिकीय क्षमता को ध्वस्त किया जा सकता है और ऐसा नहीं भी होता और यह चन्द नाभिकीय हथियार विकसित भी कर लेता है तो भी इससे कहीं अधिक चिंता का विषय पाकिस्तान है जिसके पास अपेक्षातया कहीं बड़ा नाभिकीय हथियारों का जखीरा है। ईरान के अलावा अल्जीरिया, सूडान, सीरिया और सोमालिया अमेरिका के हिट लिस्ट में शामिल हैं।
इराक पर अमेरिका ने ‘लोकतंत्र और स्वतंत्रता’ के नाम पर हमला किया था और तत्कालीन अमेरिकी प्रशासन पर नव-अनुदारवादी इस कदर हावी थे कि उन्होंने सैनिक अभियान के बल पर इस्लामी दुनिया को ‘आधुनिक और लोकतांत्रिक’ बनाने का बीड़ा उठा लिया। इस अभियान में अमेरिका को उन सैनिक हितों औऱ आर्थिक हितों का भी पूरा समर्थन मिला जो इस क्षेत्र के तेल संसाधनों पर नियंत्रण कायम करना चाहते थे। लेकिन आज स्थिति यह है कि लोकतंत्र तो दूर की बात रही इराक और अफगानिस्तान तो एक देश के रूप में भी विखंडित हो चुके हैं।आज पाकिस्तान के लोकतंत्र का भविष्य भी अंधकारमय है। अमेरिका के सहयोगी यमन और सउदी अरब में सामंती तानाशाहियां राज करती हैं। दुनिया के इस भूभाग में लोकतंत्र का अकाल है और इस कारण अमेरिकी समर्थक और विरोधी दोनों ही श्रेणी के देशों में धार्मिक उग्रवाद का सामाजिक और राजनीतिक आधार विस्तृत हो रहा है। अमेरिका के सैनिक अभियान से रही-सही उदार लोकतांत्रिक और राजनीतिक धाराएं भी तबाह हो रही हैं। ‘लोकतंत्र और स्वतंत्रता’ का अमेरिकी अभियान विजय की दिशाहीन खोज में बर्बर तानाशाही सत्ताओं पर ही निर्भर होता चला जा रहा है।
Thursday, 24 February 2011
Wednesday, 23 February 2011
समकालीन वैश्विक मीडिया : सूचना का अंत और मनोरंजन आगमन
सुभाष धूलिया
तानाशाहियों की तुलना में मुक्त समाजों में सेंसरशिप असीमित रूप से कही अधिक परिष्कृत और गहन होती है क्योंकि इस से असहमति को चुप कराया जा सकता है और प्रतिकूल तथ्यों को छिपाया जा सकता है- जोर्ज ऑरवेल
आज की दुनिया औपचारिक रूप से अधिक लोकतान्त्रिक है लेकिन फिर भी लोगों को लगता है की उनके समाज के बुनियादी फैसले अधिकाधिक उनके नियंत्रण से बाहर होते जा रहे हैं- रॉबर्ट मैकचेस्नी
पिछले तीन दशकों में मानव विकास की दिशा और दशा मैं बुनियादी परिवर्तन आये हैं । समाज पर व्यापार के आधिपत्य की नवउदारवादी विचारधारा आज विश्व राजनीति के केंद्र में हैं । नवउदारवाद का आधार एक उपभोक्ता समाज और विश्व को एक बाज़ार में तब्दील कर देना है । एक ऐसे समाज का निर्माण है जिस पर व्यापार का प्रभुत्व हो इस तरह की व्यवस्था कायम करने मैं मीडिया की केंद्रीय भूमिका है । अस्सी-नब्बे के दशक की कुछ घटनाओं ने राजनीतिक, आर्थिक और सूचना संचार की अंतर्राद्गट्रीय व्यवस्थाओं को एक तरह से फिर से परिभाषित कर दिया जिससे विश्व राजनीति के चरित्र और स्वभाव में बड़े परिवर्तन आए।
अस्सी के दशक में विकास के सोवियत समाजवादी मॉडल के चरमराने की प्रक्रिया शुरू हुई और 1991 में सोवियत संघ का अवसान हुआ। इस घटना को पश्चिमी उदार लोकतंत्र और मुक्त अर्थव्यवस्था की विजय के रूप में देखा गया। इसी दशक में सूचना क्रांति ने भी बेमिसाल ऊँचाइयां हासिल की और इसी के समांतर दुनिया भर में मुक्त अर्थव्यवस्था की ओर उन्मुख आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया भी शुरू हुई। शीतयुद्धकालीन वैचारिक राजनीति के अवसान के उपरांत नवउदारवादी भूमंडलीकरण से एक नए व्यापारिक मूल्यों और एक नयी उपभोक्ता संस्कृति का उदय हुआ। इन सबका जबरदस्त प्रभाव जनसंचार माध्यमों पर भी पड़ा। जनसंचार माध्यम काफी हद तक इस प्रक्रिया का हिस्सा बन गये और राजनीतिक और व्यापारिक हितों के अधीन होते चले गए। व्यापारीकरण की यह प्रक्रिया आज अपने चरम पर है। भले ही विभिन्न देशों और विभिन्न समाजों में इसका रूप-स्वरूप कितना ही भिन्न क्यों न हो।
शीतयुद्ध के बाद दो विचारधाराओं के बीच संघर्ष का अंत हो गया। पश्चिम की पूंजीवादी विचारधारा ही प्रभुत्वकारी बन गयी और इसका कोई वास्तविक रूप से प्रभावशाली विकल्प नहीं उभर पाया। इन कारणों से शैली की पश्चिमी उदार लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था, आर्थिक स्तर पर मुक्त अर्थतंत्र और नवउदारवादी भूमंडलीकरण- यही आज की विश्व व्यवस्था के मुखय स्तंभ हैं। राजनीतिक अर्थव्यवस्था के इस स्वरूप के अनुरूप ही सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्य ढल रहे हैं इसलिए यह कहा जा सकता है कि मौजूदा विश्व व्यवस्था में पश्चिमी जीवन शैली और सांस्कृतिक मूल्यों का ही विस्तार हो रहा है और वैश्विक मीडिया इसमें अग्रणी भूमिका अदा कर रहा है। सांस्कृतिक समरूपीकरण प्रक्रिया को जन्म दे रहा है । राजनैतिक स्तर पर यह पश्चिमी उदार लोकतंत्र, आर्थिक स्तर पर मुक्त आर्थिक व्यवस्था और सांस्कृतिक स्तर पर पश्चिमीकरण की प्रक्रिया दिनोदिन तेज़ होती जा रही है. एक बहुरंगी और विविध दुनिया को समरूप बनकर एक वैश्विक सुपर मार्केट में तब्दील होती प्रतीतं होती है ।
इस संदर्भ में सांस्कृतिक उपनिवेशवाद की अवधारणा भी नया स्वरूप ग्रहण कर रही है और आज यह पहले से कहीं अधिक व्यापक, गहरी और विशालकाय हो चुकी है। वैच्च्िवक सूचना और संचार तंत्र पर आज पश्चमी देशों का नियंत्रण और प्रभुत्व उससे कहीं अधिक मजबूत हो चुका है जिसे लेकर कुछ दशक पहले विकासशील देशों में विरोध के प्रबल स्वर उठ रहे थे। नयी विश्व व्यवस्था ने विकासशील देशों की उन तमाम दलीलों को ठुकरा दिया जो उन्होंने विश्व में एक नयी सूचना और संचार व्यवस्था कायम करने के लिए छठे और सातवें दच्चक में पेश की थीं और जिन्हें 1980 में यूनेस्को में मैक्ब्राइड कमीच्चन की रिपोर्ट के रूप में एक संगठित अभिव्यक्ति प्रदान की। विकासशील देश विश्व में सूचना और समाचारों के प्रवाह में संतुलन की मांग करे रहे थे लेकिंग नयी विश्व व्यवस्था में एकतरफI प्रवाह ही अधिक तेज़ हो गया . इसी दौरान सूचना क्रांति एक ऐसी मंजिल तक पहुंच चुकी थी जिसमें दूरसंचार, सेटेलाइट और कंप्यूटर प्रौद्योगिकी के बल पर एक ऐसे तंत्र का उदय हुआ जिसमें सूचना समाचारों के प्रवाह पर किसी भी तरह का अंकुच्च लगाना संभव ही नहीं रह गया। विकासच्चील देच्च सूचना-समाचारों के लिए एकतरफा प्रवाह की च्चिकायत करते थे उसका आवेग इस नये दौर में अब पहले से कहीं अधिक तेज हो गया और इसे रोक पाना वास्तविक रूप से संभव नहीं रह गया था।
शीत युद्ध के बाद उभरी विश्व व्यवस्था में विकासशील देशों सामूहिक सौदेबाजी की क्षमता क्षीण हो गयी है। गुटनिरपेक्ष आंदोलन और विकासशील देशों के अन्य संगठन या तो अपना अर्थ खो बैठे या अप्रसांगिक हो गए। इसका मुख्य कारण यह था कि विकासशील देशों में इस मांग को उठाने वाले अधिकांच्च देच्चों ने आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था के मॉडल का रास्ता छोड़कर नवउदारवादी भूमंडलीकरण का रास्ता अपना लिया था।
विकासशील देशों सरकारों के स्तर पर इस तरह के प्रभुत्व का कोई प्रतिरोध न होने के कारण एक सीमा तक यह प्रतिरोध धार्मिक कट्टरपंथ जैसे नकारात्मक रूपों में अभिव्यक्त हो रहा है। नयी विश्व व्यवस्था राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से पश्चिम का दबदबा है और वैश्विक मीडिया को भी यही नियंत्रित करता है। मीडिया पर नियंत्रण का मतलब किसी भी व्यक्ति, देश , संस्कृति, समाज आदि की छवि पर भी नियंत्रण करना है । मीडिया ऐसे मूल्य और मानक तय करता है जिनसे सही-गलत, सभ्य- असभ्य के पैमाने निर्धारित होते हैं। इसी निर्धारण से सांस्कृतिक उपनिवेशवाद की सीमा शुरू होती है।
नब्बे के दशक में दुनिया भर में नवउदारवादी आर्थिक सुधारों का दौर शुरू हुआ। इस दौरान निजीकरण और नयी प्रौद्योगिकी की मदद से उत्पादकता और कुशलता में तेज इजाफा हुआ। निजी क्षेत्र का उद्योग नयी प्रौद्योगिकी को आत्मसात करने में अधिक गतिच्चील साबित हुआ और जिसकी वजह से इसकी उत्पादकता और कुशलता में भारी वृद्धि हुई और संपति के सृजन की इसकी क्षमता नये आसमान छूने लगी। इसी दौरान सार्वजनिक क्षेत्र पर टिकी अर्थव्यवस्था जड ता का च्चिकार होती चली गयी और चंद अपवादों को छोड कर सार्वजनिक प्रतिद्गठान आर्थिक रूप से टिकाऊ साबित नहीं हो सके।
उदारीकरण और निजीकरण के इस दौर में आर्थिक समृद्धि का एक बड़ा उफान आया और एक नया वर्ग पैदा हुआ जिसके पास अच्छी खासी क्रय द्राक्ति थी और यह पारंपरिक मध्यमवर्ग की तुलना में कहीं बड ा उपभोक्ता था। आज जो उपभोक्ता क्रांति देखने को मिल रही है उसका झंडाबरदार यही वर्ग है। यह उपभोक्ता क्रांति अभी जारी है और एक नये दौर की मीडिया क्रांति इसी वर्ग पर टिकी है। इस नये बाजार के उदय के बाद अन्य उपभोक्ता उत्पादों के साथ-साथ मीडिया उत्पादों की मांग में भारी वृद्धि हुई। मीडिया उत्पादों के वैश्विक प्रवाह के बाधाविहीन बनने के बाद एक नए तरह का सूचना और संचार का प्ररिदृश्य पैदा हुआ है। समाज के नए-नए तबके मीडिया बाजार में प्रवेश कर रहे हैं और अपनी क्रय शक्ति के आधार पर मीडिया उत्पादों के उपभोक्ता बन रहे हैं।
सूचना की इस क्रांति के उपरांत दुनिया में जितना संवाद आज हो रहा है वो बेमिसाल हैं लेकिन इस इस संवाद का आकार जितना बड़ा है इसकी विषयवस्तु उतनी हे सीमित होती जा रही है। लोग अधिकाधिक मनोरंजित होते जा रहे हैं और अधिकाधिक कम सूचित/जानकर होते जा रहे हैं । इसी दौरान लोकतांत्रिक राजनीति के चरित्र में ही भारी बुनियादी परिवर्तन आए और इसी के अनुरूप मीडिया तंत्र के साथ इसके संबंध पुनः परिभाषित हुए। विश्व भर में आर्थिक विकास से उपभोक्ताओं की नयी पीढ का का उदय हुआ। इससे मीडिया के लिए नये बाजार पैदा हुए और इस बाजार में अधिक से अधिक हिस्सा पाने के लिए एक नयी तरह की बाजार होड पैदा हुई।
दरअसल नवउदारवादी भूमंडलीकरण की मौजूदा प्रक्रिया एक ''टोटल पैकेज'' है जिसमें राजनीति, आर्थिक और संस्कृतिक तीनों ही पक्ष शामिल हैं। मीडिया नयी जीवन शैली और नये मूल्यों का इस तरह सृजन करता है जिससे नये उत्पादों की मांग पैदा की जा सके और एक बाजार का सृजन किया जा सके। अनेक अवसरों पर मीडिया ऐसे उत्पादों की भी मांग पैदा करता है जो स्वाभाविक और वास्तविक रूप से किसी समाज की मांग नहीं होते हैं।
मीडिया और मनोरंजन उद्योग का तेजी से विस्तार इसी उपभोक्ता क्रांति के बल पर हो रहा है। इन रूझानों के चलते 1990 के दशक में मीडिया के व्यापारीकरण का नया दौर शुरू हुआ जिसकी गति और आकार अपने आप में बेमिसाल थी। इस दौर में मीडिया व्यापार की ओर अधिकाधिक झुकता चला गया और सार्वजनिक हित की पूर्ति करने की इसकी भूमिका ह्रास हुआ। मीडिया अब सार्वजनिक-व्यापारिक उद्यम से हटकर व्यापारिक-सार्वजनिक उद्यम बन गया जिसे व्यापारिक हित ही संचालित करतें हैं । आज मीडिया के व्यापारीकरण की यह प्रक्रिया अपने चरम पर है।
सूचना क्रांति से एक ऐसे वैश्विक गाँव का उदय हुआ जो दुनिया के सम्पनों के एकीकरण से जन्मा है । सूचना समाचारों और इस तरह के मीडिया उत्पदों का प्रवाह बाधाविहीन होने के उपरांत वैश्विक मीडिया के स्वरूप में भी बडा परिवर्तन आया। पहले वैश्विक मीडिया विश्व भर में सूचना और समाचारों के प्रवाह का नियंत्रण करता था लेकिन उसका काफी हद तक एक देश के भीतर इसका सीधा नियंत्रण नहीं होता था, यानी नियंत्रण का स्वरूप अप्रत्यक्ष था और ये संगठनों के माध्यम से उस देश के ही घरेलू बाजार में मीडिया उत्पाद वितरित करते थे। लेकिन आज वैश्विक मीडिया का प्रसार देश की सीमा के भीतर तक हो चुका है जहां वह प्रत्यक्ष रूप से मीडिया के बाजार में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें तमाम राजनितिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दीवारें ढह रहीं हैं जो परंपरागत रूप से एक तरह के सुरक्षा कवच का काम करतीं थीं ।
मीडिया का निगमीकरण
समकालीन मीडिया के निगमीकरण , केंद्रीकरण और विकेंद्रीकरण की प्रक्रियाएं एक साथ चल रही हैं। मीडिया संघटन एक तो खुद व्यापारिक निगम बन गए हैं और दूसरी और पूरी तरह विज्ञापन उद्योग पर निर्भर हैं । एक ओर तो नई प्रौद्योगिकी और इंटरनेट ने किसी भी व्यक्ति विशेष को अपनी बात पूरे अंतर्राद्गट्रीय समुदाय तक पहुंचाने का मंच प्रदान किया है, तो दूसरी ओर मुखयधारा मीडिया में केंद्रीकरण की प्रक्रिया भी तेज हुई है। पूरे विश्व और लगभग हर देश के भीतर मीडिया का केंद्रीकरण हो रहा है। एक ओर तो मीडिया का आकार विशालकाय होता जा रहा है और दूसरी ओर इस पर स्वामित्व रखने वाले निगमों की संखया कम होती जा रही है। पिछले कुछ दशकों से यह प्रक्रिया चल रही है और अनेक बड़ी मीडिया कंपनियों ने छोटी मीडिया कंपनियों का अधिग्रहण कर लिया है। इसके अलावा कई मौकों पर बड़ी - बड़ी कंपनियों के बीच विलय से भी मीडिया के केंद्रीकरण को ताकत मिली है।
आज वैश्विक संचार और सूचनातंत्र पर चंद विशालकाय बहुराष्ट्रीय मीडिया निगमों का प्रभुत्त्व है जिनमें से अधिकांच्च अमेरिका में स्थित हैं। बहुराष्ट्रीय मीडिया निगम स्वयं अपने आप में व्यापारिक संगठन तो हैं ही लेकिन इसके साथ ही ये सूचना-समाचार और मीडिया उत्पाद के लिए एक वैश्विक बाजार तैयार करने और एक खास तरह के व्यापारिक मूल्यों के प्रचार-प्रसार के लिए ही काम करते हैं। इन बहुराष्ट्रीय निगमों के इस व्यापारिक अभियान में स्वायत पत्रकारिता और सांस्कृतिक मूल्यों की कोई अहमियत नहीं होती। इस रुझान को आज राद्गट्रीय और अंतर्राष्टीय स्तर पर स्पष्ट रूप में देखा जा सकता है। मोटे तौर पर यह कह सकते हैं कि वैश्विक मीडिया वैश्विक व्यापार के अधीन ही काम करता है और दोनों के उद्देश्य एक-दूसरे के पूरक होते हैं।
पूरी वैश्विक मीडिया व्यवस्था पर इस वक्त मुश्किल से नौ-दस मीडिया निगमों का प्रभुत्त्व है और इनमें से अनेक निगमों का एक-तिहाई से भी अधिक कारोबार अपने मूल देशों से बाहर दूसरे देशों में होता है। उदाहरण के लिए रूपर्ट मर्डोक की न्यूज कॉर्पोरेच्चन का अमेरिका, कनाडा, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, एशिया और लैटिन अमेरिका में मीडिया के एक अच्छे-खासे हिस्से पर स्वामित्व है। जर्मनी के बर्टैल्समन्न निगम का विश्व के 53 देशों की 600 कंपनियों में हिस्सेदारी है। विच्च्व की सबसे बड़ी मीडिया कंपनी एओएल टाइम वार्नर भी अमेरिका की है और विश्व की दूसरी सबसे बडी कंपनी वियाकॉम कंपनी भी अमेरिका की है जिनका विश्व के मीडिया बाजार के एक बडे हिस्से पर नियंत्रण है। सोनी निगम इलेक्ट्रॉनिक्स के उत्पादों में नाम कमा चुका था लेकिन आज एक मीडिया कंपनी के रूप में दुनिया भर में इसकी एक हजार सहयोगी कंपनियां काम कर रही हैं। इनके अलावा डिज नी वियाकॉम, एमटीवी, टेली-कम्युनिकेच्चन इंक, यूनिवर्सल (सीग्राम), माइक्रोसॉफ्ट, गूगल और याहू का भी एक बडे बाजार पर कब्जा है जो लगभग दुनिया के हर देश में फैला हुआ है। अमेरिका की जनरल इलेक्ट्रिक जैसी हथियार बनाने वाले निगम ने भी मीडिया जगत में अपनी उपस्थिति दर्ज कर दी है और अमेरिका के एक प्रमुख समाचार चैनल एनबीसी पर इसका नियंत्रण है।
इन विशालकाय निगमों के बाद दूसरे स्तर के भी मीडिया संगठन हैं जिनका व्यापार दुनिया भर में बढ रहा है। इस वक्त विश्व में मीडिया और मनोरंजन उद्योग सबसे तेजी से उभरते सैक्टरों में से एक है और रोज नयी-नयी कंपनियां अपना नया और अलग मीडिया उत्पाद लेकर बाजार में कूद रही हैं। अधिकांच्च बहुराष्ट्रीय मीडिया निगम संचार के क्षेत्र से जुडे कई क्षेत्रों में काम कर रहे हैं जिनमें समाचारपत्र और रेडियो और टेलीविजन चैनल के अलावा पुस्तक प्रकाशन , संगीत, मनोरंजन पार्क और अन्य तरह के मीडिया और मनोरंजन उत्पाद शामिल हैं। प्रौद्योगिक क्रांति ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपनी गतिविधियों के विस्तार के लिए अपार संभावनाओं को जन्म दिया है। आज अधिकांच्च बडे मीडिया निगम दुनिया भर में अपनी गतिविधियां चला रहे हैं।
अनेक निगमों ने या तो किसी देच्च में अपनी कोई सहयोगी कंपनी खोल ली है या किसी देश कंपनी के साथ साझेदारी कर ली है। हमारे देश देश में ही अनेक बहुराष्ट्रीय मीडिया निगम के भारतीय संस्करण बाजार में उपलब्ध हैं। ये निगम अपनी गतिविधियों के विस्तार के लिए स्थानीयकरण की ओर उन्मुख हैं और स्थानीय जरूरतों और रुचियों के अनुसार अपने उत्पादों को ढाल रहे हैं। इस तरह भूमंडलीकरण स्थानीयता का रूप ग्रहण कर रहा है और बहुराद्गट्रीय निगमों की यह स्थानीयता दरअसल उपभोक्त मूल्यों और व्यापार संस्कृति को प्रोत्साहित करते हैं। मीडिया के इस तरह के केन्द्रीयकरण से के ऐसा बाज़ार पैदा हुआ है जिसमें विविधता ख़त्म हो रही है और हर मीडिया में एक ही तरह के समाचार (उत्पाद) छाए रहतें हैं। आज विषयवस्तु का बाज़ार मूल्य अहम् नहीं रह गया है बल्कि इसे बेचने वाला तंत्र अधिक भूमिका निभा रहा है। आज का मीडिया एक ओर तो वैश्विक व्यापार-वित्त के फैलाव के रास्तों का निर्माण कर रहा है और दूसरी और खुद भी एक व्यापार बन गया है ।
राजनीतिक, सामाजिक और संस्कृतिक जीवन का मनोरंजनीकरण
मीडिया उद्योग एक तरह के सांस्कृतिक और वैचारिक उद्योग हैं। इन उद्योगों पर नियंत्रण का अर्थ होता है किसी देश की राजनीति और संस्कृति पर नियंत्रण. दुनिया के अनेक देशों में अमेरिकी सांस्कृतिक आक्रमण को लेकर असंतोष पनप रहा है जिनमें केवल विकासशील देश ही नहीं बल्कि यूरोप के अनेक विकसित देश भी शामिल हैं. नव उदारवादी भूमंडलीकरण के झंडावरदार विश्व व्यापार संगठन में यह मांग भी उठाई गई थी की इन संस्कृति को व्यापार से अलग रखा जाए लेकिन इसे स्वीकार नहीं किया गया और आज विचार और संस्कृति दोनों ही व्यापार के अधीन दिखाई पड़ते हैं.
व्यापरिकृत मीडिया मुनाफे से संचालित होता है. मुनाफे को अधिकतम स्तर पर पहुँचने ले लिए बाज़ार की होड़ पैदा हुयी । इसके कारण एक नरम (सॉफ्ट) मीडिया का उदय हुआ है जो कडे-कठोर विषयों का नरमी से पेश कर लोगों को रिझाना चाहता है और कुल मिलाकर इस तरह गंभीर राजनीतिक विमर्श ह्रास हो रहा है। इस बाजार होड के कारण मीडिया उन उत्पादों की ओर झुकने लगा जो व्यापक जनसमुदाय को आकृष्ट कर सकें। यह मीडिया तंत्र पर उन वैश्विक ताकतों का नियंत्रण है जो अपने व्यापारिक एजेंडा थोपने के लिए राजनीतिक, सामाजिक और संस्कृतिक जीवन के हर पक्ष का मनोरंजनीकरण कर रहे हैं। आज विज्ञानं से लेकर खेल तक हर चीज मनोरंजन है
बाजार को हथियाने की होड़ में 'इन्फोटेनमेंट' नाम के नये मीडिया उत्पाद का जन्म हुआ है जिसमें सूचना के स्थान पर मनोरंजन को प्राथमिकता मिलती है। इसके तहत सूचना की विद्गायवस्तु बौद्धिक स्तर पर इतनी हल्की और मनोरंजक बना दी जाती है कि वह एक विच्चाल जनसमुदाय को आकृष्ट कर सके। मनोरंजन से अधिक लोगों को आकृष्ट किया जा सकता है लेकिन अत्यधिक मनोरंजन से सूचना के तत्त्व का ह्रास होता है ओर इस प्रक्रिया में मीडिया लोगों को सूचना देने के बजे उन्हें लुभाकर विज्ञापनदाताओं के हवाले करता है ।अनेक अवसरों पर इस तरह के समाचार और समाचार कार्यक्रम पेच्च किये जाते है कि वे लोगों का ध्यान खींच सकें भले ही साख और विश्वनीयता के स्तर पर वे कार्यक्रम खरे न उतरते हों।
नव-उदारवादी अर्थव्यवस्था के उदय के उपरांत उपभोक्ता की राजनीति और उपभोक्तावादी संस्कृति का उदय हुआ और इसका सीधा असर समाचारों पर पड़ा। नव-उदारवादी अर्थव्यवस्था में नये-नये उपभोक्ता उत्पाद बाजार में आए और इनको बेचने के लिए नयी-नयी मीडिया तकनीकों का इस्तेमाल किया गया जिसके परिणामस्वरूप 'सेलेब्रिटी लाइफस्टाइल' पत्रकारिता का उदय हुआ। एक नये मेट्रो बाजार का उदय हुआ और इसके अनुरूप नये-नये उपभोक्ता उत्पादों की बाढ -सी आ गयी लेकिन देर सवेर इस बाजार और इस बाजार की मांग में ठहराव आना स्वाभाविक है। इस स्थिति में बााजार और समाचार के संबंध भी प्रभावित होंगे।
इसके साथ ही 'पॉलिटिकॉटेनमेंट' की अवधारणा का भी उदय हुआ है जिसमें राजनीति और राजनीतिक जीवन पर मनोरंजन उद्योग हावी हो रहा है। राजनीति और राजनीतिक जीवन के विद्गायों का चयन, इनकी व्याखया और प्रस्तुतीकरण पर मनोरंजन के तत्व हावी होते चले जा रहे हैं। कई मौकों पर बडे राजनीतिक विषयों को सतही रूप से और तमाशे के रूप में पेश किया जाता है और आलोचनात्मक होने का आभास भर पैदा कर वास्तविक आलोचना किनारे कर दी जाती है। कई अवसरों पर टेलीविजन के परदे पर प्रतिद्वंदी राजनीतिज्ञों की बहसों का इस दृद्गिट से मूल्यांकन करें तो यह तमाशा ही अधिक नज र आता है। इन बहसों में वास्तविक विषयों और विभिन्न राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य नदारद रहते हैं। इस तरह के कार्यक्रम बुनियादी राजनीति मदभेदों के स्थान पर तू तू-मैं मैं के मनोरंजन की ओर ही अधिक झुके होते हैं। इससे अनेक बुनियादी सवाल पैदा होते हैं और राजनीति के इस सतहीकरण और एक हद तक विकृतीकरण से लोकतंत्र के हृास का आकलन करना जरूरी हो जाता है।
व्यापारीकरण के उपरांत राजनीतिक जीवन और राजनीतिक मुद्दों के सतहीकरण और मनोरंजनीकरण का रुझान प्रबल हुआ है। राजनीति और राजनीतिक जीवन के सतहीकरण की इस प्रक्रिया का सबसे बड़ा हथियार सेलेब्रिटी संस्कृति का उदय है। सेलीब्रिटीज का राजनीति में प्रवेच्च हो रहा है जिससे राजनीतिज्ञ सेलेब्रिटीज बन रहे हैं। सेलेब्रिटी संस्कृति की वजह से राजनीतिक विमर्च्च के संदर्भ में एक नये टेलीविजन का उदय हुआ है। इससे वास्तविक मुद्दों को दरकिनार कर सतही मुद्दों पर जोर दिया जाता है और कई अवसरों पर तो गैर-मुद्दे भी मुद्दे बना दिए जाते हैं। गैर-मुद्दों को मुद्दा बना देने का रुझान का कुछ विचित्र आयाम ग्रहण कर रहा है।
व्यापारीकरण और उपभोक्ता संस्कृति के समानांतर एक नई राजनीतिक संस्कृति का भी उदय हुआ है जिसमें पत्रकारिता और पत्रकार अपनी स्वायतता काफी हद तक खो चुकें हैं और व्यापारिक हितों के अधीन होने को वाध्य हैं । इस कारण उपभोक्ताओं को आकृष्ट करने की होड में समाचारों को मनोरंजन के तत्वों का विस्तार होता जा रहा है और किसी तरह के भी पत्रकारीय प्रतिरोध का स्पेस सीमित हो गया है । मीडिया के जबरदस्त विस्तार और चौबीसों घंटे चलने वाले चैनलों के कारण भी समाचारों की मांग बेहद बढ गयी जिसकी वजह से ऐसी अनेक घटनाएं भी समाचार बनने लगी जो मुखयधारा की पत्रकारिता की कसौटी पर खरी नहीं उतरती थी।
शीत युद्ध के दौरान विचारधारात्मक राजनीतिक संघर्ष समाचारों के केंद्र में होते थे और लोगों की इनमे रूचि भी होती थे क्योंकि इनका परिणाम उनके जीवन और भविष्य को प्रभावित करता था । विकास की गति बढ ने से ऐसे सामाजिक तबकों का उदय हुआ जो उन तमाम मुद्दों के प्रति उदासीन होते चले गए जो इससे पहले तक ज्वलंत माने जाते थे और क्योंकि व्यापारित मीडिया का सरोकार इसी तबके से था इसलिए इसकी रुचियों तक ही मीडिया सीमित होता चला गया और वे समाचार हासिये पर जाते चले गए जिनका समाज के व्यापक तबकों से सरोकार था। इसी के समानांतर अतिरिक्त क्रय शक्ति वाले सामाजिक तबके के विस्तार के कारण मीडिया के व्यापारीकरण का दौर भी शुरू हुआ। यह नया तबका ही बाजार था और इस बाजार ने एक नया सामाजिक माहौल पैदा किया जिसमें 'ज्वलंत' समाचार 'ज्वलंत' नहीं रह गये और एक तरह की अराजनीतिकरण की प्रक्रिया द्राुरू हुई। अराजनीतिकरण की यह प्रक्रिया समाचारों से शुरू हुई और फिर स्वयं समाचारों के चयन को ही प्रभावित करने लगी।
इस कारण भी समाचारों का मूल स्वभाव और चरित्र प्रभावित हुआ और व्यापारीकरण की गति तेज हुई। लेकिन व्यापारीकरण की इस प्रक्रिया के प्रभाव और परिणामों के संदर्भ में विकसित और विकासशील देशों के बीच एक बड़ा बुनियादी अंतर है। विकसित देशों में व्यापारीकरण की यह प्रक्रिया तब द्राुरू हो गयी जब लगभग पूरा समाज ही विकास का एक स्तर हासिल कर चुका था। लेकिन विकासशील देशों में विकास की यह प्रक्रिया तभी द्राुरू कर दी गयी जब समाज का एक छोटा-सा तबका ही विकसित की श्रेणी में आ पाया था। विकासच्चील देशों में विकासशीलता के दौर में मीडिया से सहभागी होने की अपेक्षा की जाती थी जो संभव नहीं हो पायी और व्यापारीकरण के कारण विकास का एजेंडा काफी हद तक किनारे हो गया। विकासच्चील समाज पर व्यापारीकरण की इस प्रक्रिया के प्रभाव और परिणामों का सही मूल्यांकन कर पाना अभी संभव नहीं दिखता लेकिन इतना अवच्च्य कहा जा सकता है कि इसके नकारात्मक परिणाम सकारात्मक परिणामों की तुलना में कहीं अधिक व्यापक और गहरे होने जो रहे हैं। अपेक्षतया बौद्धिक रूप से कुशल उपभोक्ता-नागरिक और एक विकासशील समाज के एक 'आम' नागरिक पर एक ही तरह के मीडिया उत्पाद का प्रभाव भिन्न होगा- कहीं यह मनोरंजन-रोमांच पैदा कर सकता है, तो अन्यत्र यह वैज्ञानिक सोच पर कुठाराघात कर अन्धविश्वाश की जडों को गहरा कर सकता है।
लोकतांत्रिक विमर्श बनाम नियंत्रण
राजनीति एक तरह का 'शोबिज़नस' बन गयी है और मीडिया मैं लोकतांत्रिक विमर्श की लोक परिधि की परिकल्पना की गयी थी वह हासिये पर चली गयी है। आज काफी हद तक मीडिया जीवन के केंद्र में है। आज मानव जीवन का लगभग हर पक्ष मीडिया द्वारा संचालित हो रहा है । मीडिया इतना शक्तिशाली और प्रभावशाली हो गया है कि हर तरह का विमर्श मीडिया तक ही सीमित होता प्रतीत होता है । एक तर्क ये भी है कि लोकतंत्र का स्थान मीडियातंत्र ले चुका है।
एक ओर तो हर तरह का विमर्श अधिकाधिक मीडिया के माध्यम से हो रहा है, तो दूसरी ओर, मीडिया का व्यापारीकरण हो रहा है जिसकी वजह से व्यापक मीडिया विमर्श की बजाय मुनाफा कमाने का उद्यम बन चुका है।
मौजूदा दौर में संवाद और विमर्च्च के अनेक माध्यम लगभग विलुप्त और निद्गप्रभावी से हो गए हैं। लोकपरिधि की परिकल्पना का सीधा संबंध जनमत और दूसरे माध्यम से लोकतंत्र में लोगों की भागीदारी को लेकर था लेकिन आज एक ऐसा परिदृच्च्य पैदा हो रहा है कि किसी विद्गाय के पक्ष में भारी 'जनमत' होने के बावजूद भी पक्के तौर पर यह नहीं कहा जा सकता कि इस मुद्दे और इस जनमत को जनसंचार माध्यमों में अभिव्यक्ति मिले। सहमति के निर्माण की परिकल्पना भी कोई नयी नहीं रही है। बहुत पहले भी कहा गया था कि लोकतंत्र में जनसंचार माध्यमों के जरिये लोगों के बीच स्वाभाविक रूप से सहमति न होने पर भी एक ऐसे विमर्च्च का सृजन किया जा सकता है और इस विमर्च्च को ऐसे रास्ते पर ले जाया जा सकता है कि आखिर में किसी भी विद्गाय पर एक सहमति का निर्माण किया जा सके और इस तरह की निर्मित सहमति ही आधुनिक लोकतंत्र का आधार बन गई है। इसका आच्चय यह है कि यह सहमति स्वाभाविक रूप से जनता के बीच से उभर कर नहीं आई बल्कि ऊपर से एक विशिष्ट,
अभिजात शासक वर्ग ने इसे तैयार किया या यह भी कह सकते हैं कि इसे थोपा।
सहमति के निर्माण की इस परिकल्पना में भी हाल ही में भारी परिवर्तन आए हैं। अब आधुनिक जनसंचार माध्यम और इनके माध्यम से प्रचारित की गयी जानकारियां इस कदर विशेषकृत हो चुकी है कि इन्हें किसी खास मकसद के लिए खास तरह से ढाल कर लोगों को एक खास रास्ता चुनने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।
मीडिया परम्परागत रूप से निच्च्चय ही लोकतांत्रिक विमर्च्च के माध्यम रहे हैं; इन्होंने उनके लोकहित और सामाजिक मुद्दों को उठाकर बड़े परिवर्तनों का मार्ग प्रच्चस्त किया; सच्चक्तीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई सूचना संसाधन के लाभकारी उपयोग के मार्ग प्रच्चस्त हुए; सूचना और ज्ञान के संसार का भारी विस्तार हुआ । सूचना के स्रोतों में भारी वृद्धि हुई और लोगों के सामने हमने अनेक विकल्प प्रस्तुत किए। लेकिन सत्तर-अस्सी के दच्चक में मीडिया शक्ति और प्रभाव में भारी इजाफा हुआ और इसके साथ ही इनका स्वामित्व अधिकाधिक निगमीकृत होता चला गया। साथ ही वैचारिक संघर्द्गा की राजनीति के कमजोर पड ने से भी मीडिया पर जन-दबाव में कमी आई और व्यापारीकरण के रास्ते पर उन्मुख होने का इनका रास्ता आसान हो गया। इस दौरान मीडिया प्रबंधक की कला में निरंतर विकास हुआ और यह परिष्कृत होती चली गई।इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण इराक पर आक्रमण करने से पहले और आक्रमण करने के बाद भी अमेरिकी प्रशासन का मीडिया प्रबंधन और सूचना नियंत्रण रहा। स्वयं अमेरिका के मीडिया विच्चेद्गाज्ञों ने यह साबित कर दिया है कि इराक पर आक्रमण को लेकर अमेरिकी मीडिया के इस दौरे में सरकार द्वारा दी गई सूचनाओं पर ही निर्भर रहे और इस कारण तीन वर्षों तक इराक युद्ध को लेकर अमेरिकी नागरिकों को अंधेरे में रखा गया और युद्ध के पक्ष में जनमत निर्मित किया गया। इराक और अफगान युद्ध के मीडिया कवरेजे पर निगाह डालें तो स्पष्ट हो जाता है की किस तरह युद्ध को भी मनोरंजन के रूप में पेश किया गया और युद्ध की बर्बरतों
पर पर्दा डाला गया ।अफगानिस्तान एक ऐसा देश है जो 1989 से युद्ध की आग में जल रहा है लेकिन इस देश के लोगों की हालत पर मीडिया में कितना देखने, सुनाने या पढने को मिलता है केवल इतना ही बताया जाता है किस किस हमले में कितने आतंकवादी मारे गए।
आज इस तरह प्रबंधन और जनसंपर्क की तकनीकों का अधिकाधिक इस्तेमाल किया जा रहा है। सूचना विशेषज्ञों का वर्ग जनसंचार माध्यमों से ऐसी छवियों का निर्माण करता है जिससे जनमत को किसी खास दिच्चा में मोड़ा जा सकता है। इस तरह के सूचना प्रबंधन और जनसंपर्क तकनीकों के उदय के उपरांत राजनीति और राजनीतिक जीवन का इस तरह का मीडियाकरण हो गया है और इससे जनमत को प्रभावित करने में मीडिया की अहम भूमिका हो गई है। इस तरह के मीडियाकरण के कारण भी जनसंचार माध्यमों में जनमत के प्रतिबिंबित होने से कहीं अधिक भूमिका जनमत को प्रभावित करने की हो गई है।
भले ही यह न कहा जा सके कि मीडिया की यह भूमिका पूरी तरह विकृत हो चुकी है लेकिन इस बात की भी अनदेखी नहीं की जा सकती है कि लोकतंत्र का आधार एक सूचित और जानकार नागरिक ही हो सकता है। लेकिन व्यापारीकरण की प्रक्रिया और नई उपभोक्ता संस्कृति के उदय के बाद एक नागरिक का उपभोक्ता वाला पक्ष ही हावी होता चला गया है। एक नागरिक सही तरह से सूचित और जानकारी होता है वहीं वह कह सकते है कि एक उपभोक्ता सही ढ़ग से सूचित नहीं होता और अनेक अवसरों पर इसकी सोच को कुछ खास मकसद की पूर्ति के लिए ढाला जा सकता है। मीडिया के नागरिक से विमुख होकर उपभोक्ता पर केंद्रित होने से लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में अनेक ऐसे रुझान पैदा हो रहे हैं जिन्हें वास्तविक रूप से लोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता।
मीडिया की इस बदली भूमिका से सत्तासीन कुलीन वर्ग और नागरिकों के व्यापार समुदाय के बीच लोकतांत्रिक विमर्च्च का स्वरूप बदल ही नहीं गया है बल्कि इसमें निहित विमर्श के तत्वों में जबर्दस्त ह्नास हुआ है और नागरिक समुदाय के मत को तोड़ने-मरोड ने और विकृत करने के लिए सूचना प्रबंधन और जनसंपर्क की परिद्गकृत तकनीकें अस्तित्व में आई हैं। इससे नागरिक समुदाय की तुलना में सत्तासीन वर्ग की क्षमता बढ ी। मीडिया ने नियंत्रण और शासन के नए हथियार पैदा किए। इस पूरी प्रक्रिया में राजनीतिज्ञो, सूचना विच्चेद्गाज्ञों और पत्रकारों की धुरी के पैदा होने से जनमत को किसी खास पक्ष में मोड ने की क्षमता में जबरदस्त वृद्धि हुई।
समाचारीय घटनाओं के बदलते मानदंड
समाचारों के विद्गाय चयन, समाचार या घटनाओं को परखने की पंरपरागत सोच और दृद्गिटकोण के पैमाने और मानदंड बेमानी हो गये। इसके परिणामस्वरूप आज का उपभोक्ता-नागरिक इस बात को नहीं समझ पाता है कि देश -दुनिया की महत्त्वपूर्ण घटनाएं कौन-सी हैं? परंपरागत रूप से मीडिया एक ऐसा बौद्धिक माध्यम होता था जो लोगों को यह भी बताता था कि कौन सी घटनाएं उनके जीवन से सरोकार रखती हैं और उनके लिए महत्त्वपूर्ण है। इस तरह मीडिया एक तरह का मध्यस्थ भी होता है जो किसी घटना को एक संदर्भ में पेच्च करता है, इसे अर्थ देता है और एक परिप्रेक्ष्य में इसे प्रस्तुत करता है। आज का मीडिया मध्यस्थ की इस भूमिका को बहुत प्रभावच्चाली ढंग से निभाता प्रतीत नहीं होता। इस दृद्गिट से समाचारों को नापने-परखने के कुछ सर्वमान्य मानक होते थे। आज ये सर्वमान्य मानक काफी हद तक विलुप्त से हो गये हैं और एक उपभोक्ता-नागरिक समाचारों के समुद्र में गोते खाकर कभी प्रफुल्लित होता है, कभी निराच्च होता है और कभी इतना भ्रमित होता है कि समझ ही नहीं पाता कि आखिर हो क्या रहा है? रेडियो, टेलीविजन, सिनेमा, टेलीफोन, इंटरनेट, मोबाइल सभी का उपयोग करने वाले उपभोक्ताओं की संखया में निरंतर और तेजी से वृद्धि हो रही है। लेकिन उनके माध्यम से प्रसारित होने वाले सूचना-संदेशों अंतरवस्तु कुल मिलकर सतही है और इसका मूल चरित्र "चैट" तक तक ही सिमित होता प्रतीत होता है । आज में मीडिया के हर विमर्श और उत्पाद में "चैट" संस्कृति की झलक दिखाई पड़ती है ।
मीडिया से ही लोगों को किसी विषय के बारे में अधिकांश जानकारियां मिलती हैं जिसमें किसी विषय के बारे में सूचना और विचार और इससे सृजित होने वाला ज्ञान द्राामिल है। आधुनिक समाज के संदर्भ में हम कह सकते हैं कि छवि का संचार है। किसी भी ऐसे विषय के बारे में हम इसके बारे में प्राप्त सूचनाओं के आधार पर ही इसकी एक छवि विकसित करते हैं और इस विषय पर यही छवि हमारे लिए यथार्थ होती है। वास्तविक रूप से दुनिया का यह एक छोटा-सा ही हिस्सा होता है जो स्वयं हमारे अपने प्रत्यक्ष अनुभवों के दायरे में होता है और इसके बारे में कोई जानकारी के लिए हम किसी बाहरी सूचना माध्यम पर निर्भर न होकर खुद ही इसके बारे में जानकारी हासिल करते हैं। लेकिन हमारे प्रत्यक्ष दायरे की इस छोटी सी दुनिया के बाहर का जो व्यापक संसार है उसके बारे में हमें जो बताया जाता है उसी के अनुसार हम इसके यथार्थ का सृजन करते हैं।
किसी भी विषय पर सूचनाएं प्राप्त करने के अनेक साधन हो सकते हैं। संचार के अनेक तरीकें से अनेक विषय के बारे में हमें सूचनाएं मिलती हैं या हम सूचनाएं इकट्ठा करते हैं। वर्त्तमान में लोग किसी भी विषय पर जानकारियां हासिल करने के लिए लोग अधिकाधिक मीडिया पर निर्भर होते जा रहे हैं। दुनिया में सूचना क्रांति के दौरान सूचनाओं का विशाल महासागर पैदा हो गया है लेकिन इसके साथ ही हमारे पड़ोस में होने वाली घटनाओं के बारे में भी जानकारी हमें मीडिया से ही मिलती है और इसी के आधार पर हम कोई मत और दृद्गिटकोण विकसित करते हैं। इस संदर्भ में यह भी समझना जरूरी हो जाता है कि मीडिया किन घटनाओं, विचारों और समस्याओं को समाचार योग्य समझते हैं और फिर इनके किस पक्ष और पहलू को कितना महत्त्वपूर्ण आंकते हैं। घटना के किसी एक खास पक्ष को उजागर कर घटना के बारे में पहला प्रभाव पैदा कर दिया जाता है।
इस दृद्गिट से मीडिया एक मध्यस्थ की भूमिका अदा करता हैं और हमें बताता हैं कि देच्च और दुनिया की महत्त्वपूर्ण घटनाएं कौन-सी हैं और फिर, इन घटनाओं के बारे में जानकारियों का चयन कर इन्हें कुछ अर्थ प्रदान करते हैं, एक परिप्रेक्ष्य में इनका प्रस्तुतीकरण करते हैं। चयन और प्रस्तुतीकरण की इस प्रक्रिया से ही मीडिया हमें बताते हैं कि कौन से विषय महत्त्वपूर्ण हैं और इन विषय बारे में हमें किस तरह सोचना चाहिए और इस तरह इन विद्गायों पर एक जनमत के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। मीडिया हमें भले ही यह न बताते हों कि हम क्या सोचें लेकिन काफी हद तक यह बताने में सफल होते हैं कि वे विषय कौन-से हैं जिनके बारे में हमें सोचना चाहिए। इसके समानातंर ढेर सारे ऐसे विषय और घटनाएं होती हैं जिन्हें मीडिया में कोई उल्लेख नहीं होता।
सूचना विस्फोट के उपरांत उभरे मीडिया से इस जन के विचार की अपेक्षाएं पूरी होने के बजाय इससे यह कुछ बेडोल और बेमेल हो गई है। पश्चिमी बुद्धिजीवियों के एक वर्ग ने तो यहां तक कह दिया है कि विकसित देशों में जिनके बारे में यह पाया गया है कि वे सूचना समाज में परिवर्तित हो चुके हैं, वहां लोग सूचित कम हैं और गलत सूचनाओं के शिकार अधिक हैं। अमेरिका में एक सर्वेक्षण में तो यह निद्गकर्द्गा निकला गया था कि जो लोग टेलीविज न अधिक देखते हैं, इराक युद्ध के बारे में उनकी समझ उन लोगों से कम हैं जो टेलीविजन अधिक नहीं देखते हैं।
व्यापारीकृत मीडिया के पब्लिक एजेंडा से हटने से इसके द्वारा दी जाने वाली जानकारियों की साख और विच्च्वसनीयता को लेकर भी अनेक सवाल उठ रहे हैं। साख और विश्वनीयता के इस संकट को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि तात्कालिक रूप से यह अल्पावधि के लिए जनमत को प्रभावित करने की व्यापारीकृत मीडिया की जो क्षमता दिखाई पडती है उसका दीर्घकाल में टिकाऊ रहना संभव नहीं है। किसी खास विषय पर मीडिया जनमत को निर्णायक रूप से प्रभावित कर सकते हैं लेकिन साख और विच्च्वसनीयता पर उमड रहे संकट के बादलों को देखते हुए दीर्घकाल में मीडिया की भूमिका पर पर नए सवाल पैदा होतें हैं । निगमीकृत मुख्यधारा मीडिया के इस साख के संकट से वैकल्पिक मीडिया के लिए स्पेस पैदा हो सकता है ।
वैकल्पिक मीडिया
मीडिया उत्पादों के वैच्च्िवक प्रवाह के बाधाविहीन बनने के बाद एक नये तरह का सूचना और संचार का परिदृश्य पैदा हुआ है। समकालीन परिदृश्य में मीडिया उत्पादों और इनके वितरण के माध्यमों में भी बुनियादी परिवर्तन आ रहे हैं। प्रिंट, रेडियो, टेलीविजन और मल्टीमीडिया इंटरनेट बहुत सारे मीडिया उत्पाद और व्यापक विकल्प पेश कर रहे हैं। दूरसंचार, सेटेलाइट और कंप्यूटर से आज इंटरनेट के रूप में एक ऐसा महासागर पैदा हो गया है जहां मीडिया की हर नदी, हर छोटी-मोटी धाराएं आकर मिलती हैं। इंटरनेट के माध्यम से आज किसी भी क्षण दुनिया के किसी भी कोने में संपर्क साधा जा सकता है। इंटरनेट पर सभी समाचार पत्र, रेडियो और टेलीविजन चैनल उपलब्ध हैं। आज हर बड़े से बडे और छोटे से छोटे संगठनों की अपनी वेबसाइट हैं जिन पर इनके बारे में अनेक तरह की जानकारियां हासिल की जा सकती हैं।
इंटरनेट पर नागरिक पत्रकार ने भी अपनी प्रभावच्चाली उपस्थिति दर्ज की है। इंटरनेट पर ब्लॉगों के माध्यम से अनेक तरह की आलोचनात्मक बहसें होती हैं, उन तमाम तरह के विचारों को अभिव्यक्ति मिलती है जिनकी मुखयधारा का कॉरपोरेट मीडिया अनदेखी ही नहीं उपेक्षा भी करता है क्योंकि इनमें कॉरपोरेट व्यापारिक हितों पर कुठाराघात करने की भी क्षमता होती है। भले ही ब्लॉग एक सीमित तबके तक ही सीमित हो लेकिन फिर भी ये समाज का एक प्रभावच्चाली तबका है जो किसी भी समाज और राद्गट्र को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। ब्लॉगिंग ने अत्यधिक व्यापारीकृत मीडिया बाजार में अपनी प्रभावच्चाली उपस्थिति दर्ज करायी है। विकसित देच्चों में लगभग एक-चौथाई आबादी इंटरनेट का इस्तेमाल करती है इसलिए ब्लॉग अभिव्यक्ति के एक प्रभावच्चाली माध्यम बन चुके हैं। विकासच्चील देच्चों में भी ब्लॉग लोकतांत्रिक विमर्च्च के मानचित्र पर अपनी प्रभावच्चाली उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। ब्लॉग निच्च्चय ही आज के सूचना-शोरगुल वाले मीडिया बाजार की मंडी में एक वैकल्पिक स्वर को अभिव्यक्त करता है। लेकिन इस नये वैकल्पिक मीडिया में कुछ निहित कमजोरियां भी हैं।
मीडिया बाजार में उपस्थित शक्तिशाली तबके ब्लॉग की दुनिया को भी प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। बड़े कारपोरेट संगठन और सरकारी एजेंसियां अनेक ब्लॉग खोलकर या पहले से ही सक्रिय ब्लॉगों में प्रवेच्च कर इस लोकतांत्रिक विमर्च्च को प्रभावित करने की अपार क्षमता रखते हैं। ऐसे में शक्तिशाली संगठनों का ब्लॉग संसार में दखल और उसके परिणामों का आकलन करना भी जरूरी हो जाता है। मीडिया के केन्द्रीकरण और विकेन्द्रीकरण को समझने के लिए द्राक्तिच्चाली संगठनों की इस क्षमता की उपेक्षा नहीं की जा सकती। ब्लॉग के गुरिल्ला ने व्यापारीकृत मीडिया के बाजार में प्रवेच्च कर हलचल तो पैदा कर दी है लेकिन अभी ये देखा जाना बाकी है कि यह इस मंडी में अपने लिए कितने स्थान का सृजन कर पाता है और किस हद तक कॉरपोरेट और सरकारी संगठनों के इसे विस्थापित करने के प्रयासों को झेल पाता है।
इस दृद्गिट से सबसे अधिक आच्चावाद इस बात से पनपता है कि मुखयधारा कॉरपोरेट मीडिया के समाचारों और मनोरंजन की अवधारणाओं में जो रुझान पैदा हो रहे हैं उससे इसकी साख और विच्च्वसनीयता में जबरदस्त गिरावट आ रही है। इस रुझान के कारण अब लोग इस तरह के समाचारों से ऊबने लगे हैं, निराच्च होने लगे हैं। मुखयधारा कॉरपोरेट मीडिया की साख में इस गंभीर संकट से ब्लॉग संसार के लिए अपने स्थान से विस्तार की नयी संभावनाएं पैदा हो गयी हैं।
निष्कर्ष
प्रोद्योगिकीय क्रांति के उपरांत एक ऐसे सूचना समाज की कल्पना की गयी थी जिसमें सूचना एक एक ऐसा बुनियादी संसाधन होगा जो मानव सभ्यता के सकारात्मक विकास का मार्ग प्रशस्त्र करेगा। दुनिया भर के लोगों का सूचना संसाधन के बल पर सशक्तिकरण होगा और वे राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक जीवन में अधिक सक्रिय भागीदार बन सकेंगे। निश्चय ही एक स्तर पर इस क्रांति ने विमर्श के नए माध्यम सृजित किये हैं और आर्थिक पटल पर उत्पादकता और कार्य कुशलता बढ़ने में अहम् भूमिका अदा की है । लेकिन वैश्विक स्थर पर इस क्रांति ने नियंत्रण के अत्यंत परिष्कृत और प्रभावशाली हथियार भी सृजित किये हैं जिनके बल पर प्रोद्योगिकी, वित्त और सूचना का एक ऐसा गठजोड़ जिसने इक ऐसे एक नए सत्तातंत्र को जन्म दिया है जिसकी ताकत बेमिसाल है और जिसका नियंत्रण चंद बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथ में है। यह सूचना सत्तातंत्र आज दुनिया में नव उदारवादी भूमंडलीकरण का झंडावरदार है. बहुराष्ट्रीय कंपनियों और इस सूचना सत्तातंत्र का आज दुनिया पर प्रभुत्व कायम हो गया है और नए वैश्विक बाज़ार पर इनका नियंत्रण इतना मज़बूत है की अगर कोई देश इनके अनुकूल नीतियों पर नहीं चलता तो यह सत्तातंत्र उसकी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को तहस नहस करने की क्षमता रखता है। पिछले कुछ वर्षों के वित्तीय संकटों से साफ़ ज़ाहिर है की इस सत्तातंत्र की ताकत कितनी बेमिसाल है।
नवउदारवादी भूमंडलीकरण की प्रक्रिया ने दुनिया के अनेक देशों में सम्पति के सृजन के नए मार्ग प्रशस्त किये और पिछले बीस वर्षों में अनेक देशों में एक ऐसे मध्यम वर्ग का उदय और विस्तार हुआ और जिसकी क्रयशक्ति इतनी तेज़ी से बढ़ी कि इसने एक बहुत बड़े बाज़ार को जन्म दिया, एक नए उपभोक्ता को पैदा किया, नए उपभोक्ता मूल्य सृजित किये जिसने नव उदारवादी विचारधारा को एक बेहद उपजाऊ ज़मीन मुहैया की। आज का वैश्विक बाज़ार दुनिया भर के इस अतिरिक्त क्रयशक्ति वाले मध्यम वर्गीय उपभोक्ता पर टिका है।
इतिहास के मौजूदा दौर में मानव जीवन पर सूचना सत्ता तंत्र का नियंत्रण बेमिसाल है और कभी कभी लगता है इसे भेद पाना क्या संभव हो पायेगा ? लेकिन दुनिया का इतिहास और ख़ास तौर से मज़बूत सोवियत समाजवाद का अनुभव यही बताता है की नियंत्रण जितना अधिक मज़बूत होता है इसके ढहने का आवेक भी उतना ही तेज होगा। नयी सूचना क्रांति में अनेक ऐसे माध्यम सृजित किये हैं जो असहमति और असंतोष की अभिव्यक्ति के मंच के रूप में विकसित हो रहे हैं। भले ही आज ब्लॉग की दुनिया की ताकत सूचना सत्तातंत्र के सामने बौनी नज़र आती है लेकिन मुक्त अर्थ व्यवस्था पर समय-समय पर आने वाल आर्थिक संकट इस ओर भी इशारा करते हैं कि बाज़ार की ताकत उतनी नहीं हैं जितना नवउदारवाद इसका ढोल पीटता है। हाल ही के आर्थिक संकट इस और इशारा करतें हैं की बाज़ार और प्रोद्योगिकी की ताकत बेतहाशा होते हुए भी किन्ही ख़ास परिस्थितियों में खोखली साबित हो सकती है। 2009 के आर्थिक संकट के दौरान दुनिया की सबसे बड़ी वित्त कंपनी लेहमान ब्रदर्स के दीवालिया होने पर यह कहा गया था कि जिस तरह बर्लिन की दीवार का ढहना सोवियत समाजवाद का पतन का प्रतीक था, उसी तरह लेहमान ब्रदर्स का दीवालिया होना पूँजीवाद के पतन का प्रतीक है। इस पृष्टभूमि में, बहुराष्ट्रीय सूचना सत्तातंत्र और इसकी प्रभुत्वकारी नवउदारवादी विचारधारा और छोटे से ब्लॉगतंत्र के असंतोष और असहमति के स्वरों बीच के भावी सत्ता समीकरण का मूल्याकन करना भी आवश्यक हो जाता है।
तानाशाहियों की तुलना में मुक्त समाजों में सेंसरशिप असीमित रूप से कही अधिक परिष्कृत और गहन होती है क्योंकि इस से असहमति को चुप कराया जा सकता है और प्रतिकूल तथ्यों को छिपाया जा सकता है- जोर्ज ऑरवेल
आज की दुनिया औपचारिक रूप से अधिक लोकतान्त्रिक है लेकिन फिर भी लोगों को लगता है की उनके समाज के बुनियादी फैसले अधिकाधिक उनके नियंत्रण से बाहर होते जा रहे हैं- रॉबर्ट मैकचेस्नी
पिछले तीन दशकों में मानव विकास की दिशा और दशा मैं बुनियादी परिवर्तन आये हैं । समाज पर व्यापार के आधिपत्य की नवउदारवादी विचारधारा आज विश्व राजनीति के केंद्र में हैं । नवउदारवाद का आधार एक उपभोक्ता समाज और विश्व को एक बाज़ार में तब्दील कर देना है । एक ऐसे समाज का निर्माण है जिस पर व्यापार का प्रभुत्व हो इस तरह की व्यवस्था कायम करने मैं मीडिया की केंद्रीय भूमिका है । अस्सी-नब्बे के दशक की कुछ घटनाओं ने राजनीतिक, आर्थिक और सूचना संचार की अंतर्राद्गट्रीय व्यवस्थाओं को एक तरह से फिर से परिभाषित कर दिया जिससे विश्व राजनीति के चरित्र और स्वभाव में बड़े परिवर्तन आए।
अस्सी के दशक में विकास के सोवियत समाजवादी मॉडल के चरमराने की प्रक्रिया शुरू हुई और 1991 में सोवियत संघ का अवसान हुआ। इस घटना को पश्चिमी उदार लोकतंत्र और मुक्त अर्थव्यवस्था की विजय के रूप में देखा गया। इसी दशक में सूचना क्रांति ने भी बेमिसाल ऊँचाइयां हासिल की और इसी के समांतर दुनिया भर में मुक्त अर्थव्यवस्था की ओर उन्मुख आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया भी शुरू हुई। शीतयुद्धकालीन वैचारिक राजनीति के अवसान के उपरांत नवउदारवादी भूमंडलीकरण से एक नए व्यापारिक मूल्यों और एक नयी उपभोक्ता संस्कृति का उदय हुआ। इन सबका जबरदस्त प्रभाव जनसंचार माध्यमों पर भी पड़ा। जनसंचार माध्यम काफी हद तक इस प्रक्रिया का हिस्सा बन गये और राजनीतिक और व्यापारिक हितों के अधीन होते चले गए। व्यापारीकरण की यह प्रक्रिया आज अपने चरम पर है। भले ही विभिन्न देशों और विभिन्न समाजों में इसका रूप-स्वरूप कितना ही भिन्न क्यों न हो।
शीतयुद्ध के बाद दो विचारधाराओं के बीच संघर्ष का अंत हो गया। पश्चिम की पूंजीवादी विचारधारा ही प्रभुत्वकारी बन गयी और इसका कोई वास्तविक रूप से प्रभावशाली विकल्प नहीं उभर पाया। इन कारणों से शैली की पश्चिमी उदार लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था, आर्थिक स्तर पर मुक्त अर्थतंत्र और नवउदारवादी भूमंडलीकरण- यही आज की विश्व व्यवस्था के मुखय स्तंभ हैं। राजनीतिक अर्थव्यवस्था के इस स्वरूप के अनुरूप ही सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्य ढल रहे हैं इसलिए यह कहा जा सकता है कि मौजूदा विश्व व्यवस्था में पश्चिमी जीवन शैली और सांस्कृतिक मूल्यों का ही विस्तार हो रहा है और वैश्विक मीडिया इसमें अग्रणी भूमिका अदा कर रहा है। सांस्कृतिक समरूपीकरण प्रक्रिया को जन्म दे रहा है । राजनैतिक स्तर पर यह पश्चिमी उदार लोकतंत्र, आर्थिक स्तर पर मुक्त आर्थिक व्यवस्था और सांस्कृतिक स्तर पर पश्चिमीकरण की प्रक्रिया दिनोदिन तेज़ होती जा रही है. एक बहुरंगी और विविध दुनिया को समरूप बनकर एक वैश्विक सुपर मार्केट में तब्दील होती प्रतीतं होती है ।
इस संदर्भ में सांस्कृतिक उपनिवेशवाद की अवधारणा भी नया स्वरूप ग्रहण कर रही है और आज यह पहले से कहीं अधिक व्यापक, गहरी और विशालकाय हो चुकी है। वैच्च्िवक सूचना और संचार तंत्र पर आज पश्चमी देशों का नियंत्रण और प्रभुत्व उससे कहीं अधिक मजबूत हो चुका है जिसे लेकर कुछ दशक पहले विकासशील देशों में विरोध के प्रबल स्वर उठ रहे थे। नयी विश्व व्यवस्था ने विकासशील देशों की उन तमाम दलीलों को ठुकरा दिया जो उन्होंने विश्व में एक नयी सूचना और संचार व्यवस्था कायम करने के लिए छठे और सातवें दच्चक में पेश की थीं और जिन्हें 1980 में यूनेस्को में मैक्ब्राइड कमीच्चन की रिपोर्ट के रूप में एक संगठित अभिव्यक्ति प्रदान की। विकासशील देश विश्व में सूचना और समाचारों के प्रवाह में संतुलन की मांग करे रहे थे लेकिंग नयी विश्व व्यवस्था में एकतरफI प्रवाह ही अधिक तेज़ हो गया . इसी दौरान सूचना क्रांति एक ऐसी मंजिल तक पहुंच चुकी थी जिसमें दूरसंचार, सेटेलाइट और कंप्यूटर प्रौद्योगिकी के बल पर एक ऐसे तंत्र का उदय हुआ जिसमें सूचना समाचारों के प्रवाह पर किसी भी तरह का अंकुच्च लगाना संभव ही नहीं रह गया। विकासच्चील देच्च सूचना-समाचारों के लिए एकतरफा प्रवाह की च्चिकायत करते थे उसका आवेग इस नये दौर में अब पहले से कहीं अधिक तेज हो गया और इसे रोक पाना वास्तविक रूप से संभव नहीं रह गया था।
शीत युद्ध के बाद उभरी विश्व व्यवस्था में विकासशील देशों सामूहिक सौदेबाजी की क्षमता क्षीण हो गयी है। गुटनिरपेक्ष आंदोलन और विकासशील देशों के अन्य संगठन या तो अपना अर्थ खो बैठे या अप्रसांगिक हो गए। इसका मुख्य कारण यह था कि विकासशील देशों में इस मांग को उठाने वाले अधिकांच्च देच्चों ने आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था के मॉडल का रास्ता छोड़कर नवउदारवादी भूमंडलीकरण का रास्ता अपना लिया था।
विकासशील देशों सरकारों के स्तर पर इस तरह के प्रभुत्व का कोई प्रतिरोध न होने के कारण एक सीमा तक यह प्रतिरोध धार्मिक कट्टरपंथ जैसे नकारात्मक रूपों में अभिव्यक्त हो रहा है। नयी विश्व व्यवस्था राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से पश्चिम का दबदबा है और वैश्विक मीडिया को भी यही नियंत्रित करता है। मीडिया पर नियंत्रण का मतलब किसी भी व्यक्ति, देश , संस्कृति, समाज आदि की छवि पर भी नियंत्रण करना है । मीडिया ऐसे मूल्य और मानक तय करता है जिनसे सही-गलत, सभ्य- असभ्य के पैमाने निर्धारित होते हैं। इसी निर्धारण से सांस्कृतिक उपनिवेशवाद की सीमा शुरू होती है।
नब्बे के दशक में दुनिया भर में नवउदारवादी आर्थिक सुधारों का दौर शुरू हुआ। इस दौरान निजीकरण और नयी प्रौद्योगिकी की मदद से उत्पादकता और कुशलता में तेज इजाफा हुआ। निजी क्षेत्र का उद्योग नयी प्रौद्योगिकी को आत्मसात करने में अधिक गतिच्चील साबित हुआ और जिसकी वजह से इसकी उत्पादकता और कुशलता में भारी वृद्धि हुई और संपति के सृजन की इसकी क्षमता नये आसमान छूने लगी। इसी दौरान सार्वजनिक क्षेत्र पर टिकी अर्थव्यवस्था जड ता का च्चिकार होती चली गयी और चंद अपवादों को छोड कर सार्वजनिक प्रतिद्गठान आर्थिक रूप से टिकाऊ साबित नहीं हो सके।
उदारीकरण और निजीकरण के इस दौर में आर्थिक समृद्धि का एक बड़ा उफान आया और एक नया वर्ग पैदा हुआ जिसके पास अच्छी खासी क्रय द्राक्ति थी और यह पारंपरिक मध्यमवर्ग की तुलना में कहीं बड ा उपभोक्ता था। आज जो उपभोक्ता क्रांति देखने को मिल रही है उसका झंडाबरदार यही वर्ग है। यह उपभोक्ता क्रांति अभी जारी है और एक नये दौर की मीडिया क्रांति इसी वर्ग पर टिकी है। इस नये बाजार के उदय के बाद अन्य उपभोक्ता उत्पादों के साथ-साथ मीडिया उत्पादों की मांग में भारी वृद्धि हुई। मीडिया उत्पादों के वैश्विक प्रवाह के बाधाविहीन बनने के बाद एक नए तरह का सूचना और संचार का प्ररिदृश्य पैदा हुआ है। समाज के नए-नए तबके मीडिया बाजार में प्रवेश कर रहे हैं और अपनी क्रय शक्ति के आधार पर मीडिया उत्पादों के उपभोक्ता बन रहे हैं।
सूचना की इस क्रांति के उपरांत दुनिया में जितना संवाद आज हो रहा है वो बेमिसाल हैं लेकिन इस इस संवाद का आकार जितना बड़ा है इसकी विषयवस्तु उतनी हे सीमित होती जा रही है। लोग अधिकाधिक मनोरंजित होते जा रहे हैं और अधिकाधिक कम सूचित/जानकर होते जा रहे हैं । इसी दौरान लोकतांत्रिक राजनीति के चरित्र में ही भारी बुनियादी परिवर्तन आए और इसी के अनुरूप मीडिया तंत्र के साथ इसके संबंध पुनः परिभाषित हुए। विश्व भर में आर्थिक विकास से उपभोक्ताओं की नयी पीढ का का उदय हुआ। इससे मीडिया के लिए नये बाजार पैदा हुए और इस बाजार में अधिक से अधिक हिस्सा पाने के लिए एक नयी तरह की बाजार होड पैदा हुई।
दरअसल नवउदारवादी भूमंडलीकरण की मौजूदा प्रक्रिया एक ''टोटल पैकेज'' है जिसमें राजनीति, आर्थिक और संस्कृतिक तीनों ही पक्ष शामिल हैं। मीडिया नयी जीवन शैली और नये मूल्यों का इस तरह सृजन करता है जिससे नये उत्पादों की मांग पैदा की जा सके और एक बाजार का सृजन किया जा सके। अनेक अवसरों पर मीडिया ऐसे उत्पादों की भी मांग पैदा करता है जो स्वाभाविक और वास्तविक रूप से किसी समाज की मांग नहीं होते हैं।
मीडिया और मनोरंजन उद्योग का तेजी से विस्तार इसी उपभोक्ता क्रांति के बल पर हो रहा है। इन रूझानों के चलते 1990 के दशक में मीडिया के व्यापारीकरण का नया दौर शुरू हुआ जिसकी गति और आकार अपने आप में बेमिसाल थी। इस दौर में मीडिया व्यापार की ओर अधिकाधिक झुकता चला गया और सार्वजनिक हित की पूर्ति करने की इसकी भूमिका ह्रास हुआ। मीडिया अब सार्वजनिक-व्यापारिक उद्यम से हटकर व्यापारिक-सार्वजनिक उद्यम बन गया जिसे व्यापारिक हित ही संचालित करतें हैं । आज मीडिया के व्यापारीकरण की यह प्रक्रिया अपने चरम पर है।
सूचना क्रांति से एक ऐसे वैश्विक गाँव का उदय हुआ जो दुनिया के सम्पनों के एकीकरण से जन्मा है । सूचना समाचारों और इस तरह के मीडिया उत्पदों का प्रवाह बाधाविहीन होने के उपरांत वैश्विक मीडिया के स्वरूप में भी बडा परिवर्तन आया। पहले वैश्विक मीडिया विश्व भर में सूचना और समाचारों के प्रवाह का नियंत्रण करता था लेकिन उसका काफी हद तक एक देश के भीतर इसका सीधा नियंत्रण नहीं होता था, यानी नियंत्रण का स्वरूप अप्रत्यक्ष था और ये संगठनों के माध्यम से उस देश के ही घरेलू बाजार में मीडिया उत्पाद वितरित करते थे। लेकिन आज वैश्विक मीडिया का प्रसार देश की सीमा के भीतर तक हो चुका है जहां वह प्रत्यक्ष रूप से मीडिया के बाजार में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें तमाम राजनितिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दीवारें ढह रहीं हैं जो परंपरागत रूप से एक तरह के सुरक्षा कवच का काम करतीं थीं ।
मीडिया का निगमीकरण
समकालीन मीडिया के निगमीकरण , केंद्रीकरण और विकेंद्रीकरण की प्रक्रियाएं एक साथ चल रही हैं। मीडिया संघटन एक तो खुद व्यापारिक निगम बन गए हैं और दूसरी और पूरी तरह विज्ञापन उद्योग पर निर्भर हैं । एक ओर तो नई प्रौद्योगिकी और इंटरनेट ने किसी भी व्यक्ति विशेष को अपनी बात पूरे अंतर्राद्गट्रीय समुदाय तक पहुंचाने का मंच प्रदान किया है, तो दूसरी ओर मुखयधारा मीडिया में केंद्रीकरण की प्रक्रिया भी तेज हुई है। पूरे विश्व और लगभग हर देश के भीतर मीडिया का केंद्रीकरण हो रहा है। एक ओर तो मीडिया का आकार विशालकाय होता जा रहा है और दूसरी ओर इस पर स्वामित्व रखने वाले निगमों की संखया कम होती जा रही है। पिछले कुछ दशकों से यह प्रक्रिया चल रही है और अनेक बड़ी मीडिया कंपनियों ने छोटी मीडिया कंपनियों का अधिग्रहण कर लिया है। इसके अलावा कई मौकों पर बड़ी - बड़ी कंपनियों के बीच विलय से भी मीडिया के केंद्रीकरण को ताकत मिली है।
आज वैश्विक संचार और सूचनातंत्र पर चंद विशालकाय बहुराष्ट्रीय मीडिया निगमों का प्रभुत्त्व है जिनमें से अधिकांच्च अमेरिका में स्थित हैं। बहुराष्ट्रीय मीडिया निगम स्वयं अपने आप में व्यापारिक संगठन तो हैं ही लेकिन इसके साथ ही ये सूचना-समाचार और मीडिया उत्पाद के लिए एक वैश्विक बाजार तैयार करने और एक खास तरह के व्यापारिक मूल्यों के प्रचार-प्रसार के लिए ही काम करते हैं। इन बहुराष्ट्रीय निगमों के इस व्यापारिक अभियान में स्वायत पत्रकारिता और सांस्कृतिक मूल्यों की कोई अहमियत नहीं होती। इस रुझान को आज राद्गट्रीय और अंतर्राष्टीय स्तर पर स्पष्ट रूप में देखा जा सकता है। मोटे तौर पर यह कह सकते हैं कि वैश्विक मीडिया वैश्विक व्यापार के अधीन ही काम करता है और दोनों के उद्देश्य एक-दूसरे के पूरक होते हैं।
पूरी वैश्विक मीडिया व्यवस्था पर इस वक्त मुश्किल से नौ-दस मीडिया निगमों का प्रभुत्त्व है और इनमें से अनेक निगमों का एक-तिहाई से भी अधिक कारोबार अपने मूल देशों से बाहर दूसरे देशों में होता है। उदाहरण के लिए रूपर्ट मर्डोक की न्यूज कॉर्पोरेच्चन का अमेरिका, कनाडा, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, एशिया और लैटिन अमेरिका में मीडिया के एक अच्छे-खासे हिस्से पर स्वामित्व है। जर्मनी के बर्टैल्समन्न निगम का विश्व के 53 देशों की 600 कंपनियों में हिस्सेदारी है। विच्च्व की सबसे बड़ी मीडिया कंपनी एओएल टाइम वार्नर भी अमेरिका की है और विश्व की दूसरी सबसे बडी कंपनी वियाकॉम कंपनी भी अमेरिका की है जिनका विश्व के मीडिया बाजार के एक बडे हिस्से पर नियंत्रण है। सोनी निगम इलेक्ट्रॉनिक्स के उत्पादों में नाम कमा चुका था लेकिन आज एक मीडिया कंपनी के रूप में दुनिया भर में इसकी एक हजार सहयोगी कंपनियां काम कर रही हैं। इनके अलावा डिज नी वियाकॉम, एमटीवी, टेली-कम्युनिकेच्चन इंक, यूनिवर्सल (सीग्राम), माइक्रोसॉफ्ट, गूगल और याहू का भी एक बडे बाजार पर कब्जा है जो लगभग दुनिया के हर देश में फैला हुआ है। अमेरिका की जनरल इलेक्ट्रिक जैसी हथियार बनाने वाले निगम ने भी मीडिया जगत में अपनी उपस्थिति दर्ज कर दी है और अमेरिका के एक प्रमुख समाचार चैनल एनबीसी पर इसका नियंत्रण है।
इन विशालकाय निगमों के बाद दूसरे स्तर के भी मीडिया संगठन हैं जिनका व्यापार दुनिया भर में बढ रहा है। इस वक्त विश्व में मीडिया और मनोरंजन उद्योग सबसे तेजी से उभरते सैक्टरों में से एक है और रोज नयी-नयी कंपनियां अपना नया और अलग मीडिया उत्पाद लेकर बाजार में कूद रही हैं। अधिकांच्च बहुराष्ट्रीय मीडिया निगम संचार के क्षेत्र से जुडे कई क्षेत्रों में काम कर रहे हैं जिनमें समाचारपत्र और रेडियो और टेलीविजन चैनल के अलावा पुस्तक प्रकाशन , संगीत, मनोरंजन पार्क और अन्य तरह के मीडिया और मनोरंजन उत्पाद शामिल हैं। प्रौद्योगिक क्रांति ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपनी गतिविधियों के विस्तार के लिए अपार संभावनाओं को जन्म दिया है। आज अधिकांच्च बडे मीडिया निगम दुनिया भर में अपनी गतिविधियां चला रहे हैं।
अनेक निगमों ने या तो किसी देच्च में अपनी कोई सहयोगी कंपनी खोल ली है या किसी देश कंपनी के साथ साझेदारी कर ली है। हमारे देश देश में ही अनेक बहुराष्ट्रीय मीडिया निगम के भारतीय संस्करण बाजार में उपलब्ध हैं। ये निगम अपनी गतिविधियों के विस्तार के लिए स्थानीयकरण की ओर उन्मुख हैं और स्थानीय जरूरतों और रुचियों के अनुसार अपने उत्पादों को ढाल रहे हैं। इस तरह भूमंडलीकरण स्थानीयता का रूप ग्रहण कर रहा है और बहुराद्गट्रीय निगमों की यह स्थानीयता दरअसल उपभोक्त मूल्यों और व्यापार संस्कृति को प्रोत्साहित करते हैं। मीडिया के इस तरह के केन्द्रीयकरण से के ऐसा बाज़ार पैदा हुआ है जिसमें विविधता ख़त्म हो रही है और हर मीडिया में एक ही तरह के समाचार (उत्पाद) छाए रहतें हैं। आज विषयवस्तु का बाज़ार मूल्य अहम् नहीं रह गया है बल्कि इसे बेचने वाला तंत्र अधिक भूमिका निभा रहा है। आज का मीडिया एक ओर तो वैश्विक व्यापार-वित्त के फैलाव के रास्तों का निर्माण कर रहा है और दूसरी और खुद भी एक व्यापार बन गया है ।
राजनीतिक, सामाजिक और संस्कृतिक जीवन का मनोरंजनीकरण
मीडिया उद्योग एक तरह के सांस्कृतिक और वैचारिक उद्योग हैं। इन उद्योगों पर नियंत्रण का अर्थ होता है किसी देश की राजनीति और संस्कृति पर नियंत्रण. दुनिया के अनेक देशों में अमेरिकी सांस्कृतिक आक्रमण को लेकर असंतोष पनप रहा है जिनमें केवल विकासशील देश ही नहीं बल्कि यूरोप के अनेक विकसित देश भी शामिल हैं. नव उदारवादी भूमंडलीकरण के झंडावरदार विश्व व्यापार संगठन में यह मांग भी उठाई गई थी की इन संस्कृति को व्यापार से अलग रखा जाए लेकिन इसे स्वीकार नहीं किया गया और आज विचार और संस्कृति दोनों ही व्यापार के अधीन दिखाई पड़ते हैं.
व्यापरिकृत मीडिया मुनाफे से संचालित होता है. मुनाफे को अधिकतम स्तर पर पहुँचने ले लिए बाज़ार की होड़ पैदा हुयी । इसके कारण एक नरम (सॉफ्ट) मीडिया का उदय हुआ है जो कडे-कठोर विषयों का नरमी से पेश कर लोगों को रिझाना चाहता है और कुल मिलाकर इस तरह गंभीर राजनीतिक विमर्श ह्रास हो रहा है। इस बाजार होड के कारण मीडिया उन उत्पादों की ओर झुकने लगा जो व्यापक जनसमुदाय को आकृष्ट कर सकें। यह मीडिया तंत्र पर उन वैश्विक ताकतों का नियंत्रण है जो अपने व्यापारिक एजेंडा थोपने के लिए राजनीतिक, सामाजिक और संस्कृतिक जीवन के हर पक्ष का मनोरंजनीकरण कर रहे हैं। आज विज्ञानं से लेकर खेल तक हर चीज मनोरंजन है
बाजार को हथियाने की होड़ में 'इन्फोटेनमेंट' नाम के नये मीडिया उत्पाद का जन्म हुआ है जिसमें सूचना के स्थान पर मनोरंजन को प्राथमिकता मिलती है। इसके तहत सूचना की विद्गायवस्तु बौद्धिक स्तर पर इतनी हल्की और मनोरंजक बना दी जाती है कि वह एक विच्चाल जनसमुदाय को आकृष्ट कर सके। मनोरंजन से अधिक लोगों को आकृष्ट किया जा सकता है लेकिन अत्यधिक मनोरंजन से सूचना के तत्त्व का ह्रास होता है ओर इस प्रक्रिया में मीडिया लोगों को सूचना देने के बजे उन्हें लुभाकर विज्ञापनदाताओं के हवाले करता है ।अनेक अवसरों पर इस तरह के समाचार और समाचार कार्यक्रम पेच्च किये जाते है कि वे लोगों का ध्यान खींच सकें भले ही साख और विश्वनीयता के स्तर पर वे कार्यक्रम खरे न उतरते हों।
नव-उदारवादी अर्थव्यवस्था के उदय के उपरांत उपभोक्ता की राजनीति और उपभोक्तावादी संस्कृति का उदय हुआ और इसका सीधा असर समाचारों पर पड़ा। नव-उदारवादी अर्थव्यवस्था में नये-नये उपभोक्ता उत्पाद बाजार में आए और इनको बेचने के लिए नयी-नयी मीडिया तकनीकों का इस्तेमाल किया गया जिसके परिणामस्वरूप 'सेलेब्रिटी लाइफस्टाइल' पत्रकारिता का उदय हुआ। एक नये मेट्रो बाजार का उदय हुआ और इसके अनुरूप नये-नये उपभोक्ता उत्पादों की बाढ -सी आ गयी लेकिन देर सवेर इस बाजार और इस बाजार की मांग में ठहराव आना स्वाभाविक है। इस स्थिति में बााजार और समाचार के संबंध भी प्रभावित होंगे।
इसके साथ ही 'पॉलिटिकॉटेनमेंट' की अवधारणा का भी उदय हुआ है जिसमें राजनीति और राजनीतिक जीवन पर मनोरंजन उद्योग हावी हो रहा है। राजनीति और राजनीतिक जीवन के विद्गायों का चयन, इनकी व्याखया और प्रस्तुतीकरण पर मनोरंजन के तत्व हावी होते चले जा रहे हैं। कई मौकों पर बडे राजनीतिक विषयों को सतही रूप से और तमाशे के रूप में पेश किया जाता है और आलोचनात्मक होने का आभास भर पैदा कर वास्तविक आलोचना किनारे कर दी जाती है। कई अवसरों पर टेलीविजन के परदे पर प्रतिद्वंदी राजनीतिज्ञों की बहसों का इस दृद्गिट से मूल्यांकन करें तो यह तमाशा ही अधिक नज र आता है। इन बहसों में वास्तविक विषयों और विभिन्न राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य नदारद रहते हैं। इस तरह के कार्यक्रम बुनियादी राजनीति मदभेदों के स्थान पर तू तू-मैं मैं के मनोरंजन की ओर ही अधिक झुके होते हैं। इससे अनेक बुनियादी सवाल पैदा होते हैं और राजनीति के इस सतहीकरण और एक हद तक विकृतीकरण से लोकतंत्र के हृास का आकलन करना जरूरी हो जाता है।
व्यापारीकरण के उपरांत राजनीतिक जीवन और राजनीतिक मुद्दों के सतहीकरण और मनोरंजनीकरण का रुझान प्रबल हुआ है। राजनीति और राजनीतिक जीवन के सतहीकरण की इस प्रक्रिया का सबसे बड़ा हथियार सेलेब्रिटी संस्कृति का उदय है। सेलीब्रिटीज का राजनीति में प्रवेच्च हो रहा है जिससे राजनीतिज्ञ सेलेब्रिटीज बन रहे हैं। सेलेब्रिटी संस्कृति की वजह से राजनीतिक विमर्च्च के संदर्भ में एक नये टेलीविजन का उदय हुआ है। इससे वास्तविक मुद्दों को दरकिनार कर सतही मुद्दों पर जोर दिया जाता है और कई अवसरों पर तो गैर-मुद्दे भी मुद्दे बना दिए जाते हैं। गैर-मुद्दों को मुद्दा बना देने का रुझान का कुछ विचित्र आयाम ग्रहण कर रहा है।
व्यापारीकरण और उपभोक्ता संस्कृति के समानांतर एक नई राजनीतिक संस्कृति का भी उदय हुआ है जिसमें पत्रकारिता और पत्रकार अपनी स्वायतता काफी हद तक खो चुकें हैं और व्यापारिक हितों के अधीन होने को वाध्य हैं । इस कारण उपभोक्ताओं को आकृष्ट करने की होड में समाचारों को मनोरंजन के तत्वों का विस्तार होता जा रहा है और किसी तरह के भी पत्रकारीय प्रतिरोध का स्पेस सीमित हो गया है । मीडिया के जबरदस्त विस्तार और चौबीसों घंटे चलने वाले चैनलों के कारण भी समाचारों की मांग बेहद बढ गयी जिसकी वजह से ऐसी अनेक घटनाएं भी समाचार बनने लगी जो मुखयधारा की पत्रकारिता की कसौटी पर खरी नहीं उतरती थी।
शीत युद्ध के दौरान विचारधारात्मक राजनीतिक संघर्ष समाचारों के केंद्र में होते थे और लोगों की इनमे रूचि भी होती थे क्योंकि इनका परिणाम उनके जीवन और भविष्य को प्रभावित करता था । विकास की गति बढ ने से ऐसे सामाजिक तबकों का उदय हुआ जो उन तमाम मुद्दों के प्रति उदासीन होते चले गए जो इससे पहले तक ज्वलंत माने जाते थे और क्योंकि व्यापारित मीडिया का सरोकार इसी तबके से था इसलिए इसकी रुचियों तक ही मीडिया सीमित होता चला गया और वे समाचार हासिये पर जाते चले गए जिनका समाज के व्यापक तबकों से सरोकार था। इसी के समानांतर अतिरिक्त क्रय शक्ति वाले सामाजिक तबके के विस्तार के कारण मीडिया के व्यापारीकरण का दौर भी शुरू हुआ। यह नया तबका ही बाजार था और इस बाजार ने एक नया सामाजिक माहौल पैदा किया जिसमें 'ज्वलंत' समाचार 'ज्वलंत' नहीं रह गये और एक तरह की अराजनीतिकरण की प्रक्रिया द्राुरू हुई। अराजनीतिकरण की यह प्रक्रिया समाचारों से शुरू हुई और फिर स्वयं समाचारों के चयन को ही प्रभावित करने लगी।
इस कारण भी समाचारों का मूल स्वभाव और चरित्र प्रभावित हुआ और व्यापारीकरण की गति तेज हुई। लेकिन व्यापारीकरण की इस प्रक्रिया के प्रभाव और परिणामों के संदर्भ में विकसित और विकासशील देशों के बीच एक बड़ा बुनियादी अंतर है। विकसित देशों में व्यापारीकरण की यह प्रक्रिया तब द्राुरू हो गयी जब लगभग पूरा समाज ही विकास का एक स्तर हासिल कर चुका था। लेकिन विकासशील देशों में विकास की यह प्रक्रिया तभी द्राुरू कर दी गयी जब समाज का एक छोटा-सा तबका ही विकसित की श्रेणी में आ पाया था। विकासच्चील देशों में विकासशीलता के दौर में मीडिया से सहभागी होने की अपेक्षा की जाती थी जो संभव नहीं हो पायी और व्यापारीकरण के कारण विकास का एजेंडा काफी हद तक किनारे हो गया। विकासच्चील समाज पर व्यापारीकरण की इस प्रक्रिया के प्रभाव और परिणामों का सही मूल्यांकन कर पाना अभी संभव नहीं दिखता लेकिन इतना अवच्च्य कहा जा सकता है कि इसके नकारात्मक परिणाम सकारात्मक परिणामों की तुलना में कहीं अधिक व्यापक और गहरे होने जो रहे हैं। अपेक्षतया बौद्धिक रूप से कुशल उपभोक्ता-नागरिक और एक विकासशील समाज के एक 'आम' नागरिक पर एक ही तरह के मीडिया उत्पाद का प्रभाव भिन्न होगा- कहीं यह मनोरंजन-रोमांच पैदा कर सकता है, तो अन्यत्र यह वैज्ञानिक सोच पर कुठाराघात कर अन्धविश्वाश की जडों को गहरा कर सकता है।
लोकतांत्रिक विमर्श बनाम नियंत्रण
राजनीति एक तरह का 'शोबिज़नस' बन गयी है और मीडिया मैं लोकतांत्रिक विमर्श की लोक परिधि की परिकल्पना की गयी थी वह हासिये पर चली गयी है। आज काफी हद तक मीडिया जीवन के केंद्र में है। आज मानव जीवन का लगभग हर पक्ष मीडिया द्वारा संचालित हो रहा है । मीडिया इतना शक्तिशाली और प्रभावशाली हो गया है कि हर तरह का विमर्श मीडिया तक ही सीमित होता प्रतीत होता है । एक तर्क ये भी है कि लोकतंत्र का स्थान मीडियातंत्र ले चुका है।
एक ओर तो हर तरह का विमर्श अधिकाधिक मीडिया के माध्यम से हो रहा है, तो दूसरी ओर, मीडिया का व्यापारीकरण हो रहा है जिसकी वजह से व्यापक मीडिया विमर्श की बजाय मुनाफा कमाने का उद्यम बन चुका है।
मौजूदा दौर में संवाद और विमर्च्च के अनेक माध्यम लगभग विलुप्त और निद्गप्रभावी से हो गए हैं। लोकपरिधि की परिकल्पना का सीधा संबंध जनमत और दूसरे माध्यम से लोकतंत्र में लोगों की भागीदारी को लेकर था लेकिन आज एक ऐसा परिदृच्च्य पैदा हो रहा है कि किसी विद्गाय के पक्ष में भारी 'जनमत' होने के बावजूद भी पक्के तौर पर यह नहीं कहा जा सकता कि इस मुद्दे और इस जनमत को जनसंचार माध्यमों में अभिव्यक्ति मिले। सहमति के निर्माण की परिकल्पना भी कोई नयी नहीं रही है। बहुत पहले भी कहा गया था कि लोकतंत्र में जनसंचार माध्यमों के जरिये लोगों के बीच स्वाभाविक रूप से सहमति न होने पर भी एक ऐसे विमर्च्च का सृजन किया जा सकता है और इस विमर्च्च को ऐसे रास्ते पर ले जाया जा सकता है कि आखिर में किसी भी विद्गाय पर एक सहमति का निर्माण किया जा सके और इस तरह की निर्मित सहमति ही आधुनिक लोकतंत्र का आधार बन गई है। इसका आच्चय यह है कि यह सहमति स्वाभाविक रूप से जनता के बीच से उभर कर नहीं आई बल्कि ऊपर से एक विशिष्ट,
अभिजात शासक वर्ग ने इसे तैयार किया या यह भी कह सकते हैं कि इसे थोपा।
सहमति के निर्माण की इस परिकल्पना में भी हाल ही में भारी परिवर्तन आए हैं। अब आधुनिक जनसंचार माध्यम और इनके माध्यम से प्रचारित की गयी जानकारियां इस कदर विशेषकृत हो चुकी है कि इन्हें किसी खास मकसद के लिए खास तरह से ढाल कर लोगों को एक खास रास्ता चुनने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।
मीडिया परम्परागत रूप से निच्च्चय ही लोकतांत्रिक विमर्च्च के माध्यम रहे हैं; इन्होंने उनके लोकहित और सामाजिक मुद्दों को उठाकर बड़े परिवर्तनों का मार्ग प्रच्चस्त किया; सच्चक्तीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई सूचना संसाधन के लाभकारी उपयोग के मार्ग प्रच्चस्त हुए; सूचना और ज्ञान के संसार का भारी विस्तार हुआ । सूचना के स्रोतों में भारी वृद्धि हुई और लोगों के सामने हमने अनेक विकल्प प्रस्तुत किए। लेकिन सत्तर-अस्सी के दच्चक में मीडिया शक्ति और प्रभाव में भारी इजाफा हुआ और इसके साथ ही इनका स्वामित्व अधिकाधिक निगमीकृत होता चला गया। साथ ही वैचारिक संघर्द्गा की राजनीति के कमजोर पड ने से भी मीडिया पर जन-दबाव में कमी आई और व्यापारीकरण के रास्ते पर उन्मुख होने का इनका रास्ता आसान हो गया। इस दौरान मीडिया प्रबंधक की कला में निरंतर विकास हुआ और यह परिष्कृत होती चली गई।इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण इराक पर आक्रमण करने से पहले और आक्रमण करने के बाद भी अमेरिकी प्रशासन का मीडिया प्रबंधन और सूचना नियंत्रण रहा। स्वयं अमेरिका के मीडिया विच्चेद्गाज्ञों ने यह साबित कर दिया है कि इराक पर आक्रमण को लेकर अमेरिकी मीडिया के इस दौरे में सरकार द्वारा दी गई सूचनाओं पर ही निर्भर रहे और इस कारण तीन वर्षों तक इराक युद्ध को लेकर अमेरिकी नागरिकों को अंधेरे में रखा गया और युद्ध के पक्ष में जनमत निर्मित किया गया। इराक और अफगान युद्ध के मीडिया कवरेजे पर निगाह डालें तो स्पष्ट हो जाता है की किस तरह युद्ध को भी मनोरंजन के रूप में पेश किया गया और युद्ध की बर्बरतों
पर पर्दा डाला गया ।अफगानिस्तान एक ऐसा देश है जो 1989 से युद्ध की आग में जल रहा है लेकिन इस देश के लोगों की हालत पर मीडिया में कितना देखने, सुनाने या पढने को मिलता है केवल इतना ही बताया जाता है किस किस हमले में कितने आतंकवादी मारे गए।
आज इस तरह प्रबंधन और जनसंपर्क की तकनीकों का अधिकाधिक इस्तेमाल किया जा रहा है। सूचना विशेषज्ञों का वर्ग जनसंचार माध्यमों से ऐसी छवियों का निर्माण करता है जिससे जनमत को किसी खास दिच्चा में मोड़ा जा सकता है। इस तरह के सूचना प्रबंधन और जनसंपर्क तकनीकों के उदय के उपरांत राजनीति और राजनीतिक जीवन का इस तरह का मीडियाकरण हो गया है और इससे जनमत को प्रभावित करने में मीडिया की अहम भूमिका हो गई है। इस तरह के मीडियाकरण के कारण भी जनसंचार माध्यमों में जनमत के प्रतिबिंबित होने से कहीं अधिक भूमिका जनमत को प्रभावित करने की हो गई है।
भले ही यह न कहा जा सके कि मीडिया की यह भूमिका पूरी तरह विकृत हो चुकी है लेकिन इस बात की भी अनदेखी नहीं की जा सकती है कि लोकतंत्र का आधार एक सूचित और जानकार नागरिक ही हो सकता है। लेकिन व्यापारीकरण की प्रक्रिया और नई उपभोक्ता संस्कृति के उदय के बाद एक नागरिक का उपभोक्ता वाला पक्ष ही हावी होता चला गया है। एक नागरिक सही तरह से सूचित और जानकारी होता है वहीं वह कह सकते है कि एक उपभोक्ता सही ढ़ग से सूचित नहीं होता और अनेक अवसरों पर इसकी सोच को कुछ खास मकसद की पूर्ति के लिए ढाला जा सकता है। मीडिया के नागरिक से विमुख होकर उपभोक्ता पर केंद्रित होने से लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में अनेक ऐसे रुझान पैदा हो रहे हैं जिन्हें वास्तविक रूप से लोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता।
मीडिया की इस बदली भूमिका से सत्तासीन कुलीन वर्ग और नागरिकों के व्यापार समुदाय के बीच लोकतांत्रिक विमर्च्च का स्वरूप बदल ही नहीं गया है बल्कि इसमें निहित विमर्श के तत्वों में जबर्दस्त ह्नास हुआ है और नागरिक समुदाय के मत को तोड़ने-मरोड ने और विकृत करने के लिए सूचना प्रबंधन और जनसंपर्क की परिद्गकृत तकनीकें अस्तित्व में आई हैं। इससे नागरिक समुदाय की तुलना में सत्तासीन वर्ग की क्षमता बढ ी। मीडिया ने नियंत्रण और शासन के नए हथियार पैदा किए। इस पूरी प्रक्रिया में राजनीतिज्ञो, सूचना विच्चेद्गाज्ञों और पत्रकारों की धुरी के पैदा होने से जनमत को किसी खास पक्ष में मोड ने की क्षमता में जबरदस्त वृद्धि हुई।
समाचारीय घटनाओं के बदलते मानदंड
समाचारों के विद्गाय चयन, समाचार या घटनाओं को परखने की पंरपरागत सोच और दृद्गिटकोण के पैमाने और मानदंड बेमानी हो गये। इसके परिणामस्वरूप आज का उपभोक्ता-नागरिक इस बात को नहीं समझ पाता है कि देश -दुनिया की महत्त्वपूर्ण घटनाएं कौन-सी हैं? परंपरागत रूप से मीडिया एक ऐसा बौद्धिक माध्यम होता था जो लोगों को यह भी बताता था कि कौन सी घटनाएं उनके जीवन से सरोकार रखती हैं और उनके लिए महत्त्वपूर्ण है। इस तरह मीडिया एक तरह का मध्यस्थ भी होता है जो किसी घटना को एक संदर्भ में पेच्च करता है, इसे अर्थ देता है और एक परिप्रेक्ष्य में इसे प्रस्तुत करता है। आज का मीडिया मध्यस्थ की इस भूमिका को बहुत प्रभावच्चाली ढंग से निभाता प्रतीत नहीं होता। इस दृद्गिट से समाचारों को नापने-परखने के कुछ सर्वमान्य मानक होते थे। आज ये सर्वमान्य मानक काफी हद तक विलुप्त से हो गये हैं और एक उपभोक्ता-नागरिक समाचारों के समुद्र में गोते खाकर कभी प्रफुल्लित होता है, कभी निराच्च होता है और कभी इतना भ्रमित होता है कि समझ ही नहीं पाता कि आखिर हो क्या रहा है? रेडियो, टेलीविजन, सिनेमा, टेलीफोन, इंटरनेट, मोबाइल सभी का उपयोग करने वाले उपभोक्ताओं की संखया में निरंतर और तेजी से वृद्धि हो रही है। लेकिन उनके माध्यम से प्रसारित होने वाले सूचना-संदेशों अंतरवस्तु कुल मिलकर सतही है और इसका मूल चरित्र "चैट" तक तक ही सिमित होता प्रतीत होता है । आज में मीडिया के हर विमर्श और उत्पाद में "चैट" संस्कृति की झलक दिखाई पड़ती है ।
मीडिया से ही लोगों को किसी विषय के बारे में अधिकांश जानकारियां मिलती हैं जिसमें किसी विषय के बारे में सूचना और विचार और इससे सृजित होने वाला ज्ञान द्राामिल है। आधुनिक समाज के संदर्भ में हम कह सकते हैं कि छवि का संचार है। किसी भी ऐसे विषय के बारे में हम इसके बारे में प्राप्त सूचनाओं के आधार पर ही इसकी एक छवि विकसित करते हैं और इस विषय पर यही छवि हमारे लिए यथार्थ होती है। वास्तविक रूप से दुनिया का यह एक छोटा-सा ही हिस्सा होता है जो स्वयं हमारे अपने प्रत्यक्ष अनुभवों के दायरे में होता है और इसके बारे में कोई जानकारी के लिए हम किसी बाहरी सूचना माध्यम पर निर्भर न होकर खुद ही इसके बारे में जानकारी हासिल करते हैं। लेकिन हमारे प्रत्यक्ष दायरे की इस छोटी सी दुनिया के बाहर का जो व्यापक संसार है उसके बारे में हमें जो बताया जाता है उसी के अनुसार हम इसके यथार्थ का सृजन करते हैं।
किसी भी विषय पर सूचनाएं प्राप्त करने के अनेक साधन हो सकते हैं। संचार के अनेक तरीकें से अनेक विषय के बारे में हमें सूचनाएं मिलती हैं या हम सूचनाएं इकट्ठा करते हैं। वर्त्तमान में लोग किसी भी विषय पर जानकारियां हासिल करने के लिए लोग अधिकाधिक मीडिया पर निर्भर होते जा रहे हैं। दुनिया में सूचना क्रांति के दौरान सूचनाओं का विशाल महासागर पैदा हो गया है लेकिन इसके साथ ही हमारे पड़ोस में होने वाली घटनाओं के बारे में भी जानकारी हमें मीडिया से ही मिलती है और इसी के आधार पर हम कोई मत और दृद्गिटकोण विकसित करते हैं। इस संदर्भ में यह भी समझना जरूरी हो जाता है कि मीडिया किन घटनाओं, विचारों और समस्याओं को समाचार योग्य समझते हैं और फिर इनके किस पक्ष और पहलू को कितना महत्त्वपूर्ण आंकते हैं। घटना के किसी एक खास पक्ष को उजागर कर घटना के बारे में पहला प्रभाव पैदा कर दिया जाता है।
इस दृद्गिट से मीडिया एक मध्यस्थ की भूमिका अदा करता हैं और हमें बताता हैं कि देच्च और दुनिया की महत्त्वपूर्ण घटनाएं कौन-सी हैं और फिर, इन घटनाओं के बारे में जानकारियों का चयन कर इन्हें कुछ अर्थ प्रदान करते हैं, एक परिप्रेक्ष्य में इनका प्रस्तुतीकरण करते हैं। चयन और प्रस्तुतीकरण की इस प्रक्रिया से ही मीडिया हमें बताते हैं कि कौन से विषय महत्त्वपूर्ण हैं और इन विषय बारे में हमें किस तरह सोचना चाहिए और इस तरह इन विद्गायों पर एक जनमत के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। मीडिया हमें भले ही यह न बताते हों कि हम क्या सोचें लेकिन काफी हद तक यह बताने में सफल होते हैं कि वे विषय कौन-से हैं जिनके बारे में हमें सोचना चाहिए। इसके समानातंर ढेर सारे ऐसे विषय और घटनाएं होती हैं जिन्हें मीडिया में कोई उल्लेख नहीं होता।
सूचना विस्फोट के उपरांत उभरे मीडिया से इस जन के विचार की अपेक्षाएं पूरी होने के बजाय इससे यह कुछ बेडोल और बेमेल हो गई है। पश्चिमी बुद्धिजीवियों के एक वर्ग ने तो यहां तक कह दिया है कि विकसित देशों में जिनके बारे में यह पाया गया है कि वे सूचना समाज में परिवर्तित हो चुके हैं, वहां लोग सूचित कम हैं और गलत सूचनाओं के शिकार अधिक हैं। अमेरिका में एक सर्वेक्षण में तो यह निद्गकर्द्गा निकला गया था कि जो लोग टेलीविज न अधिक देखते हैं, इराक युद्ध के बारे में उनकी समझ उन लोगों से कम हैं जो टेलीविजन अधिक नहीं देखते हैं।
व्यापारीकृत मीडिया के पब्लिक एजेंडा से हटने से इसके द्वारा दी जाने वाली जानकारियों की साख और विच्च्वसनीयता को लेकर भी अनेक सवाल उठ रहे हैं। साख और विश्वनीयता के इस संकट को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि तात्कालिक रूप से यह अल्पावधि के लिए जनमत को प्रभावित करने की व्यापारीकृत मीडिया की जो क्षमता दिखाई पडती है उसका दीर्घकाल में टिकाऊ रहना संभव नहीं है। किसी खास विषय पर मीडिया जनमत को निर्णायक रूप से प्रभावित कर सकते हैं लेकिन साख और विच्च्वसनीयता पर उमड रहे संकट के बादलों को देखते हुए दीर्घकाल में मीडिया की भूमिका पर पर नए सवाल पैदा होतें हैं । निगमीकृत मुख्यधारा मीडिया के इस साख के संकट से वैकल्पिक मीडिया के लिए स्पेस पैदा हो सकता है ।
वैकल्पिक मीडिया
मीडिया उत्पादों के वैच्च्िवक प्रवाह के बाधाविहीन बनने के बाद एक नये तरह का सूचना और संचार का परिदृश्य पैदा हुआ है। समकालीन परिदृश्य में मीडिया उत्पादों और इनके वितरण के माध्यमों में भी बुनियादी परिवर्तन आ रहे हैं। प्रिंट, रेडियो, टेलीविजन और मल्टीमीडिया इंटरनेट बहुत सारे मीडिया उत्पाद और व्यापक विकल्प पेश कर रहे हैं। दूरसंचार, सेटेलाइट और कंप्यूटर से आज इंटरनेट के रूप में एक ऐसा महासागर पैदा हो गया है जहां मीडिया की हर नदी, हर छोटी-मोटी धाराएं आकर मिलती हैं। इंटरनेट के माध्यम से आज किसी भी क्षण दुनिया के किसी भी कोने में संपर्क साधा जा सकता है। इंटरनेट पर सभी समाचार पत्र, रेडियो और टेलीविजन चैनल उपलब्ध हैं। आज हर बड़े से बडे और छोटे से छोटे संगठनों की अपनी वेबसाइट हैं जिन पर इनके बारे में अनेक तरह की जानकारियां हासिल की जा सकती हैं।
इंटरनेट पर नागरिक पत्रकार ने भी अपनी प्रभावच्चाली उपस्थिति दर्ज की है। इंटरनेट पर ब्लॉगों के माध्यम से अनेक तरह की आलोचनात्मक बहसें होती हैं, उन तमाम तरह के विचारों को अभिव्यक्ति मिलती है जिनकी मुखयधारा का कॉरपोरेट मीडिया अनदेखी ही नहीं उपेक्षा भी करता है क्योंकि इनमें कॉरपोरेट व्यापारिक हितों पर कुठाराघात करने की भी क्षमता होती है। भले ही ब्लॉग एक सीमित तबके तक ही सीमित हो लेकिन फिर भी ये समाज का एक प्रभावच्चाली तबका है जो किसी भी समाज और राद्गट्र को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। ब्लॉगिंग ने अत्यधिक व्यापारीकृत मीडिया बाजार में अपनी प्रभावच्चाली उपस्थिति दर्ज करायी है। विकसित देच्चों में लगभग एक-चौथाई आबादी इंटरनेट का इस्तेमाल करती है इसलिए ब्लॉग अभिव्यक्ति के एक प्रभावच्चाली माध्यम बन चुके हैं। विकासच्चील देच्चों में भी ब्लॉग लोकतांत्रिक विमर्च्च के मानचित्र पर अपनी प्रभावच्चाली उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। ब्लॉग निच्च्चय ही आज के सूचना-शोरगुल वाले मीडिया बाजार की मंडी में एक वैकल्पिक स्वर को अभिव्यक्त करता है। लेकिन इस नये वैकल्पिक मीडिया में कुछ निहित कमजोरियां भी हैं।
मीडिया बाजार में उपस्थित शक्तिशाली तबके ब्लॉग की दुनिया को भी प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। बड़े कारपोरेट संगठन और सरकारी एजेंसियां अनेक ब्लॉग खोलकर या पहले से ही सक्रिय ब्लॉगों में प्रवेच्च कर इस लोकतांत्रिक विमर्च्च को प्रभावित करने की अपार क्षमता रखते हैं। ऐसे में शक्तिशाली संगठनों का ब्लॉग संसार में दखल और उसके परिणामों का आकलन करना भी जरूरी हो जाता है। मीडिया के केन्द्रीकरण और विकेन्द्रीकरण को समझने के लिए द्राक्तिच्चाली संगठनों की इस क्षमता की उपेक्षा नहीं की जा सकती। ब्लॉग के गुरिल्ला ने व्यापारीकृत मीडिया के बाजार में प्रवेच्च कर हलचल तो पैदा कर दी है लेकिन अभी ये देखा जाना बाकी है कि यह इस मंडी में अपने लिए कितने स्थान का सृजन कर पाता है और किस हद तक कॉरपोरेट और सरकारी संगठनों के इसे विस्थापित करने के प्रयासों को झेल पाता है।
इस दृद्गिट से सबसे अधिक आच्चावाद इस बात से पनपता है कि मुखयधारा कॉरपोरेट मीडिया के समाचारों और मनोरंजन की अवधारणाओं में जो रुझान पैदा हो रहे हैं उससे इसकी साख और विच्च्वसनीयता में जबरदस्त गिरावट आ रही है। इस रुझान के कारण अब लोग इस तरह के समाचारों से ऊबने लगे हैं, निराच्च होने लगे हैं। मुखयधारा कॉरपोरेट मीडिया की साख में इस गंभीर संकट से ब्लॉग संसार के लिए अपने स्थान से विस्तार की नयी संभावनाएं पैदा हो गयी हैं।
निष्कर्ष
प्रोद्योगिकीय क्रांति के उपरांत एक ऐसे सूचना समाज की कल्पना की गयी थी जिसमें सूचना एक एक ऐसा बुनियादी संसाधन होगा जो मानव सभ्यता के सकारात्मक विकास का मार्ग प्रशस्त्र करेगा। दुनिया भर के लोगों का सूचना संसाधन के बल पर सशक्तिकरण होगा और वे राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक जीवन में अधिक सक्रिय भागीदार बन सकेंगे। निश्चय ही एक स्तर पर इस क्रांति ने विमर्श के नए माध्यम सृजित किये हैं और आर्थिक पटल पर उत्पादकता और कार्य कुशलता बढ़ने में अहम् भूमिका अदा की है । लेकिन वैश्विक स्थर पर इस क्रांति ने नियंत्रण के अत्यंत परिष्कृत और प्रभावशाली हथियार भी सृजित किये हैं जिनके बल पर प्रोद्योगिकी, वित्त और सूचना का एक ऐसा गठजोड़ जिसने इक ऐसे एक नए सत्तातंत्र को जन्म दिया है जिसकी ताकत बेमिसाल है और जिसका नियंत्रण चंद बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथ में है। यह सूचना सत्तातंत्र आज दुनिया में नव उदारवादी भूमंडलीकरण का झंडावरदार है. बहुराष्ट्रीय कंपनियों और इस सूचना सत्तातंत्र का आज दुनिया पर प्रभुत्व कायम हो गया है और नए वैश्विक बाज़ार पर इनका नियंत्रण इतना मज़बूत है की अगर कोई देश इनके अनुकूल नीतियों पर नहीं चलता तो यह सत्तातंत्र उसकी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को तहस नहस करने की क्षमता रखता है। पिछले कुछ वर्षों के वित्तीय संकटों से साफ़ ज़ाहिर है की इस सत्तातंत्र की ताकत कितनी बेमिसाल है।
नवउदारवादी भूमंडलीकरण की प्रक्रिया ने दुनिया के अनेक देशों में सम्पति के सृजन के नए मार्ग प्रशस्त किये और पिछले बीस वर्षों में अनेक देशों में एक ऐसे मध्यम वर्ग का उदय और विस्तार हुआ और जिसकी क्रयशक्ति इतनी तेज़ी से बढ़ी कि इसने एक बहुत बड़े बाज़ार को जन्म दिया, एक नए उपभोक्ता को पैदा किया, नए उपभोक्ता मूल्य सृजित किये जिसने नव उदारवादी विचारधारा को एक बेहद उपजाऊ ज़मीन मुहैया की। आज का वैश्विक बाज़ार दुनिया भर के इस अतिरिक्त क्रयशक्ति वाले मध्यम वर्गीय उपभोक्ता पर टिका है।
इतिहास के मौजूदा दौर में मानव जीवन पर सूचना सत्ता तंत्र का नियंत्रण बेमिसाल है और कभी कभी लगता है इसे भेद पाना क्या संभव हो पायेगा ? लेकिन दुनिया का इतिहास और ख़ास तौर से मज़बूत सोवियत समाजवाद का अनुभव यही बताता है की नियंत्रण जितना अधिक मज़बूत होता है इसके ढहने का आवेक भी उतना ही तेज होगा। नयी सूचना क्रांति में अनेक ऐसे माध्यम सृजित किये हैं जो असहमति और असंतोष की अभिव्यक्ति के मंच के रूप में विकसित हो रहे हैं। भले ही आज ब्लॉग की दुनिया की ताकत सूचना सत्तातंत्र के सामने बौनी नज़र आती है लेकिन मुक्त अर्थ व्यवस्था पर समय-समय पर आने वाल आर्थिक संकट इस ओर भी इशारा करते हैं कि बाज़ार की ताकत उतनी नहीं हैं जितना नवउदारवाद इसका ढोल पीटता है। हाल ही के आर्थिक संकट इस और इशारा करतें हैं की बाज़ार और प्रोद्योगिकी की ताकत बेतहाशा होते हुए भी किन्ही ख़ास परिस्थितियों में खोखली साबित हो सकती है। 2009 के आर्थिक संकट के दौरान दुनिया की सबसे बड़ी वित्त कंपनी लेहमान ब्रदर्स के दीवालिया होने पर यह कहा गया था कि जिस तरह बर्लिन की दीवार का ढहना सोवियत समाजवाद का पतन का प्रतीक था, उसी तरह लेहमान ब्रदर्स का दीवालिया होना पूँजीवाद के पतन का प्रतीक है। इस पृष्टभूमि में, बहुराष्ट्रीय सूचना सत्तातंत्र और इसकी प्रभुत्वकारी नवउदारवादी विचारधारा और छोटे से ब्लॉगतंत्र के असंतोष और असहमति के स्वरों बीच के भावी सत्ता समीकरण का मूल्याकन करना भी आवश्यक हो जाता है।
अपने आप से डरा एक साम्राज्य
शीत युद्ध ख़त्म होने के बाद के दशक में विजय के उफान में सरोवर अमेरिका ने एक ऐसी विश्व व्यवस्था का सपना बुना जिसमें अमेरिका के प्रभुत्व के लिए कभी कोई चुनौती न उभर पाए । इस दौरान अनके बहसें चलीं । एक तर्क था की शीत युद्ध में पश्चिम की विजय का अर्थ हैं कि पश्चिमी उदार लोकतंत्र और मुक्त अर्थ व्यवस्था का मानव सभ्यता के विकास का अंतिम पड़ाव है इस इसका अब कोई विकल्प शेष नहीं रहा गया है । एक नयी अमेरिकी सदी का सपना बुना गया और ये तर्क दिया गया की अब अमेरिका को अपनी बेमिसाल सैनिक ताकत का इस्तेमाल दुनिया के "सभ्य और लोकत्रांत्रिक" बनाने के लिए करना चाहिए । 9 /11 हमलों के उपरांत अमेरिका जे अपना प्रभुत्व पुख्ता करने के लिए पहले अफगानिस्तान और फिर इराक के खिलाफ प्रत्यक्ष सैनिक अभियान छेड़े सुरक्षा परिषद् को दरकिनार किया और तत्कालीन राष्ट्रपति बुश ने ऐलान किया की अमेरिका कहीं भी किसी खतरे के संभावना पैदा होने पर भी इसे सैनिक ताकत से कुचल देगा । 9 /11 के बाद पूरी दुनिया जो अमेरिका के साथ खडी थी, बुश के इस एलान से सहम सी गयी ।
लेकिन दुनिया में लोकत्रंत्र के निर्यात का यह प्रोजेक्ट और "लोकत्रांत्रिक साम्राज्य" कायम करने का अभियान अपने शुरूआती दौर में ही चरमरा गया । पहले अफगानिस्तान और फिर इराक में लोकत्रंत्र तो दूर न्यूनतम स्थायित्व कायम करना भी संभव नहीं दीखता और अमरीकी सेना को हटाना ही कठिन हो गया है और पूरा प्रोजक्ट एक साम्राजवादी कब्जे जैसा ही अधिक दिखता है । भले हे सैनिकों के कटौती के बातें के जा रहीं हैं पर यह निश्चित जान पड़ता है के इन दोनों देशों पर अमेरिका नियंत्रण नहीं छोड़ेगा और लम्बे समय तक अमेरिकी सैनिक यहाँ बने रहेंगे ।
शीत युद्ध के बाद के अमेरिका और आज के अमेरिका में भारी अंतर दिखाई पड़ता है । चंद दिनों पहले राष्ट्रपति ओबामा के "स्टेट ऑफ़ यूनियन" अभिभाषण का मूल्याकन अगर 9 /11 बाद के तमाम अभिभाषणओं के संदर्भ में किया जाये तो ये अंतर स्पष्ट हो जाता है । 2002 में बुश युद्ध की दहाड़ लगा रहे थे वहीँ आज ओबामा कह रहे हैं की अमेरिका "गूगल और फेसबुक का राष्ट्र " है । पिछले वर्ष अपने "स्टेट ऑफ़ यूनियन" अभिभाषण में ओबामा ने कहा था की "दुनिया में अमेरिका का दूसरा स्थान हो- ये हमें स्वीकार्य नहीं है " और आज जब वे ये कहते हैं के अमेरिका को चीन, यूरोप और अन्य आर्थिक प्रतिद्वंदीयों से आगे बनाये रखने के लिए अनुसन्धान , प्रोद्योगिकी और शिक्षा पर ध्यान देना होगा । अमेरिका 2002 के 'हार्ड' से 2011 आते आते तक इतना 'सोफ्ट' क्यों और कैसे हो गया ? ओबामा 'परिवर्तन' और 'आशा' के नारों पर चुनाव जीते लेकिन आज अमेरिका में हुए अनेक जनमत संग्रहों से पता चलता हैं की भविष्य को लेकर अमेरिकीयों का विश्वास डगमगा रहा है ।
आम अमेरिकी और भी अधिक निराश है । आशा और परिवर्तन के ओबामा के नारे 2009 की मंदी और इसके बाद से ही उठ रहे आर्थिक संकटों के दलदल में समां गए हैं । अमेरिकी सत्ता और समाज के विभिन्न तबकों के बीच के अंतर्विरोध तेज़ हो रहे हैं । अमेरिका के बहुराष्ट्रीय सत्ता प्रतिष्ठान, निर्वाचित सरकार और आम अमेरिकी के हितों में हमेशा से ही टकराव रहा है लेकिन आज यह टकराव एक ऐसे मुकाम पर जाता नज़र आता है जहाँ से परंपरागत सत्ता समीकरण को बदले बिना तालमेल बिठाये मुश्किल दिखाई पड़ता है । अमेरिकी समाज और व्यवस्था के मौजूदा संकट से उभरने के लिए अमेरिकी सरकार को बहुराष्ट्रीय सत्ता प्रतिष्टान और आम अमेरिकी के हितों के बीच तालमेल बिठाये रखना कठिन होता जा रहा है ।
ओबामा का अभिभाषण अमेरिकी व्यवस्था और समाज के इन अंतर्विरोधों को ही अधिक अभिव्यक्त करतें हैं। दुनिया भर में फैला अमेरिकी साम्राज्य आज एक बार फिर अनुसन्धान , प्रौद्योगिकी और शिक्षा के अपनी ताकत के पुराना धरातल पर लौट रही है। इसी धरातल से अमेरिकी ताकत और अमेरिकी साम्राज्य का उदय हुआ था। आज का अमेरिका क्यों दुनिया के हर कोनें के अपने सैनिक अड्डों, सागर- महासागर में तैनात अपने जंगी बेड़ों और विनाशकारी नाभिकीय हथियारों से लैश अपनी मिशाइलओं की ताकत का अहंकार त्याग कर अपने आप को गूगल और फेसबुक की धरती बता कर अपनी ताकत का एहसास करा रहा है ।
निश्चय ही आज भी अमेरिका के ताकत बेमिसाल है । कोई भी अन्य ताकत अपने बूते के बजाय अमेरिकी ताकत मैं ह्रास के कारण ही इसके समकक्ष खड़ी हो सकती है । ऐसे में अमेरिका की वर्चस्व को चुनौती बाहर से नहीं अपने अन्दर से ही है । इतनी विशाल आर्थिक ताकत के बावजूद आम अमेरिकी के कष्ट बढ़ते हे जा रहे हैं भले ही आज दुनिया कितनी हे क्यों न बदल रही हो पर अमेरिकी ताकत को बाहर से कम और भीतर से अधिक खतरा नज़र आता है । अमेरिकी प्रशासन आम अमेरिकी के समस्याओं को संबोधित करने में विफल हो रहा है अमेरिका और अमेरिके व्यवस्था दोनों हे आज एक नहीं अनेक संकटों से घिरें हैं ये संकट सतही नहीं बुनियादी हैं और इन पर पार पाने के लिए बुनियाद पर चोट करनी होगी और ये साम्राज्य इतना विशाल है और इसका सत्ता समीकरण इतने जटिल हैं कि ऐसा करना ओबामा या किसी भी अन्य राष्ट्रपति के लिए आसन नहीं है ।
मौजूदा आर्थिक संकट कहीं से भी ठहरने का नाम नहीं ले रहा है। अमेरिकी आर्थिक ताकत दुनियां में एक मुक्त वैश्विक बाज़ार पर टिकी है लेकिन दुनिया भर में और ख़ास तौर से यूरोप में आर्थिक राष्ट्रवाद का उदय हो रहा है और अनेक देश भूमंडलीकरण के मौजूदा प्रारूप से हटकर संरक्षणवाद का रास्ता बना रहे हैं जिससे मुक्त वैश्विक व्यवस्था पर खतरे के बदल मंडरा रहें हैं और इस तरह की स्थिति अमेरिका के लिए सबसे अधिक कठिन होगी । आज दुनिया का आर्थिक मानचित्र बदल रहा है और जाहिर है हर बदलाव के साथ तालमेल बिठाने उसे ही सबसे अधिक कशमकश का सामना करना होगा जिसके पास अपार शक्ति केन्द्रित है । नयी दुनिया के साथ तालमेल बिठाने के इसी एतिहासिक द्वन्द में ही आज का अमेरिका फंसा है ।
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लेकिन दुनिया में लोकत्रंत्र के निर्यात का यह प्रोजेक्ट और "लोकत्रांत्रिक साम्राज्य" कायम करने का अभियान अपने शुरूआती दौर में ही चरमरा गया । पहले अफगानिस्तान और फिर इराक में लोकत्रंत्र तो दूर न्यूनतम स्थायित्व कायम करना भी संभव नहीं दीखता और अमरीकी सेना को हटाना ही कठिन हो गया है और पूरा प्रोजक्ट एक साम्राजवादी कब्जे जैसा ही अधिक दिखता है । भले हे सैनिकों के कटौती के बातें के जा रहीं हैं पर यह निश्चित जान पड़ता है के इन दोनों देशों पर अमेरिका नियंत्रण नहीं छोड़ेगा और लम्बे समय तक अमेरिकी सैनिक यहाँ बने रहेंगे ।
शीत युद्ध के बाद के अमेरिका और आज के अमेरिका में भारी अंतर दिखाई पड़ता है । चंद दिनों पहले राष्ट्रपति ओबामा के "स्टेट ऑफ़ यूनियन" अभिभाषण का मूल्याकन अगर 9 /11 बाद के तमाम अभिभाषणओं के संदर्भ में किया जाये तो ये अंतर स्पष्ट हो जाता है । 2002 में बुश युद्ध की दहाड़ लगा रहे थे वहीँ आज ओबामा कह रहे हैं की अमेरिका "गूगल और फेसबुक का राष्ट्र " है । पिछले वर्ष अपने "स्टेट ऑफ़ यूनियन" अभिभाषण में ओबामा ने कहा था की "दुनिया में अमेरिका का दूसरा स्थान हो- ये हमें स्वीकार्य नहीं है " और आज जब वे ये कहते हैं के अमेरिका को चीन, यूरोप और अन्य आर्थिक प्रतिद्वंदीयों से आगे बनाये रखने के लिए अनुसन्धान , प्रोद्योगिकी और शिक्षा पर ध्यान देना होगा । अमेरिका 2002 के 'हार्ड' से 2011 आते आते तक इतना 'सोफ्ट' क्यों और कैसे हो गया ? ओबामा 'परिवर्तन' और 'आशा' के नारों पर चुनाव जीते लेकिन आज अमेरिका में हुए अनेक जनमत संग्रहों से पता चलता हैं की भविष्य को लेकर अमेरिकीयों का विश्वास डगमगा रहा है ।
आम अमेरिकी और भी अधिक निराश है । आशा और परिवर्तन के ओबामा के नारे 2009 की मंदी और इसके बाद से ही उठ रहे आर्थिक संकटों के दलदल में समां गए हैं । अमेरिकी सत्ता और समाज के विभिन्न तबकों के बीच के अंतर्विरोध तेज़ हो रहे हैं । अमेरिका के बहुराष्ट्रीय सत्ता प्रतिष्ठान, निर्वाचित सरकार और आम अमेरिकी के हितों में हमेशा से ही टकराव रहा है लेकिन आज यह टकराव एक ऐसे मुकाम पर जाता नज़र आता है जहाँ से परंपरागत सत्ता समीकरण को बदले बिना तालमेल बिठाये मुश्किल दिखाई पड़ता है । अमेरिकी समाज और व्यवस्था के मौजूदा संकट से उभरने के लिए अमेरिकी सरकार को बहुराष्ट्रीय सत्ता प्रतिष्टान और आम अमेरिकी के हितों के बीच तालमेल बिठाये रखना कठिन होता जा रहा है ।
ओबामा का अभिभाषण अमेरिकी व्यवस्था और समाज के इन अंतर्विरोधों को ही अधिक अभिव्यक्त करतें हैं। दुनिया भर में फैला अमेरिकी साम्राज्य आज एक बार फिर अनुसन्धान , प्रौद्योगिकी और शिक्षा के अपनी ताकत के पुराना धरातल पर लौट रही है। इसी धरातल से अमेरिकी ताकत और अमेरिकी साम्राज्य का उदय हुआ था। आज का अमेरिका क्यों दुनिया के हर कोनें के अपने सैनिक अड्डों, सागर- महासागर में तैनात अपने जंगी बेड़ों और विनाशकारी नाभिकीय हथियारों से लैश अपनी मिशाइलओं की ताकत का अहंकार त्याग कर अपने आप को गूगल और फेसबुक की धरती बता कर अपनी ताकत का एहसास करा रहा है ।
निश्चय ही आज भी अमेरिका के ताकत बेमिसाल है । कोई भी अन्य ताकत अपने बूते के बजाय अमेरिकी ताकत मैं ह्रास के कारण ही इसके समकक्ष खड़ी हो सकती है । ऐसे में अमेरिका की वर्चस्व को चुनौती बाहर से नहीं अपने अन्दर से ही है । इतनी विशाल आर्थिक ताकत के बावजूद आम अमेरिकी के कष्ट बढ़ते हे जा रहे हैं भले ही आज दुनिया कितनी हे क्यों न बदल रही हो पर अमेरिकी ताकत को बाहर से कम और भीतर से अधिक खतरा नज़र आता है । अमेरिकी प्रशासन आम अमेरिकी के समस्याओं को संबोधित करने में विफल हो रहा है अमेरिका और अमेरिके व्यवस्था दोनों हे आज एक नहीं अनेक संकटों से घिरें हैं ये संकट सतही नहीं बुनियादी हैं और इन पर पार पाने के लिए बुनियाद पर चोट करनी होगी और ये साम्राज्य इतना विशाल है और इसका सत्ता समीकरण इतने जटिल हैं कि ऐसा करना ओबामा या किसी भी अन्य राष्ट्रपति के लिए आसन नहीं है ।
मौजूदा आर्थिक संकट कहीं से भी ठहरने का नाम नहीं ले रहा है। अमेरिकी आर्थिक ताकत दुनियां में एक मुक्त वैश्विक बाज़ार पर टिकी है लेकिन दुनिया भर में और ख़ास तौर से यूरोप में आर्थिक राष्ट्रवाद का उदय हो रहा है और अनेक देश भूमंडलीकरण के मौजूदा प्रारूप से हटकर संरक्षणवाद का रास्ता बना रहे हैं जिससे मुक्त वैश्विक व्यवस्था पर खतरे के बदल मंडरा रहें हैं और इस तरह की स्थिति अमेरिका के लिए सबसे अधिक कठिन होगी । आज दुनिया का आर्थिक मानचित्र बदल रहा है और जाहिर है हर बदलाव के साथ तालमेल बिठाने उसे ही सबसे अधिक कशमकश का सामना करना होगा जिसके पास अपार शक्ति केन्द्रित है । नयी दुनिया के साथ तालमेल बिठाने के इसी एतिहासिक द्वन्द में ही आज का अमेरिका फंसा है ।
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Thursday, 23 December 2010
इतिहास से हारता एक देश
सुभाष धूलिया
हाल ही में भारत यात्रा के दौरान अमेरिकी राष्टपति बराक ओबामा ने थोड़ा हिचकिचाहट के साथ कहा कि ‘एक स्थिर और समृद्द पाकिस्तान ही भारत के हित में है’। आज ओबामा ये बात कह रहे हैं लेकिन सच्चाई ये है कि यही बात इन्ही शब्दों में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी वर्षों साल पहले कह चुके हैं। भारत का राजनीतिक नेतृत्व हमेशा से ही इस तरह की भावनाओं को अभिव्यक्त करता रहा है। लेकिन अब सवाल यह पैदा होता है कि खोखले और हिंसक उग्रवाद से घिरे पाकिस्तान को स्थिर और समृद्ध कैसे बनाया जाए ?
ओबामा अपनी भारत यात्रा के दौरान भले ही भारत की अनेक अपेक्षाओं पर खरे उतरे हों और कुछ अन्य पर सहमति ना बन पायी हो लेकिन ओबामा का ये कथन एक नये दौर का आगाज है कि ‘भारत एक उभरती महाशक्ति नहीं बल्कि पहले ही एक महाशक्ति बन चुका है’। सुरक्षा परिषद में भारत के स्थायी सदस्य के रूप में प्रवेश का रास्ता भले ही कितना भी लंबा क्यों ना हो लेकिन इस मसले पर भारत को अमेरिका के समर्थन से दोनों देशों के राजनीतिक संबंधों को नई ऊचाइयां मिली हैं। सुरक्षा परिषद के मुद्दे का वास्तविक से कहीं अधिक प्रतीकात्मक महत्व है जिससे पाकिस्तान के सत्ता गलियारों में खलबली सी मच गई है। ओबामा ने भले ही पाकिस्तान पर सीधा निशाना न साधा हो लेकिन जितना भी उन्होंने कहा वह पाकिस्तान को विचलित कर देने वाला है। आंतकवाद के संदर्भ में ओबामा ने सिर्फ इतना ही कहा कि पाकिस्तान सरकार उसको खत्म करने के लिये प्रयासरत है। इसका मतलब यह भी है कि इन प्रयासों को प्रयास तक ही सीमित नहीं रखा जा सकता।
पाकिस्तान के आंतरिक सत्ता समीकरणों को देखते हुए इसकी उग्रवाद से लड़ने की इच्छा और क्षमता पर अनेक प्रश्नचिन्ह खड़े होते हैं। पाकिस्तानी लोकतंत्र की बागडोर ऐसे लोगों के हाथ में है जो किन्ही खास परिस्थितियों में चुनाव जीते और देश के राजनीतिक जीवन में इनकी कभी कोई खास हस्ती नहीं रही। आज पाकिस्तानी सत्ता की वास्तविक बागडोर सैनिक प्रतिष्ठान के हाथ में है। सैनिक प्रतिष्ठान इस लोकतांत्रिक सरकार को इसलिए स्वीकार किये हुए है क्योंकि पहला तो ये सेना के ऐजेंडे में कोई रुकावट डालने की हिम्मत नहीं जुटा सकती और दूसरा सैनिक तख्तापलट अमेरिका को भी स्वीकार्य नहीं होगा।
इस्लामी उग्रवाद को लेकर पाकिस्तानी सैनिक प्रतिष्ठान के इतिहास पर एक नहीं अनेक काले धब्बे लगे हुए हैं। कश्मीर में आतंकवाद के पीछे पाकिस्तान के राजनीतिक नेतृत्व से कहीं बड़ा हाथ सैनिक प्रतिष्ठान का रहा है। अफगानिस्तान को अपने एक सामरिक क्षेत्र में तब्दील करने के मकसद से तालिबान को पाकिस्तानी सैनिक प्रतिष्ठान ने ही खड़ा किया था। तालिबान से पाकिस्तान ने इसलिए हाथ नहीं झाड़े थे कि उसे कोई इस्लामी उग्रवाद से कोई परहेज रहा हो बल्कि 9/11 के उपरांत अमेरिका सैनिक कार्रवाई का मन बना चुका था और अगर पाकिस्तान इस युद्ध में अमेरिका का साथ नहीं देता तो खुद भी अमेरिका के निशाने पर होता।
इस पृष्ठभूमि में पाकिस्तान आतंकवाद और उग्रवाद के खिलाफ जो भी अभियान चला रहा है और जिस तरह भी चला रहा है उसमें आस्था बहुत कम और मजबूरी कहीं अधिक है। पाकिस्तानी सैनिक प्रतिष्टान के इस्लामी उग्रवाद के साथ इतने गहरे रिश्ते रहे हैं कि इसमें अब भी ऐसे प्रभावशाली तत्व मौजूद है जो आतंकवादी गतिविधियों में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हैं। ऐसे में किसी भी आतंकवादी हमले की स्थिति में पाकिस्तान सरकार अपने आप को पाक-साफ अक्षम नजर आती है।
पाकिस्तान आज ऐसा विखंडित देश बन गया है जो दिशाहीन है और जिसकी आर्थिक दशा जर्जर है। यह एक ऐसी सैन्यीकृत व्यवस्था में जकड़ा हुआ है जो 21वीं सदी के साथ तालमेल बिठाने को तैयार नहीं है और जिसकी पूरी सोच युद्ध से प्रदूषित है। दुनिया के सभी देश आज इस बहुआयामी दुनिया में नये संतुलन, नये तालमेल बिठा रहे हैं पर पाकिस्तान अपनी सोच को युद्ध-प्रदूषित मानसिकता से मुक्त नहीं कर पा रहा है।
पाकिस्तान अब भी ओबामा की यात्रा के परिणामों को सही परिपेक्ष्य में नहीं देख पा रहा है और एक ऐसे ऐतिहासिक घटनाक्रम का विरोध कर रहा है जिसे रोका नहीं जा सकता। भारत आज एशिया की तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत है। आर्थिक संकट के बाद दुनिया काफी कुछ बदल गयी है और इसमें भारत जैसी उभरती हुई महाशक्तियों की भूमिका कहीं अधिक अहम हो चुकी है। भारत अमेरिका में 10 अरब डॉलर का निवेश करने जा रहा है जिससे अमेरिका में 50 हजार रोजगार के अवसर पैदा होंगे। पाकिस्तान को हर साल विकास के लिए अमेरिका से एक अरब डॉलर और सेना के लिए दो अरब डॉलर खैरात में मिल रहे है। अमेरिका को अपनी आर्थिक सेहत के लिए भारत की जरुरत है जबकि पाकिस्तान का उपयोग अफगान युद्ध तक ही सीमित है। आज चीन से भी पाकिस्तान पहले जैसे समर्थन की उम्मीद नही कर सकता क्योंकि चीन अमेरिका को पीछे छोडते हुए भारत का सबसे का सबसे बड़ा व्यापारिक सहयोगी बन चुका है। आज पाकिस्तान के पास ऐसा क्या है जो वह चीन और अमेरिका को दे सके।
ओबामा ने अफगानिस्तान के विकास में भारत के प्रयासों की भी सराहना की। पाकिस्तान अफगानिस्तान में एक पाकिस्तान-परस्त और भारत-विरोधी सत्ता कायम करना चाहता है लेकिन सच तो यह है कि अफगानिस्तान में पाकिस्तान का प्रभाव तभी तक कायम रह सकता है जब तक यह देश उग्रवादी हिंसा की चपेट में है। एक स्थिर अफगानिस्तान के उदय के उपरांत पाकिस्तान के पास अफगानिस्तान को देने के लिए भी क्या है जबकि अफगानिस्तान के पुनर्निमार्ण और विकास में मदद देने की भारत के पास अपार क्षमता है।
ऐसे में यह समझना मुश्किल है कि पाकिस्तान कैसे सोच सकता है कि कश्मीर को भारत से छीना जा सकता है। भारत के साथ तनाव बरकरार रखकर भले ही पाकिस्तानी सैनिक प्रतिष्टानों के निहित स्वार्थों की पूर्ति हो लेकिन इससे पाकिस्तान के व्यापक हितों को चोट पहुंच रही है और इसके विफल राष्ट्र होने का खतरा पैदा हो रहा है।
इन परिस्थितियों में पाकिस्तान भारत और अमेरिका की साझेदारी के साथ तालमेल बिठाने की बजाय छाती पीट रहा है और संकट से निकलने की कोशिश करने की बजाय इसमें और भी गहरा धंसता जा रहा है।
हाल ही में भारत यात्रा के दौरान अमेरिकी राष्टपति बराक ओबामा ने थोड़ा हिचकिचाहट के साथ कहा कि ‘एक स्थिर और समृद्द पाकिस्तान ही भारत के हित में है’। आज ओबामा ये बात कह रहे हैं लेकिन सच्चाई ये है कि यही बात इन्ही शब्दों में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी वर्षों साल पहले कह चुके हैं। भारत का राजनीतिक नेतृत्व हमेशा से ही इस तरह की भावनाओं को अभिव्यक्त करता रहा है। लेकिन अब सवाल यह पैदा होता है कि खोखले और हिंसक उग्रवाद से घिरे पाकिस्तान को स्थिर और समृद्ध कैसे बनाया जाए ?
ओबामा अपनी भारत यात्रा के दौरान भले ही भारत की अनेक अपेक्षाओं पर खरे उतरे हों और कुछ अन्य पर सहमति ना बन पायी हो लेकिन ओबामा का ये कथन एक नये दौर का आगाज है कि ‘भारत एक उभरती महाशक्ति नहीं बल्कि पहले ही एक महाशक्ति बन चुका है’। सुरक्षा परिषद में भारत के स्थायी सदस्य के रूप में प्रवेश का रास्ता भले ही कितना भी लंबा क्यों ना हो लेकिन इस मसले पर भारत को अमेरिका के समर्थन से दोनों देशों के राजनीतिक संबंधों को नई ऊचाइयां मिली हैं। सुरक्षा परिषद के मुद्दे का वास्तविक से कहीं अधिक प्रतीकात्मक महत्व है जिससे पाकिस्तान के सत्ता गलियारों में खलबली सी मच गई है। ओबामा ने भले ही पाकिस्तान पर सीधा निशाना न साधा हो लेकिन जितना भी उन्होंने कहा वह पाकिस्तान को विचलित कर देने वाला है। आंतकवाद के संदर्भ में ओबामा ने सिर्फ इतना ही कहा कि पाकिस्तान सरकार उसको खत्म करने के लिये प्रयासरत है। इसका मतलब यह भी है कि इन प्रयासों को प्रयास तक ही सीमित नहीं रखा जा सकता।
पाकिस्तान के आंतरिक सत्ता समीकरणों को देखते हुए इसकी उग्रवाद से लड़ने की इच्छा और क्षमता पर अनेक प्रश्नचिन्ह खड़े होते हैं। पाकिस्तानी लोकतंत्र की बागडोर ऐसे लोगों के हाथ में है जो किन्ही खास परिस्थितियों में चुनाव जीते और देश के राजनीतिक जीवन में इनकी कभी कोई खास हस्ती नहीं रही। आज पाकिस्तानी सत्ता की वास्तविक बागडोर सैनिक प्रतिष्ठान के हाथ में है। सैनिक प्रतिष्ठान इस लोकतांत्रिक सरकार को इसलिए स्वीकार किये हुए है क्योंकि पहला तो ये सेना के ऐजेंडे में कोई रुकावट डालने की हिम्मत नहीं जुटा सकती और दूसरा सैनिक तख्तापलट अमेरिका को भी स्वीकार्य नहीं होगा।
इस्लामी उग्रवाद को लेकर पाकिस्तानी सैनिक प्रतिष्ठान के इतिहास पर एक नहीं अनेक काले धब्बे लगे हुए हैं। कश्मीर में आतंकवाद के पीछे पाकिस्तान के राजनीतिक नेतृत्व से कहीं बड़ा हाथ सैनिक प्रतिष्ठान का रहा है। अफगानिस्तान को अपने एक सामरिक क्षेत्र में तब्दील करने के मकसद से तालिबान को पाकिस्तानी सैनिक प्रतिष्ठान ने ही खड़ा किया था। तालिबान से पाकिस्तान ने इसलिए हाथ नहीं झाड़े थे कि उसे कोई इस्लामी उग्रवाद से कोई परहेज रहा हो बल्कि 9/11 के उपरांत अमेरिका सैनिक कार्रवाई का मन बना चुका था और अगर पाकिस्तान इस युद्ध में अमेरिका का साथ नहीं देता तो खुद भी अमेरिका के निशाने पर होता।
इस पृष्ठभूमि में पाकिस्तान आतंकवाद और उग्रवाद के खिलाफ जो भी अभियान चला रहा है और जिस तरह भी चला रहा है उसमें आस्था बहुत कम और मजबूरी कहीं अधिक है। पाकिस्तानी सैनिक प्रतिष्टान के इस्लामी उग्रवाद के साथ इतने गहरे रिश्ते रहे हैं कि इसमें अब भी ऐसे प्रभावशाली तत्व मौजूद है जो आतंकवादी गतिविधियों में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हैं। ऐसे में किसी भी आतंकवादी हमले की स्थिति में पाकिस्तान सरकार अपने आप को पाक-साफ अक्षम नजर आती है।
पाकिस्तान आज ऐसा विखंडित देश बन गया है जो दिशाहीन है और जिसकी आर्थिक दशा जर्जर है। यह एक ऐसी सैन्यीकृत व्यवस्था में जकड़ा हुआ है जो 21वीं सदी के साथ तालमेल बिठाने को तैयार नहीं है और जिसकी पूरी सोच युद्ध से प्रदूषित है। दुनिया के सभी देश आज इस बहुआयामी दुनिया में नये संतुलन, नये तालमेल बिठा रहे हैं पर पाकिस्तान अपनी सोच को युद्ध-प्रदूषित मानसिकता से मुक्त नहीं कर पा रहा है।
पाकिस्तान अब भी ओबामा की यात्रा के परिणामों को सही परिपेक्ष्य में नहीं देख पा रहा है और एक ऐसे ऐतिहासिक घटनाक्रम का विरोध कर रहा है जिसे रोका नहीं जा सकता। भारत आज एशिया की तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत है। आर्थिक संकट के बाद दुनिया काफी कुछ बदल गयी है और इसमें भारत जैसी उभरती हुई महाशक्तियों की भूमिका कहीं अधिक अहम हो चुकी है। भारत अमेरिका में 10 अरब डॉलर का निवेश करने जा रहा है जिससे अमेरिका में 50 हजार रोजगार के अवसर पैदा होंगे। पाकिस्तान को हर साल विकास के लिए अमेरिका से एक अरब डॉलर और सेना के लिए दो अरब डॉलर खैरात में मिल रहे है। अमेरिका को अपनी आर्थिक सेहत के लिए भारत की जरुरत है जबकि पाकिस्तान का उपयोग अफगान युद्ध तक ही सीमित है। आज चीन से भी पाकिस्तान पहले जैसे समर्थन की उम्मीद नही कर सकता क्योंकि चीन अमेरिका को पीछे छोडते हुए भारत का सबसे का सबसे बड़ा व्यापारिक सहयोगी बन चुका है। आज पाकिस्तान के पास ऐसा क्या है जो वह चीन और अमेरिका को दे सके।
ओबामा ने अफगानिस्तान के विकास में भारत के प्रयासों की भी सराहना की। पाकिस्तान अफगानिस्तान में एक पाकिस्तान-परस्त और भारत-विरोधी सत्ता कायम करना चाहता है लेकिन सच तो यह है कि अफगानिस्तान में पाकिस्तान का प्रभाव तभी तक कायम रह सकता है जब तक यह देश उग्रवादी हिंसा की चपेट में है। एक स्थिर अफगानिस्तान के उदय के उपरांत पाकिस्तान के पास अफगानिस्तान को देने के लिए भी क्या है जबकि अफगानिस्तान के पुनर्निमार्ण और विकास में मदद देने की भारत के पास अपार क्षमता है।
ऐसे में यह समझना मुश्किल है कि पाकिस्तान कैसे सोच सकता है कि कश्मीर को भारत से छीना जा सकता है। भारत के साथ तनाव बरकरार रखकर भले ही पाकिस्तानी सैनिक प्रतिष्टानों के निहित स्वार्थों की पूर्ति हो लेकिन इससे पाकिस्तान के व्यापक हितों को चोट पहुंच रही है और इसके विफल राष्ट्र होने का खतरा पैदा हो रहा है।
इन परिस्थितियों में पाकिस्तान भारत और अमेरिका की साझेदारी के साथ तालमेल बिठाने की बजाय छाती पीट रहा है और संकट से निकलने की कोशिश करने की बजाय इसमें और भी गहरा धंसता जा रहा है।
इतिहास की वापसी !
सुभाष धूलिया
बर्लिन की दीवार को ढहे बीस वर्ष हो गए हैं। इस ऐतिहासिक घटना के साथ ही शीत युद्ध समाप्त हुआ था और जिसके परिणामस्वरूप 1981 में सोवियत संघ के अवसान के साथ ही एक वैकल्पिक विचारधारा और एक व्यवस्था का आदर्श भी ढह गया। बौद्धिक हलकों में समाजवाद और पूंजीवाद के भविष्य को लेकर अनेक बहसें छिड़ीं। समाजवादी विचारकों ने इसे समाजवाद की पराजय मानने के बजाय स्टालिनवादी नौकरशाही सत्ता का पतन करार दिया तो पूंजीवाद में यकीन रखने वालों ने इसके अधिनायकवाद के खिलाफ लोकतंत्र और स्वतंत्रता की विजय के रूप में देखा। अमेरिकी विचारक फ्रांसिस फुकुयामा ने इस विजय को "इतिहास का अंत" करार दिया। फुकुयामा का तर्क था कि मानव सभ्यता अपने ऐतिहासिक विकास के अंतिम पड़ाव पर पहुंच गयी है और अब पश्चिमी शैली के उदार लोकतंत्र और पूंजावादी अर्थव्यवस्था का कोई विकल्प नहीं है ।
नब्बे के पूरे दशक में पश्चिमी देशों में ऐतिहासिक विजय का नशा सा छा गया। समाजवाद के सोवियत मॉडल के पतन को पूंजीवाद के विजय के रूप में इस हद तक देखा गया कि इस व्यवस्था की खामियों और निहित कमजोरियों की ओर से ध्यान हट गया। पूंजीवाद और मुक्त अर्थव्यवस्था की विजय का झंडा दुनिया भर में फहरने लगा। सर्वत्र यह स्वीकार किया गया है कि मुक्त अर्थव्यवस्था ही गतिशील साबित हुई है और इसमें ही पूंजी और श्रम दोनों को कुशलता और उत्पादकता को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाने की क्षमता निहित है। निश्चित ही सोवियत मॉडल की नियंत्रित अर्थव्यवस्था जड़ता का शिकार होती चली गयी। इसी के समांतर इसने राजनीतिक असहमति और विमर्श का हर दरवाजा ही नहीं बल्कि हर खिड़की तक बंद कर दी और अधिनायकवादी केन्द्रवाद हावी होता चला गया। आर्थिक और राजनीतिक दोनों ही स्वतंत्रताओं के छिनने से इस व्यवस्था पर से लोगों का विश्वास उठ गया और अवसर मिलते ही कहीं गहरा धंसा आक्रोश फूट पड़ा और बर्लिन की दीवार ढह गयी ।
इसके साथ ही पूरी दुनिया में मुक्त अर्थव्यवस्था उन्मुख सुधारों का दौर चला। भूमंडलीकरण की प्रक्रिया ने नया आवेग ग्रहण किया और राष्ट्रीय अर्थतंत्रों के वैश्विक अर्थतंत्र में एकीकरण के लिए उदारीकरण की गूंज हर तरफ उठने लगी। लेकिन केवल एक दशक के भीतर ही उदारीकरण और भूमंडलीकरण की इस प्रक्रिया ने ऐसा रूप धारण कर लिया कि अनेक हलकों में यह कहा जाने लगा कि यह समृद्धि का नहीं बल्कि गरीबी का भूमंडलीकरण हो रहा है और इस पर बहुराष्ट्रीय निगमों के दबदबे से इसे कॉर्पोरेट भूमंडलीकरण का नाम दिया गया।
नोबेल पुरुस्कार विजेता जोजेफ स्टिग्लिट्ज जैसे अर्थशास्त्री जो भूमंडलीकरण की प्रक्रिया के प्रबल हिमायती हुआ करते थे उनसे ही विरोध के स्वर उठने लगे। इस सदी के प्रारंभ होने के साथ ही पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में विकास के तत्वों को समावेश करने की जोरदार मांग उठने लगी। इसी के समांतर वैश्विक अर्थव्यवस्था को एक के बाद एक संकट ने झकझोर दिया। 1997 में एशियाई टाइगरों के वित्तीय संकट ने पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को इतना झकझोर दिया कि मलेशिया के तत्कालीन प्रधानमंत्री महातीर ने कहा कि जिस अर्थव्यवस्था के निर्माण में हमें चालीस वर्ष लगे, एक सट्टेबाज आया और उसने चालीस घंटों में ही सब बर्बाद कर दिया। भूमंडलीकरण की प्रक्रिया पर वित्तीय पूंजी हावी होने लगी थी। संकटों इस इस श्रंखला में 1997 के तत्काल बाद 1998 में पूंजी के प्रबंधन का संकट पैदा हुआ और 2001 में डॉटकॉम का गुब्बारा भी फूट गया। तब से लेकर 2008 की बड़ी मंदी तक अनेक तरह के संकट आते रहे। इन घटनाओं से बर्लिन की दीवर के ढहने से उपजा विजयवाद ठंडा पड़ने लगा और सवाल उठाए गए कि सरकार और बाजार के संबंधों को नए सिरे से देखने की जरूरत है। सब कुछ बाजार की शक्तियों पर नहीं छोड़ा जा सकता ।
1930 की महामंदी के बाद जिस तरह मुक्त अर्थव्यवस्था को पूरी तरह मुक्त करने के बजाय सरकार के हस्तक्षेप की पैरवी की गई और प्रख्यात अर्थशास्त्री कीन्स ने कहा कि पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की भलाई इसी में है कि रोजगार पैदा करने में सरकार का हस्तक्षेप करे। आज मौजूदा नव-उदारवादी व्यवस्था पर संकट के उपरांत भी दुनिया के अनेक जाने-माने अर्थशास्त्री कह रहे हैं कि सरकार को किसी ना किसी रूप में बाजार को रेग्यूलेट करना होगा। 15 सितंबर 2008 में अमेरिका की एक 158 वर्ष पुरानी प्रमुख विनियोग बैंक लेहमान ब्रदर्स दिवालिया होने पर जोसेफ स्टिग्लिट्ज ने कहा कि जिस तरह 1989 में बर्लिन की दीवार का ढहना समाजवाद के पतन का प्रतीक था उसी तरह लेहमान ब्रदर्स का दिवालिया होना पूंजीवाद के मौजूदा स्वरुप के पतन का प्रतीक है। लेहमान ब्रदर्स के दिवालिया होने के बाद अमेरिका की अनेक बड़ी-बड़ी वित्तीय संस्थाएं दिवालिया होने के कगार पर खड़ी थी और अमेरिकी सरकार को "मुक्त" अर्थव्यवस्था में हस्तक्षेप कर अरबों डॉलर के पैकेज के बल पर इन संस्थाओं को डूबने के बचाने पर विवश होना पड़ा।
बर्लिन दीवार के ढहने से जो पूंजीवाद विजयी हुआ था आज उसे लेकर सवाल उठ रहे हैं। कई बहसें हो रही है कि मुक्त अर्थव्यवस्था को कितना मुक्त रखा जाए और इसे रेग्यूलेट करने के लिए किस हद तक सरकार का हस्तक्षेप जरूरी है? लेकिन इसके साथ ही यह बहस भी हो रही है कि पूंजीवादी व्यवस्था में अनेक अन्तर्विरोध निहित हैं और अगर इस पर बार-बार आने वाले संकटों से मुक्ति पानी है तो पूंजीवादी व्यवस्था की जड़ों की ओर देखना होगा और राहत पैकेज तो केवल तात्कालिक सामाधान है।
निश्चय ही बर्लिन की दीवार के ढहने के बाद उपजे उदारीकरण का आवेग तीव्र ढलान पर लुढक रहा है और भूमंडलीकरण की प्रक्रिया दुम दबाकर भागती सी दिखाई दे रही है। दुनिया भर में ऱाष्ट्रीय अर्थतंत्र को संरक्षण देने का दौर शुरु हो चुका है। पर विकल्प को लेकर कोई ठोस अवधारण विकसित नहीं हो रही है इसकी अभिव्यक्ति अमेरिका की एक बहुत बड़ी वित्तीय संस्था मेरिल लिन्च के अध्यक्ष बर्नी सुचर के इस कथन में होती है कि "हमारी दुनिया बिखर गई है और हमें नहीं मालूम कि इसका स्थान कौन लेने जा रहा है"। लेकिन दुनिया के दो सबसे बड़े अमीरों- बिल गेट्स और वारेन बफेट -ने कहा है कि संकट टल गया है और पूंजीवाद पूरी तरह स्वस्थ है। लेकिन स्टिग्लिट्ज और अमृर्त्य सेन जैसे अर्थशास्त्रियों का कहना है कि संकट टला भर है और जब तक मुक्त बाजार की मनमानी पर रोक नहीं लगाई जाएगी तब तक इस तरह के संकट आते ही रहेंगे।
आज पूंजीवाद के मौजूदा चरित्र और स्वरूप पर "समाजवादी" नहीं बल्कि पूंजीवादी दर्शन में आस्था रखने वाले ही सवाल उठा रहे हैं। बर्लिन की दीवार ढहने से जिस पूंजीवाद की विजय हुई थी वह निश्चय ही इतिहास का अंत नहीं है और बर्लिन की दीवार ढहने जैसी एक और ऐतिहासिक घटना की किरणें क्षितिज में कहीं दिखाई दे रही हैं।
बर्लिन की दीवार को ढहे बीस वर्ष हो गए हैं। इस ऐतिहासिक घटना के साथ ही शीत युद्ध समाप्त हुआ था और जिसके परिणामस्वरूप 1981 में सोवियत संघ के अवसान के साथ ही एक वैकल्पिक विचारधारा और एक व्यवस्था का आदर्श भी ढह गया। बौद्धिक हलकों में समाजवाद और पूंजीवाद के भविष्य को लेकर अनेक बहसें छिड़ीं। समाजवादी विचारकों ने इसे समाजवाद की पराजय मानने के बजाय स्टालिनवादी नौकरशाही सत्ता का पतन करार दिया तो पूंजीवाद में यकीन रखने वालों ने इसके अधिनायकवाद के खिलाफ लोकतंत्र और स्वतंत्रता की विजय के रूप में देखा। अमेरिकी विचारक फ्रांसिस फुकुयामा ने इस विजय को "इतिहास का अंत" करार दिया। फुकुयामा का तर्क था कि मानव सभ्यता अपने ऐतिहासिक विकास के अंतिम पड़ाव पर पहुंच गयी है और अब पश्चिमी शैली के उदार लोकतंत्र और पूंजावादी अर्थव्यवस्था का कोई विकल्प नहीं है ।
नब्बे के पूरे दशक में पश्चिमी देशों में ऐतिहासिक विजय का नशा सा छा गया। समाजवाद के सोवियत मॉडल के पतन को पूंजीवाद के विजय के रूप में इस हद तक देखा गया कि इस व्यवस्था की खामियों और निहित कमजोरियों की ओर से ध्यान हट गया। पूंजीवाद और मुक्त अर्थव्यवस्था की विजय का झंडा दुनिया भर में फहरने लगा। सर्वत्र यह स्वीकार किया गया है कि मुक्त अर्थव्यवस्था ही गतिशील साबित हुई है और इसमें ही पूंजी और श्रम दोनों को कुशलता और उत्पादकता को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाने की क्षमता निहित है। निश्चित ही सोवियत मॉडल की नियंत्रित अर्थव्यवस्था जड़ता का शिकार होती चली गयी। इसी के समांतर इसने राजनीतिक असहमति और विमर्श का हर दरवाजा ही नहीं बल्कि हर खिड़की तक बंद कर दी और अधिनायकवादी केन्द्रवाद हावी होता चला गया। आर्थिक और राजनीतिक दोनों ही स्वतंत्रताओं के छिनने से इस व्यवस्था पर से लोगों का विश्वास उठ गया और अवसर मिलते ही कहीं गहरा धंसा आक्रोश फूट पड़ा और बर्लिन की दीवार ढह गयी ।
इसके साथ ही पूरी दुनिया में मुक्त अर्थव्यवस्था उन्मुख सुधारों का दौर चला। भूमंडलीकरण की प्रक्रिया ने नया आवेग ग्रहण किया और राष्ट्रीय अर्थतंत्रों के वैश्विक अर्थतंत्र में एकीकरण के लिए उदारीकरण की गूंज हर तरफ उठने लगी। लेकिन केवल एक दशक के भीतर ही उदारीकरण और भूमंडलीकरण की इस प्रक्रिया ने ऐसा रूप धारण कर लिया कि अनेक हलकों में यह कहा जाने लगा कि यह समृद्धि का नहीं बल्कि गरीबी का भूमंडलीकरण हो रहा है और इस पर बहुराष्ट्रीय निगमों के दबदबे से इसे कॉर्पोरेट भूमंडलीकरण का नाम दिया गया।
नोबेल पुरुस्कार विजेता जोजेफ स्टिग्लिट्ज जैसे अर्थशास्त्री जो भूमंडलीकरण की प्रक्रिया के प्रबल हिमायती हुआ करते थे उनसे ही विरोध के स्वर उठने लगे। इस सदी के प्रारंभ होने के साथ ही पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में विकास के तत्वों को समावेश करने की जोरदार मांग उठने लगी। इसी के समांतर वैश्विक अर्थव्यवस्था को एक के बाद एक संकट ने झकझोर दिया। 1997 में एशियाई टाइगरों के वित्तीय संकट ने पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को इतना झकझोर दिया कि मलेशिया के तत्कालीन प्रधानमंत्री महातीर ने कहा कि जिस अर्थव्यवस्था के निर्माण में हमें चालीस वर्ष लगे, एक सट्टेबाज आया और उसने चालीस घंटों में ही सब बर्बाद कर दिया। भूमंडलीकरण की प्रक्रिया पर वित्तीय पूंजी हावी होने लगी थी। संकटों इस इस श्रंखला में 1997 के तत्काल बाद 1998 में पूंजी के प्रबंधन का संकट पैदा हुआ और 2001 में डॉटकॉम का गुब्बारा भी फूट गया। तब से लेकर 2008 की बड़ी मंदी तक अनेक तरह के संकट आते रहे। इन घटनाओं से बर्लिन की दीवर के ढहने से उपजा विजयवाद ठंडा पड़ने लगा और सवाल उठाए गए कि सरकार और बाजार के संबंधों को नए सिरे से देखने की जरूरत है। सब कुछ बाजार की शक्तियों पर नहीं छोड़ा जा सकता ।
1930 की महामंदी के बाद जिस तरह मुक्त अर्थव्यवस्था को पूरी तरह मुक्त करने के बजाय सरकार के हस्तक्षेप की पैरवी की गई और प्रख्यात अर्थशास्त्री कीन्स ने कहा कि पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की भलाई इसी में है कि रोजगार पैदा करने में सरकार का हस्तक्षेप करे। आज मौजूदा नव-उदारवादी व्यवस्था पर संकट के उपरांत भी दुनिया के अनेक जाने-माने अर्थशास्त्री कह रहे हैं कि सरकार को किसी ना किसी रूप में बाजार को रेग्यूलेट करना होगा। 15 सितंबर 2008 में अमेरिका की एक 158 वर्ष पुरानी प्रमुख विनियोग बैंक लेहमान ब्रदर्स दिवालिया होने पर जोसेफ स्टिग्लिट्ज ने कहा कि जिस तरह 1989 में बर्लिन की दीवार का ढहना समाजवाद के पतन का प्रतीक था उसी तरह लेहमान ब्रदर्स का दिवालिया होना पूंजीवाद के मौजूदा स्वरुप के पतन का प्रतीक है। लेहमान ब्रदर्स के दिवालिया होने के बाद अमेरिका की अनेक बड़ी-बड़ी वित्तीय संस्थाएं दिवालिया होने के कगार पर खड़ी थी और अमेरिकी सरकार को "मुक्त" अर्थव्यवस्था में हस्तक्षेप कर अरबों डॉलर के पैकेज के बल पर इन संस्थाओं को डूबने के बचाने पर विवश होना पड़ा।
बर्लिन दीवार के ढहने से जो पूंजीवाद विजयी हुआ था आज उसे लेकर सवाल उठ रहे हैं। कई बहसें हो रही है कि मुक्त अर्थव्यवस्था को कितना मुक्त रखा जाए और इसे रेग्यूलेट करने के लिए किस हद तक सरकार का हस्तक्षेप जरूरी है? लेकिन इसके साथ ही यह बहस भी हो रही है कि पूंजीवादी व्यवस्था में अनेक अन्तर्विरोध निहित हैं और अगर इस पर बार-बार आने वाले संकटों से मुक्ति पानी है तो पूंजीवादी व्यवस्था की जड़ों की ओर देखना होगा और राहत पैकेज तो केवल तात्कालिक सामाधान है।
निश्चय ही बर्लिन की दीवार के ढहने के बाद उपजे उदारीकरण का आवेग तीव्र ढलान पर लुढक रहा है और भूमंडलीकरण की प्रक्रिया दुम दबाकर भागती सी दिखाई दे रही है। दुनिया भर में ऱाष्ट्रीय अर्थतंत्र को संरक्षण देने का दौर शुरु हो चुका है। पर विकल्प को लेकर कोई ठोस अवधारण विकसित नहीं हो रही है इसकी अभिव्यक्ति अमेरिका की एक बहुत बड़ी वित्तीय संस्था मेरिल लिन्च के अध्यक्ष बर्नी सुचर के इस कथन में होती है कि "हमारी दुनिया बिखर गई है और हमें नहीं मालूम कि इसका स्थान कौन लेने जा रहा है"। लेकिन दुनिया के दो सबसे बड़े अमीरों- बिल गेट्स और वारेन बफेट -ने कहा है कि संकट टल गया है और पूंजीवाद पूरी तरह स्वस्थ है। लेकिन स्टिग्लिट्ज और अमृर्त्य सेन जैसे अर्थशास्त्रियों का कहना है कि संकट टला भर है और जब तक मुक्त बाजार की मनमानी पर रोक नहीं लगाई जाएगी तब तक इस तरह के संकट आते ही रहेंगे।
आज पूंजीवाद के मौजूदा चरित्र और स्वरूप पर "समाजवादी" नहीं बल्कि पूंजीवादी दर्शन में आस्था रखने वाले ही सवाल उठा रहे हैं। बर्लिन की दीवार ढहने से जिस पूंजीवाद की विजय हुई थी वह निश्चय ही इतिहास का अंत नहीं है और बर्लिन की दीवार ढहने जैसी एक और ऐतिहासिक घटना की किरणें क्षितिज में कहीं दिखाई दे रही हैं।
अफगानिस्तान:एक स्थायी युद्ध का मैदान
सुभाष धूलिया
अमेरिका में यह अहसास गहराता जा रहा है कि अफगान युद्द जीता नहीं जा सकता। राष्ट्रपति ओबामा स्वयं ‘विजय’ के बजाय ‘समाधान’ की बात कर रहे हैं। अमेरिका ने 2011 तक अपनी सेनाएं बुलाने का ऐलान कर दिया है। अमेरिका में यह धारणा प्रबल हो चुकी है कि अफगान युद्ध में जब अबतक विजय हासिल नहीं हुई तो अगले एक साल में ऐसा कुछ हासिल नहीं होने जा रहा जो अब तक नहीं हासिल हुआ है। अफगानिस्तान में सैनिक अमेरिका की वापसी से जो राजनीतिक शून्य पैदा होगा उसकी भरपाई को लेकर अभी तक कोई साफ तस्वीर नहीं उभरी है। लेकिन इतना तय है कि करजई सरकार अमेरिका की वापसी के उपरांत टिक नहीं सकती। अचरज की बात तो यह है कि नौ सालों से सैनिक अभियान चला रहे अमेरिका ने अबतक भावी अफगानिस्तान का कोई स्पष्ट नक्शा पेश नहीं किया है।
असमंजस और अनिश्चय के इस माहौल में पाकिस्तान बेहद सक्रिय हो गया है और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण अफगानिस्तान में अपनी पिठ्ठू सरकार कायम करना चाहता है। हाल ही में पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल कियानी और कुख्यात खुफिया एजेंसी के प्रधान जनरल पाशा ने काबुल की यात्राएं की। कई अन्य स्तरों पर भी पाकिस्तान करजई सरकार के संपर्क में है। करजई पाकिस्तान के कट्टर विरोधी रहे हैं और भारत समर्थक के रूप में जाने जाते हैं। लेकिन अब बदली परिस्थितियों में पाकिस्तान करजई सरकार को लुभाकर और डराकर साथ लाना चाहता है। पाकिस्तान का केन्द्रीय लक्ष्य अफगानिस्तान में भारत विरोधी सत्ता कायम करना है। इस मकसद को हासिल करने के लिये इस्लामी इस्लामी उग्रवादी संगठन पाकिस्तान का साथ दे रहे हैं।
पाकिस्तान करजई को ये संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि अगर वे इस्लामी उग्रवादियों को सत्ता में भागीदार बना लेते हैं तो अमेरिकी वापसी के बाद भी अफगान के राजनैतिक जीवन में करजई का वजूद बना रहेगा। करजई ने कभी भी पाकिस्तान पर भरोसा नहीं किया है लेकिन उनको अहसास है कि अमेरिकी वापसी के उपरांत वे तालिबान से टक्कर नहीं ले सकते । पाकिस्तान ने इस रणनीति के पहले चरण में एक इस्लामी उग्रवादी हक्कानी के गुट को सत्ता में भागीदार बनाने का प्रस्ताव दिया है। हक्कानी वे शख्स हैं जिन्होंने आईएसआई की मदद से अफगानिस्तान में कई भारतीय ठिकानों पर आतंकवादी हमलों को अंजाम दिया था। पाकिस्तान की रणनीति यहीं तक सीमित नहीं है बल्कि मौका मिलने पर वे तालिबानी नेता मुल्ला उमर और कट्टरपंथी नेता हिकमतयार को भी सत्ता में घुसाने की कोशिश करेंगे। पाकिस्तान काफी समय से ‘उदार’ तालिबान की भी बातें करता रहा है और यह तर्क देता है कि अफगानिस्तान में तालिबान के बिना कोई स्थायित्व लाना संभव नहीं है। यहां चौंकाने वाली बात ये है कि सउदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात भी पाकिस्तान के साथ इस मैदान में कूद पड़े हैं और करजई को ‘मध्यस्थ’ की भूमिका अदा करने की सलाह दे रहे हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि विश्वभर में यही वो तीन देश थे जिन्होंने 1996 में तालिबानी सत्ता को विश्व भर में मान्यता दी थी।
यह घटनाक्रम अमेरिकी लक्ष्यों के अनुकूल नहीं है लेकिन विडंबना यह है कि अमेरिकी की वापसी की स्थिति में और विकल्प भी क्या है ? इस बीच पाकिस्तान ने अमेरिकी आपत्तियों को दरकिनार करते हुए चीन के साथ नाभिकीय समझौता किया है जिसके तहत चीन पाकिस्तान में दो नाभिकीय संयंत्र लगाने जा रहा है। यह इसलिये अधिक चिंताजनक है कि दुनिया में पाकिस्तान एकमात्र ऐसा देश है जिसका नाभिकीय प्रोद्योगिकी के प्रसार में बेहद खराब रिकॉर्ड रहा है और यही एक ऐसा देश है जिसे लेकर शंका पैदा होती है कि पता नहीं कब और कैसे इसकी नाभिकीय प्रोद्योगिकी ऐसे गुटों के हाथ ना चले जाये जो दुनिया में विनाश फैला सकते हैं।
अफगानिस्तान में केवल पाकिस्तान और अमेरिका के हित ही दांव पर नहीं लगे हैं बल्कि भारत-ईरान और रूस भी अफगानिस्तान में इस्लामी उग्रवादी सत्ता को स्वीकार नहीं कर सकते। ये तीनों देश तालिबान के खिलाफ उत्तरी गठजोड़ को समर्थन देते रहे हैं जिसमें ताजिकों का वर्चस्व है। अफगानिस्तान में ताजिक और पख्तून दो प्रभावशाली जातीय समुदाय हैं जिनके बीच सत्ता के नियंत्रण को लेकर हमेशा टकराव रहा है। उत्तरी गठजोड़ काबुल में ऐसी किसी सत्ता को स्वीकार नहीं करेगा जिसमें पख्तूनों का दबदबा हो। अमेरिका में इन तीनों देशों को अफगान समस्या से अलग थलग रखा। लेकिन आज एक ऐसी परिस्थिति पैदा होती हो रही है जिसमें उत्तरी अफगानी गठजोड़ भारत-रूस और ईरान की मदद से पाकिस्तान-तालिबान गठजोड़ के खिलाफ नया संघर्ष छेड़ सकता है।
भारत ने अफगानिस्तान में करजई सरकार के सत्तासीन होने के बाद 1.3 अरब डॉलर की मदद दी और अफगानिस्तान में सड़कों, पुलों, बिजली, अस्पताल और स्कूलों का निर्माण किया। भारत के इन प्रयासों को विफल करने के लिये ही आईएसआई ने हक्कानी गुट की मदद से भारतीय ठिकानों पर हमले कराये। पाकिस्तानी रणनीति के तहत अफगानिस्तान में कोई भी राजनीतिक समाधान तभी हो सकता है जब वहां ऐसी कोई सत्ता कायम हो जिस पर इस्लामी कट्टपंथियों का नियंत्रण हो। ऐसे में इस्लामी उग्रवाद को पराजित करने और नौ सालों तक अफगानिस्तान में युद्ध छेड़ने के अमेरिकी लक्ष्यों की नियति क्या होगी ? अमेरिका 2011 के बाद अमेरिका अफगानिस्तान में इसलिए नहीं रह सकता क्योंकि नौ सालों में जो हासिल नहीं किया जा सका उसको आगे भी हासिल नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर अफगानिस्तान में पाकिस्तान का लक्ष्य पूरा होता है तो निश्चय ही भारत रूस और ईरान को यह मंजूर नहीं होगा और जाहिर है इस तरह की सत्ता को अमेरिका का भी समर्थन हासिल नहीं होगा। इस परिदृश्य में बलूचिस्तान में भारत के प्रभाव और उजबेकिस्तान में भारत के वायुसैनिक अड्डे से पाकिस्तान विचलित है।
पाकिस्तान की रणनीति अफगानिस्तान में एक नया युद्द का शुरु करेगी और यह एक ऐसा युद्द होगा जिससे लड़ने के लिए जर्जर और अस्थिर पाकिस्तान के पास कोई दमखम नहीं है। इस पाकिस्तानी रणनीति का संचालन का सैनिक प्रतिष्टान के हाथ में है और भारत विरोधी उन्माद से ग्रसित पाकिस्तानी सेना एक बार फिर पाकिस्तान को विनाश के रास्ते पर ले जा रही है। इस भावी अफगान टकराव के दूरगामी परिणाम होंगे और इसकी सबसे अधिक तपिश अफगानी लोगों को झलनी पड़ेगी जो पिछले तीन दशकों से युद्द की आग में झुलस रहे हैं।
अमेरिका में यह अहसास गहराता जा रहा है कि अफगान युद्द जीता नहीं जा सकता। राष्ट्रपति ओबामा स्वयं ‘विजय’ के बजाय ‘समाधान’ की बात कर रहे हैं। अमेरिका ने 2011 तक अपनी सेनाएं बुलाने का ऐलान कर दिया है। अमेरिका में यह धारणा प्रबल हो चुकी है कि अफगान युद्ध में जब अबतक विजय हासिल नहीं हुई तो अगले एक साल में ऐसा कुछ हासिल नहीं होने जा रहा जो अब तक नहीं हासिल हुआ है। अफगानिस्तान में सैनिक अमेरिका की वापसी से जो राजनीतिक शून्य पैदा होगा उसकी भरपाई को लेकर अभी तक कोई साफ तस्वीर नहीं उभरी है। लेकिन इतना तय है कि करजई सरकार अमेरिका की वापसी के उपरांत टिक नहीं सकती। अचरज की बात तो यह है कि नौ सालों से सैनिक अभियान चला रहे अमेरिका ने अबतक भावी अफगानिस्तान का कोई स्पष्ट नक्शा पेश नहीं किया है।
असमंजस और अनिश्चय के इस माहौल में पाकिस्तान बेहद सक्रिय हो गया है और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण अफगानिस्तान में अपनी पिठ्ठू सरकार कायम करना चाहता है। हाल ही में पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल कियानी और कुख्यात खुफिया एजेंसी के प्रधान जनरल पाशा ने काबुल की यात्राएं की। कई अन्य स्तरों पर भी पाकिस्तान करजई सरकार के संपर्क में है। करजई पाकिस्तान के कट्टर विरोधी रहे हैं और भारत समर्थक के रूप में जाने जाते हैं। लेकिन अब बदली परिस्थितियों में पाकिस्तान करजई सरकार को लुभाकर और डराकर साथ लाना चाहता है। पाकिस्तान का केन्द्रीय लक्ष्य अफगानिस्तान में भारत विरोधी सत्ता कायम करना है। इस मकसद को हासिल करने के लिये इस्लामी इस्लामी उग्रवादी संगठन पाकिस्तान का साथ दे रहे हैं।
पाकिस्तान करजई को ये संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि अगर वे इस्लामी उग्रवादियों को सत्ता में भागीदार बना लेते हैं तो अमेरिकी वापसी के बाद भी अफगान के राजनैतिक जीवन में करजई का वजूद बना रहेगा। करजई ने कभी भी पाकिस्तान पर भरोसा नहीं किया है लेकिन उनको अहसास है कि अमेरिकी वापसी के उपरांत वे तालिबान से टक्कर नहीं ले सकते । पाकिस्तान ने इस रणनीति के पहले चरण में एक इस्लामी उग्रवादी हक्कानी के गुट को सत्ता में भागीदार बनाने का प्रस्ताव दिया है। हक्कानी वे शख्स हैं जिन्होंने आईएसआई की मदद से अफगानिस्तान में कई भारतीय ठिकानों पर आतंकवादी हमलों को अंजाम दिया था। पाकिस्तान की रणनीति यहीं तक सीमित नहीं है बल्कि मौका मिलने पर वे तालिबानी नेता मुल्ला उमर और कट्टरपंथी नेता हिकमतयार को भी सत्ता में घुसाने की कोशिश करेंगे। पाकिस्तान काफी समय से ‘उदार’ तालिबान की भी बातें करता रहा है और यह तर्क देता है कि अफगानिस्तान में तालिबान के बिना कोई स्थायित्व लाना संभव नहीं है। यहां चौंकाने वाली बात ये है कि सउदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात भी पाकिस्तान के साथ इस मैदान में कूद पड़े हैं और करजई को ‘मध्यस्थ’ की भूमिका अदा करने की सलाह दे रहे हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि विश्वभर में यही वो तीन देश थे जिन्होंने 1996 में तालिबानी सत्ता को विश्व भर में मान्यता दी थी।
यह घटनाक्रम अमेरिकी लक्ष्यों के अनुकूल नहीं है लेकिन विडंबना यह है कि अमेरिकी की वापसी की स्थिति में और विकल्प भी क्या है ? इस बीच पाकिस्तान ने अमेरिकी आपत्तियों को दरकिनार करते हुए चीन के साथ नाभिकीय समझौता किया है जिसके तहत चीन पाकिस्तान में दो नाभिकीय संयंत्र लगाने जा रहा है। यह इसलिये अधिक चिंताजनक है कि दुनिया में पाकिस्तान एकमात्र ऐसा देश है जिसका नाभिकीय प्रोद्योगिकी के प्रसार में बेहद खराब रिकॉर्ड रहा है और यही एक ऐसा देश है जिसे लेकर शंका पैदा होती है कि पता नहीं कब और कैसे इसकी नाभिकीय प्रोद्योगिकी ऐसे गुटों के हाथ ना चले जाये जो दुनिया में विनाश फैला सकते हैं।
अफगानिस्तान में केवल पाकिस्तान और अमेरिका के हित ही दांव पर नहीं लगे हैं बल्कि भारत-ईरान और रूस भी अफगानिस्तान में इस्लामी उग्रवादी सत्ता को स्वीकार नहीं कर सकते। ये तीनों देश तालिबान के खिलाफ उत्तरी गठजोड़ को समर्थन देते रहे हैं जिसमें ताजिकों का वर्चस्व है। अफगानिस्तान में ताजिक और पख्तून दो प्रभावशाली जातीय समुदाय हैं जिनके बीच सत्ता के नियंत्रण को लेकर हमेशा टकराव रहा है। उत्तरी गठजोड़ काबुल में ऐसी किसी सत्ता को स्वीकार नहीं करेगा जिसमें पख्तूनों का दबदबा हो। अमेरिका में इन तीनों देशों को अफगान समस्या से अलग थलग रखा। लेकिन आज एक ऐसी परिस्थिति पैदा होती हो रही है जिसमें उत्तरी अफगानी गठजोड़ भारत-रूस और ईरान की मदद से पाकिस्तान-तालिबान गठजोड़ के खिलाफ नया संघर्ष छेड़ सकता है।
भारत ने अफगानिस्तान में करजई सरकार के सत्तासीन होने के बाद 1.3 अरब डॉलर की मदद दी और अफगानिस्तान में सड़कों, पुलों, बिजली, अस्पताल और स्कूलों का निर्माण किया। भारत के इन प्रयासों को विफल करने के लिये ही आईएसआई ने हक्कानी गुट की मदद से भारतीय ठिकानों पर हमले कराये। पाकिस्तानी रणनीति के तहत अफगानिस्तान में कोई भी राजनीतिक समाधान तभी हो सकता है जब वहां ऐसी कोई सत्ता कायम हो जिस पर इस्लामी कट्टपंथियों का नियंत्रण हो। ऐसे में इस्लामी उग्रवाद को पराजित करने और नौ सालों तक अफगानिस्तान में युद्ध छेड़ने के अमेरिकी लक्ष्यों की नियति क्या होगी ? अमेरिका 2011 के बाद अमेरिका अफगानिस्तान में इसलिए नहीं रह सकता क्योंकि नौ सालों में जो हासिल नहीं किया जा सका उसको आगे भी हासिल नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर अफगानिस्तान में पाकिस्तान का लक्ष्य पूरा होता है तो निश्चय ही भारत रूस और ईरान को यह मंजूर नहीं होगा और जाहिर है इस तरह की सत्ता को अमेरिका का भी समर्थन हासिल नहीं होगा। इस परिदृश्य में बलूचिस्तान में भारत के प्रभाव और उजबेकिस्तान में भारत के वायुसैनिक अड्डे से पाकिस्तान विचलित है।
पाकिस्तान की रणनीति अफगानिस्तान में एक नया युद्द का शुरु करेगी और यह एक ऐसा युद्द होगा जिससे लड़ने के लिए जर्जर और अस्थिर पाकिस्तान के पास कोई दमखम नहीं है। इस पाकिस्तानी रणनीति का संचालन का सैनिक प्रतिष्टान के हाथ में है और भारत विरोधी उन्माद से ग्रसित पाकिस्तानी सेना एक बार फिर पाकिस्तान को विनाश के रास्ते पर ले जा रही है। इस भावी अफगान टकराव के दूरगामी परिणाम होंगे और इसकी सबसे अधिक तपिश अफगानी लोगों को झलनी पड़ेगी जो पिछले तीन दशकों से युद्द की आग में झुलस रहे हैं।
Tuesday, 14 September 2010
एक व्यवस्था का पतन और विकल्प का अभाव
सुभाष धूलिया
मंदी के बाद अमेरिका में जब लेहमान ब्रदर्स जैसी कंपनी दिवालिया हुई तो यह कहा गया कि यह पूंजीवाद के पतन का उसी तरह प्रतीक है जैसा 1989 में बर्लिन की दीवार का ढहना सोवियत समाजवाद के पतन का प्रतीक था। 2008 की इस मंदी से पूरे विश्व में आर्थिक भूचाल आ गया था । लेकिन अमेरिकी प्रशासन वित्तीय सेक्टर को अरबों डॉलर का राहत पैकेज इस आर्थिक भूचाल को सीमित करने में सफल रहा। अब हाल ही में जब यूरोपीय यूनियन के सदस्य देश ग्रीस की आर्थिक व्यवस्था ढहने के कगार पर थी तो यूरोपीय सूनियन और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने एक बार फिर अरबों डॉलर का पैकेज देकर ग्रीस को ढहने से बचा लिया। अगर इस बार ग्रीस से उठने वाली मंदी के बादल अगर पूरे यूरोप पर छाते तो एक बार फिर विश्व की अर्थव्यवस्था उसी हालत में पहुंच जाती जिसमें वह 2008 में जा पहुंची थी।
लेकिन यह संकट अभी पूरी तरह टला नहीं है। यह माना जा रहा है कि सरकारें वित्तीय घाटे को कम करने में विफल हो रही हैं और इसी कारण आर्थिक संकट पैदा हो रहे हैं। इस तरह की आर्थिक व्यवस्था में वित्तीय घाटे को कम करने का एक ही उपाय बचता है कि सरकार अपने खर्चों में कटौती करे और इसका सीधा मतलब यही है कि विभिन्न सामाजिक क्षेत्रों के व्यय में कटौती की जाये।
ग्रीस में आर्थिक संकट आने के बाद लोग सड़कों पर उतर आये थे और ऐसे में राजनीतिक टकराव भी पनप रहा था।। इस परिस्थिति में राहत पैकेज में आर्थिक संकट का भले ही तात्कालिक रूप से हल पा लिया हो लेकिन रोजगार और लोगों की आय पर इसकी जो मार पड़ेगी उसके परिणाम दूरगामी होंगे। ग्रीस को दिये गये आर्थिक पैकेज में भागीदार बनने के लिये तो ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देश भी हिचकिचा रहे क्योंकि वो खुद इस तरह के आर्थिक संकट की चपेट में हैं। इनकी हिचकिचाहट इस हद तक थी कि अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा को हस्तक्षेप करना पड़ा और तब जाकर राहत पैकेज तैयार हो सका।
लेकिन यह बात अब यहीं तक सीमित नहीं है कि ग्रीस पर आर्थिक संकट आया और एक राहत पैकेज से इस पर काबू पा लिया गया। आज यूरोप के कई देश जैसे स्पेन और पुर्तगाल भी ग्रीस जैसी स्थिति में फंसे हुए हैं। यूरोपीय कमीशन से बुल्गारिया, साइप्रस डेनमार्क और फिनलैंड को भी सचेत किया है कि उनका बजट घाटा सीमा पार कर रहा है और वो अपने सार्वजनिक व्ययों में कटौती करें। बजट घाटे की समस्या इन्ही छोटे देशों तक सीमित नहीं है बल्कि यूरोप के ब्रिटेन और जर्मनी जैसी आर्थिक महाशक्ति भी इस संकट से जूझ रही हैं।
1930 के दशक की महामंदी के बाद परंपरागत उदार अर्थव्यवस्था का पतन हुआ था और आर्थिक जीवन को केवल बाजार के भरोसे छोड़ने के बजाय सरकार के हस्तक्षेप को स्वीकर किया गया था। लेकिन 70 का दशक आते आते यह अर्थव्यवस्था भी डगमगाने लगी। सामाजिक वर्गों के बीच टकराव हुआ और इसके परिणामस्वरूप ब्रिटेन में मारग्रेट थैचर और अमेरिका में रीगन सत्तीसीन हुए जिन्होंने फिर से उदार अर्थव्यवस्था को बहाल किया । इसी दौर में सोवियत समाजवाद के पतन के समांतर भूमंडलीकरण की प्रक्रिया से पूरे विश्व में उदार लोकतंत्र की हवायें बहने लगी। लेकिन 90 का दशक आते आते इस अनियंत्रित बाजार पर संकट आते चले गये और जिसके परिणामस्वरूप 2008 का महासंकट आया। इस संकट से बचने के लिये अमेरिकी प्रशासन को नव उदारवाद का परित्याग कर आर्थिक जीवन में हस्तक्षेप करना पड़ा। इसके साथ ही दुनियाभर में यह स्वीकार किया गया कि मुक्त अर्थव्यस्था की मुक्तता में सरकार का हस्तक्षेप जरूरी है ताकि बार बार आनेवाले इन संकटों पर काबू पाया जा सके।
निश्चय ही इस तरह की परिस्थिति पैदा होना उस नव उदारवाद का अंत है जिसकी शुरुआत सत्तर के दशक में हुई थी लेकिन इससे पहले के तमाम आर्थिक संकटो और पिछले दो दशकों में आने वाले संकटों में एक बुनियादी अंतर है। पहले ये संकट सामाजिक टकरावों का परिणाम होते थे और इनसे राजनीतिक सत्ता समीकरणों में परिवर्तन आता था । 70 के दशक में मुक्त अर्थव्यवस्था और नियंत्रित अर्थव्यवस्था (वाम बनाम दक्षिण, पूंजीवाद बनाम समाजवाद) के बीच के संघर्ष अपनी पराकाष्ठा पर था और और इस तरह के संकटों का प्रभाव स्पष्ट रूप से राजनीतिक पटल पर देखा जा सकता था। आंदोलन पनपते थे और सरकारें बदलती थीं। लेकिन इस बार के आर्थिक संकट व्यवस्था के भीतर सामाजिक शक्तियों के टकराव का परिणाम नहीं है बल्कि नव उदारवादी व्यवस्था स्वयं ही ढह गयी है और यह व्यवस्था स्वयं अपने को ही संभालने के संघर्ष में जुटी हुई है। मौजूदा दौर में हर आर्थिक संकट के बाद राजनीतिक मानचित्र अस्पष्ट होता जा रहा है। एक व्यवस्था बिखर रही है लेकिन उसका कोई विकल्प नहीं उभर रहा है। यह व्यवस्था का अन्तर्विस्फोट है जहां व्यवस्था अपने भीतर ही विकल्प ढूंढ रही है और इससे स्वयं अपने ही विकल्प एक दूसरे से जूझ रहे हैं और संकट का अंत कही नजर नहीं आता है।
इस आर्थिक संकटों से जिस तरह का यूरोप उभर रहा है उसकी तस्वीर दिनोंदिन बोझिल और अस्पष्ट होती नजर आती है। यूरोप की इस बोझिल और अस्पष्ट रीजनीति का सबसे ज्वलंत उदाहरण ब्रिटेन में हुए चुनाव हैं। चुनाव के उपरांत घनघोर दक्षिणपंथी कंजरवेटिव पार्टी और वामपंथी लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के गठजोड़ की सरकार अस्तित्व में आई है। यह गठजोड़ सरकार मौजूदा आर्थिक संकट पर काबू पाने के लिये जिस तरह के कदम उठा रही है उससे लगता है कि परंपरागत राजनीतिक अवधारणायें बदल रही हैं और ब्रिटेन के कंजरवेटिव अब कंजरवेटिव नहीं रह गये हैं और लिबरल डेमोक्रेट नये कंजरवेटिव हो गये हैं।
यूरोप में विचारधाराओं के आधार पर परंपरागत रुप से पारिभाषित दक्षिणपंथ और वामपंथ में परिवर्तन आ रहा है। मुख्यधारा विचाराधात्मक राजनीति के इस तरह के संकट और इस तरह के परिवर्तन से कोई विकल्प नहीं उभर पा रहा है और एक और ऐसे राजनीतिक गठजोड़ अस्तित्व में आ रहे हैं जिनके बीच कोई खास राजनीतिक समानता नहीं है ।
नव उदारवाद के पतन से जो राजनीतिक शून्य पैदा हुआ उससे निश्चय ही एक नई राजनीति के लिये दरवाजे खुले हैं। लेकिन इस तरह की नई राजनीति के उभरने के संकेत नहीं मिल रहे हैं जो इस ऐतिहासिक शून्य को भर सके। इन परिस्थितियों में पूरे यूरोप का आर्थिक और राजनीतिक मानचित्र विखंडित सा दिखायी पड़ता है।
मंदी के बाद अमेरिका में जब लेहमान ब्रदर्स जैसी कंपनी दिवालिया हुई तो यह कहा गया कि यह पूंजीवाद के पतन का उसी तरह प्रतीक है जैसा 1989 में बर्लिन की दीवार का ढहना सोवियत समाजवाद के पतन का प्रतीक था। 2008 की इस मंदी से पूरे विश्व में आर्थिक भूचाल आ गया था । लेकिन अमेरिकी प्रशासन वित्तीय सेक्टर को अरबों डॉलर का राहत पैकेज इस आर्थिक भूचाल को सीमित करने में सफल रहा। अब हाल ही में जब यूरोपीय यूनियन के सदस्य देश ग्रीस की आर्थिक व्यवस्था ढहने के कगार पर थी तो यूरोपीय सूनियन और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने एक बार फिर अरबों डॉलर का पैकेज देकर ग्रीस को ढहने से बचा लिया। अगर इस बार ग्रीस से उठने वाली मंदी के बादल अगर पूरे यूरोप पर छाते तो एक बार फिर विश्व की अर्थव्यवस्था उसी हालत में पहुंच जाती जिसमें वह 2008 में जा पहुंची थी।
लेकिन यह संकट अभी पूरी तरह टला नहीं है। यह माना जा रहा है कि सरकारें वित्तीय घाटे को कम करने में विफल हो रही हैं और इसी कारण आर्थिक संकट पैदा हो रहे हैं। इस तरह की आर्थिक व्यवस्था में वित्तीय घाटे को कम करने का एक ही उपाय बचता है कि सरकार अपने खर्चों में कटौती करे और इसका सीधा मतलब यही है कि विभिन्न सामाजिक क्षेत्रों के व्यय में कटौती की जाये।
ग्रीस में आर्थिक संकट आने के बाद लोग सड़कों पर उतर आये थे और ऐसे में राजनीतिक टकराव भी पनप रहा था।। इस परिस्थिति में राहत पैकेज में आर्थिक संकट का भले ही तात्कालिक रूप से हल पा लिया हो लेकिन रोजगार और लोगों की आय पर इसकी जो मार पड़ेगी उसके परिणाम दूरगामी होंगे। ग्रीस को दिये गये आर्थिक पैकेज में भागीदार बनने के लिये तो ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देश भी हिचकिचा रहे क्योंकि वो खुद इस तरह के आर्थिक संकट की चपेट में हैं। इनकी हिचकिचाहट इस हद तक थी कि अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा को हस्तक्षेप करना पड़ा और तब जाकर राहत पैकेज तैयार हो सका।
लेकिन यह बात अब यहीं तक सीमित नहीं है कि ग्रीस पर आर्थिक संकट आया और एक राहत पैकेज से इस पर काबू पा लिया गया। आज यूरोप के कई देश जैसे स्पेन और पुर्तगाल भी ग्रीस जैसी स्थिति में फंसे हुए हैं। यूरोपीय कमीशन से बुल्गारिया, साइप्रस डेनमार्क और फिनलैंड को भी सचेत किया है कि उनका बजट घाटा सीमा पार कर रहा है और वो अपने सार्वजनिक व्ययों में कटौती करें। बजट घाटे की समस्या इन्ही छोटे देशों तक सीमित नहीं है बल्कि यूरोप के ब्रिटेन और जर्मनी जैसी आर्थिक महाशक्ति भी इस संकट से जूझ रही हैं।
1930 के दशक की महामंदी के बाद परंपरागत उदार अर्थव्यवस्था का पतन हुआ था और आर्थिक जीवन को केवल बाजार के भरोसे छोड़ने के बजाय सरकार के हस्तक्षेप को स्वीकर किया गया था। लेकिन 70 का दशक आते आते यह अर्थव्यवस्था भी डगमगाने लगी। सामाजिक वर्गों के बीच टकराव हुआ और इसके परिणामस्वरूप ब्रिटेन में मारग्रेट थैचर और अमेरिका में रीगन सत्तीसीन हुए जिन्होंने फिर से उदार अर्थव्यवस्था को बहाल किया । इसी दौर में सोवियत समाजवाद के पतन के समांतर भूमंडलीकरण की प्रक्रिया से पूरे विश्व में उदार लोकतंत्र की हवायें बहने लगी। लेकिन 90 का दशक आते आते इस अनियंत्रित बाजार पर संकट आते चले गये और जिसके परिणामस्वरूप 2008 का महासंकट आया। इस संकट से बचने के लिये अमेरिकी प्रशासन को नव उदारवाद का परित्याग कर आर्थिक जीवन में हस्तक्षेप करना पड़ा। इसके साथ ही दुनियाभर में यह स्वीकार किया गया कि मुक्त अर्थव्यस्था की मुक्तता में सरकार का हस्तक्षेप जरूरी है ताकि बार बार आनेवाले इन संकटों पर काबू पाया जा सके।
निश्चय ही इस तरह की परिस्थिति पैदा होना उस नव उदारवाद का अंत है जिसकी शुरुआत सत्तर के दशक में हुई थी लेकिन इससे पहले के तमाम आर्थिक संकटो और पिछले दो दशकों में आने वाले संकटों में एक बुनियादी अंतर है। पहले ये संकट सामाजिक टकरावों का परिणाम होते थे और इनसे राजनीतिक सत्ता समीकरणों में परिवर्तन आता था । 70 के दशक में मुक्त अर्थव्यवस्था और नियंत्रित अर्थव्यवस्था (वाम बनाम दक्षिण, पूंजीवाद बनाम समाजवाद) के बीच के संघर्ष अपनी पराकाष्ठा पर था और और इस तरह के संकटों का प्रभाव स्पष्ट रूप से राजनीतिक पटल पर देखा जा सकता था। आंदोलन पनपते थे और सरकारें बदलती थीं। लेकिन इस बार के आर्थिक संकट व्यवस्था के भीतर सामाजिक शक्तियों के टकराव का परिणाम नहीं है बल्कि नव उदारवादी व्यवस्था स्वयं ही ढह गयी है और यह व्यवस्था स्वयं अपने को ही संभालने के संघर्ष में जुटी हुई है। मौजूदा दौर में हर आर्थिक संकट के बाद राजनीतिक मानचित्र अस्पष्ट होता जा रहा है। एक व्यवस्था बिखर रही है लेकिन उसका कोई विकल्प नहीं उभर रहा है। यह व्यवस्था का अन्तर्विस्फोट है जहां व्यवस्था अपने भीतर ही विकल्प ढूंढ रही है और इससे स्वयं अपने ही विकल्प एक दूसरे से जूझ रहे हैं और संकट का अंत कही नजर नहीं आता है।
इस आर्थिक संकटों से जिस तरह का यूरोप उभर रहा है उसकी तस्वीर दिनोंदिन बोझिल और अस्पष्ट होती नजर आती है। यूरोप की इस बोझिल और अस्पष्ट रीजनीति का सबसे ज्वलंत उदाहरण ब्रिटेन में हुए चुनाव हैं। चुनाव के उपरांत घनघोर दक्षिणपंथी कंजरवेटिव पार्टी और वामपंथी लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के गठजोड़ की सरकार अस्तित्व में आई है। यह गठजोड़ सरकार मौजूदा आर्थिक संकट पर काबू पाने के लिये जिस तरह के कदम उठा रही है उससे लगता है कि परंपरागत राजनीतिक अवधारणायें बदल रही हैं और ब्रिटेन के कंजरवेटिव अब कंजरवेटिव नहीं रह गये हैं और लिबरल डेमोक्रेट नये कंजरवेटिव हो गये हैं।
यूरोप में विचारधाराओं के आधार पर परंपरागत रुप से पारिभाषित दक्षिणपंथ और वामपंथ में परिवर्तन आ रहा है। मुख्यधारा विचाराधात्मक राजनीति के इस तरह के संकट और इस तरह के परिवर्तन से कोई विकल्प नहीं उभर पा रहा है और एक और ऐसे राजनीतिक गठजोड़ अस्तित्व में आ रहे हैं जिनके बीच कोई खास राजनीतिक समानता नहीं है ।
नव उदारवाद के पतन से जो राजनीतिक शून्य पैदा हुआ उससे निश्चय ही एक नई राजनीति के लिये दरवाजे खुले हैं। लेकिन इस तरह की नई राजनीति के उभरने के संकेत नहीं मिल रहे हैं जो इस ऐतिहासिक शून्य को भर सके। इन परिस्थितियों में पूरे यूरोप का आर्थिक और राजनीतिक मानचित्र विखंडित सा दिखायी पड़ता है।
अफगानिस्तान:एक स्थायी युद्ध का मैदान
सुभाष धूलिया
अमेरिका में यह अहसास गहराता जा रहा है कि अफगान युद्द जीता नहीं जा सकता। राष्ट्रपति ओबामा स्वयं ‘विजय’ के बजाय ‘समाधान’ की बात कर रहे हैं। अमेरिका ने 2011 तक अपनी सेनाएं बुलाने का ऐलान कर दिया है। अमेरिका में यह धारणा प्रबल हो चुकी है कि अफगान युद्ध में जब अबतक विजय हासिल नहीं हुई तो अगले एक साल में ऐसा कुछ हासिल नहीं होने जा रहा जो अब तक नहीं हासिल हुआ है। अफगानिस्तान में सैनिक अमेरिका की वापसी से जो राजनीतिक शून्य पैदा होगा उसकी भरपाई को लेकर अभी तक कोई साफ तस्वीर नहीं उभरी है। लेकिन इतना तय है कि करजई सरकार अमेरिका की वापसी के उपरांत टिक नहीं सकती। अचरज की बात तो यह है कि नौ सालों से सैनिक अभियान चला रहे अमेरिका ने अबतक भावी अफगानिस्तान का कोई स्पष्ट नक्शा पेश नहीं किया है।
असमंजस और अनिश्चय के इस माहौल में पाकिस्तान बेहद सक्रिय हो गया है और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण अफगानिस्तान में अपनी पिठ्ठू सरकार कायम करना चाहता है। हाल ही में पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल कियानी और कुख्यात खुफिया एजेंसी के प्रधान जनरल पाशा ने काबुल की यात्राएं की। कई अन्य स्तरों पर भी पाकिस्तान करजई सरकार के संपर्क में है। करजई पाकिस्तान के कट्टर विरोधी रहे हैं और भारत समर्थक के रूप में जाने जाते हैं। लेकिन अब बदली परिस्थितियों में पाकिस्तान करजई सरकार को लुभाकर और डराकर साथ लाना चाहता है। पाकिस्तान का केन्द्रीय लक्ष्य अफगानिस्तान में भारत विरोधी सत्ता कायम करना है। इस मकसद को हासिल करने के लिये इस्लामी इस्लामी उग्रवादी संगठन पाकिस्तान का साथ दे रहे हैं।
पाकिस्तान करजई को ये संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि अगर वे इस्लामी उग्रवादियों को सत्ता में भागीदार बना लेते हैं तो अमेरिकी वापसी के बाद भी अफगान के राजनैतिक जीवन में करजई का वजूद बना रहेगा। करजई ने कभी भी पाकिस्तान पर भरोसा नहीं किया है लेकिन उनको अहसास है कि अमेरिकी वापसी के उपरांत वे तालिबान से टक्कर नहीं ले सकते । पाकिस्तान ने इस रणनीति के पहले चरण में एक इस्लामी उग्रवादी हक्कानी के गुट को सत्ता में भागीदार बनाने का प्रस्ताव दिया है। हक्कानी वे शख्स हैं जिन्होंने आईएसआई की मदद से अफगानिस्तान में कई भारतीय ठिकानों पर आतंकवादी हमलों को अंजाम दिया था। पाकिस्तान की रणनीति यहीं तक सीमित नहीं है बल्कि मौका मिलने पर वे तालिबानी नेता मुल्ला उमर और कट्टरपंथी नेता हिकमतयार को भी सत्ता में घुसाने की कोशिश करेंगे। पाकिस्तान काफी समय से ‘उदार’ तालिबान की भी बातें करता रहा है और यह तर्क देता है कि अफगानिस्तान में तालिबान के बिना कोई स्थायित्व लाना संभव नहीं है। यहां चौंकाने वाली बात ये है कि सउदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात भी पाकिस्तान के साथ इस मैदान में कूद पड़े हैं और करजई को ‘मध्यस्थ’ की भूमिका अदा करने की सलाह दे रहे हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि विश्वभर में यही वो तीन देश थे जिन्होंने 1996 में तालिबानी सत्ता को विश्व भर में मान्यता दी थी।
यह घटनाक्रम अमेरिकी लक्ष्यों के अनुकूल नहीं है लेकिन विडंबना यह है कि अमेरिकी की वापसी की स्थिति में और विकल्प भी क्या है ? इस बीच पाकिस्तान ने अमेरिकी आपत्तियों को दरकिनार करते हुए चीन के साथ नाभिकीय समझौता किया है जिसके तहत चीन पाकिस्तान में दो नाभिकीय संयंत्र लगाने जा रहा है। यह इसलिये अधिक चिंताजनक है कि दुनिया में पाकिस्तान एकमात्र ऐसा देश है जिसका नाभिकीय प्रोद्योगिकी के प्रसार में बेहद खराब रिकॉर्ड रहा है और यही एक ऐसा देश है जिसे लेकर शंका पैदा होती है कि पता नहीं कब और कैसे इसकी नाभिकीय प्रोद्योगिकी ऐसे गुटों के हाथ ना चले जाये जो दुनिया में विनाश फैला सकते हैं।
अफगानिस्तान में केवल पाकिस्तान और अमेरिका के हित ही दांव पर नहीं लगे हैं बल्कि भारत-ईरान और रूस भी अफगानिस्तान में इस्लामी उग्रवादी सत्ता को स्वीकार नहीं कर सकते। ये तीनों देश तालिबान के खिलाफ उत्तरी गठजोड़ को समर्थन देते रहे हैं जिसमें ताजिकों का वर्चस्व है। अफगानिस्तान में ताजिक और पख्तून दो प्रभावशाली जातीय समुदाय हैं जिनके बीच सत्ता के नियंत्रण को लेकर हमेशा टकराव रहा है। उत्तरी गठजोड़ काबुल में ऐसी किसी सत्ता को स्वीकार नहीं करेगा जिसमें पख्तूनों का दबदबा हो। अमेरिका में इन तीनों देशों को अफगान समस्या से अलग थलग रखा। लेकिन आज एक ऐसी परिस्थिति पैदा होती हो रही है जिसमें उत्तरी अफगानी गठजोड़ भारत-रूस और ईरान की मदद से पाकिस्तान-तालिबान गठजोड़ के खिलाफ नया संघर्ष छेड़ सकता है।
भारत ने अफगानिस्तान में करजई सरकार के सत्तासीन होने के बाद 1.3 अरब डॉलर की मदद दी और अफगानिस्तान में सड़कों, पुलों, बिजली, अस्पताल और स्कूलों का निर्माण किया। भारत के इन प्रयासों को विफल करने के लिये ही आईएसआई ने हक्कानी गुट की मदद से भारतीय ठिकानों पर हमले कराये। पाकिस्तानी रणनीति के तहत अफगानिस्तान में कोई भी राजनीतिक समाधान तभी हो सकता है जब वहां ऐसी कोई सत्ता कायम हो जिस पर इस्लामी कट्टपंथियों का नियंत्रण हो। ऐसे में इस्लामी उग्रवाद को पराजित करने और नौ सालों तक अफगानिस्तान में युद्ध छेड़ने के अमेरिकी लक्ष्यों की नियति क्या होगी ? अमेरिका 2011 के बाद अमेरिका अफगानिस्तान में इसलिए नहीं रह सकता क्योंकि नौ सालों में जो हासिल नहीं किया जा सका उसको आगे भी हासिल नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर अफगानिस्तान में पाकिस्तान का लक्ष्य पूरा होता है तो निश्चय ही भारत रूस और ईरान को यह मंजूर नहीं होगा और जाहिर है इस तरह की सत्ता को अमेरिका का भी समर्थन हासिल नहीं होगा। इस परिदृश्य में बलूचिस्तान में भारत के प्रभाव और उजबेकिस्तान में भारत के वायुसैनिक अड्डे से पाकिस्तान विचलित है।
पाकिस्तान की रणनीति अफगानिस्तान में एक नया युद्द का शुरु करेगी और यह एक ऐसा युद्द होगा जिससे लड़ने के लिए जर्जर और अस्थिर पाकिस्तान के पास कोई दमखम नहीं है। इस पाकिस्तानी रणनीति का संचालन का सैनिक प्रतिष्टान के हाथ में है और भारत विरोधी उन्माद से ग्रसित पाकिस्तानी सेना एक बार फिर पाकिस्तान को विनाश के रास्ते पर ले जा रही है। इस भावी अफगान टकराव के दूरगामी परिणाम होंगे और इसकी सबसे अधिक तपिश अफगानी लोगों को झलनी पड़ेगी जो पिछले तीन दशकों से युद्द की आग में झुलस रहे हैं।
अमेरिका में यह अहसास गहराता जा रहा है कि अफगान युद्द जीता नहीं जा सकता। राष्ट्रपति ओबामा स्वयं ‘विजय’ के बजाय ‘समाधान’ की बात कर रहे हैं। अमेरिका ने 2011 तक अपनी सेनाएं बुलाने का ऐलान कर दिया है। अमेरिका में यह धारणा प्रबल हो चुकी है कि अफगान युद्ध में जब अबतक विजय हासिल नहीं हुई तो अगले एक साल में ऐसा कुछ हासिल नहीं होने जा रहा जो अब तक नहीं हासिल हुआ है। अफगानिस्तान में सैनिक अमेरिका की वापसी से जो राजनीतिक शून्य पैदा होगा उसकी भरपाई को लेकर अभी तक कोई साफ तस्वीर नहीं उभरी है। लेकिन इतना तय है कि करजई सरकार अमेरिका की वापसी के उपरांत टिक नहीं सकती। अचरज की बात तो यह है कि नौ सालों से सैनिक अभियान चला रहे अमेरिका ने अबतक भावी अफगानिस्तान का कोई स्पष्ट नक्शा पेश नहीं किया है।
असमंजस और अनिश्चय के इस माहौल में पाकिस्तान बेहद सक्रिय हो गया है और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण अफगानिस्तान में अपनी पिठ्ठू सरकार कायम करना चाहता है। हाल ही में पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल कियानी और कुख्यात खुफिया एजेंसी के प्रधान जनरल पाशा ने काबुल की यात्राएं की। कई अन्य स्तरों पर भी पाकिस्तान करजई सरकार के संपर्क में है। करजई पाकिस्तान के कट्टर विरोधी रहे हैं और भारत समर्थक के रूप में जाने जाते हैं। लेकिन अब बदली परिस्थितियों में पाकिस्तान करजई सरकार को लुभाकर और डराकर साथ लाना चाहता है। पाकिस्तान का केन्द्रीय लक्ष्य अफगानिस्तान में भारत विरोधी सत्ता कायम करना है। इस मकसद को हासिल करने के लिये इस्लामी इस्लामी उग्रवादी संगठन पाकिस्तान का साथ दे रहे हैं।
पाकिस्तान करजई को ये संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि अगर वे इस्लामी उग्रवादियों को सत्ता में भागीदार बना लेते हैं तो अमेरिकी वापसी के बाद भी अफगान के राजनैतिक जीवन में करजई का वजूद बना रहेगा। करजई ने कभी भी पाकिस्तान पर भरोसा नहीं किया है लेकिन उनको अहसास है कि अमेरिकी वापसी के उपरांत वे तालिबान से टक्कर नहीं ले सकते । पाकिस्तान ने इस रणनीति के पहले चरण में एक इस्लामी उग्रवादी हक्कानी के गुट को सत्ता में भागीदार बनाने का प्रस्ताव दिया है। हक्कानी वे शख्स हैं जिन्होंने आईएसआई की मदद से अफगानिस्तान में कई भारतीय ठिकानों पर आतंकवादी हमलों को अंजाम दिया था। पाकिस्तान की रणनीति यहीं तक सीमित नहीं है बल्कि मौका मिलने पर वे तालिबानी नेता मुल्ला उमर और कट्टरपंथी नेता हिकमतयार को भी सत्ता में घुसाने की कोशिश करेंगे। पाकिस्तान काफी समय से ‘उदार’ तालिबान की भी बातें करता रहा है और यह तर्क देता है कि अफगानिस्तान में तालिबान के बिना कोई स्थायित्व लाना संभव नहीं है। यहां चौंकाने वाली बात ये है कि सउदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात भी पाकिस्तान के साथ इस मैदान में कूद पड़े हैं और करजई को ‘मध्यस्थ’ की भूमिका अदा करने की सलाह दे रहे हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि विश्वभर में यही वो तीन देश थे जिन्होंने 1996 में तालिबानी सत्ता को विश्व भर में मान्यता दी थी।
यह घटनाक्रम अमेरिकी लक्ष्यों के अनुकूल नहीं है लेकिन विडंबना यह है कि अमेरिकी की वापसी की स्थिति में और विकल्प भी क्या है ? इस बीच पाकिस्तान ने अमेरिकी आपत्तियों को दरकिनार करते हुए चीन के साथ नाभिकीय समझौता किया है जिसके तहत चीन पाकिस्तान में दो नाभिकीय संयंत्र लगाने जा रहा है। यह इसलिये अधिक चिंताजनक है कि दुनिया में पाकिस्तान एकमात्र ऐसा देश है जिसका नाभिकीय प्रोद्योगिकी के प्रसार में बेहद खराब रिकॉर्ड रहा है और यही एक ऐसा देश है जिसे लेकर शंका पैदा होती है कि पता नहीं कब और कैसे इसकी नाभिकीय प्रोद्योगिकी ऐसे गुटों के हाथ ना चले जाये जो दुनिया में विनाश फैला सकते हैं।
अफगानिस्तान में केवल पाकिस्तान और अमेरिका के हित ही दांव पर नहीं लगे हैं बल्कि भारत-ईरान और रूस भी अफगानिस्तान में इस्लामी उग्रवादी सत्ता को स्वीकार नहीं कर सकते। ये तीनों देश तालिबान के खिलाफ उत्तरी गठजोड़ को समर्थन देते रहे हैं जिसमें ताजिकों का वर्चस्व है। अफगानिस्तान में ताजिक और पख्तून दो प्रभावशाली जातीय समुदाय हैं जिनके बीच सत्ता के नियंत्रण को लेकर हमेशा टकराव रहा है। उत्तरी गठजोड़ काबुल में ऐसी किसी सत्ता को स्वीकार नहीं करेगा जिसमें पख्तूनों का दबदबा हो। अमेरिका में इन तीनों देशों को अफगान समस्या से अलग थलग रखा। लेकिन आज एक ऐसी परिस्थिति पैदा होती हो रही है जिसमें उत्तरी अफगानी गठजोड़ भारत-रूस और ईरान की मदद से पाकिस्तान-तालिबान गठजोड़ के खिलाफ नया संघर्ष छेड़ सकता है।
भारत ने अफगानिस्तान में करजई सरकार के सत्तासीन होने के बाद 1.3 अरब डॉलर की मदद दी और अफगानिस्तान में सड़कों, पुलों, बिजली, अस्पताल और स्कूलों का निर्माण किया। भारत के इन प्रयासों को विफल करने के लिये ही आईएसआई ने हक्कानी गुट की मदद से भारतीय ठिकानों पर हमले कराये। पाकिस्तानी रणनीति के तहत अफगानिस्तान में कोई भी राजनीतिक समाधान तभी हो सकता है जब वहां ऐसी कोई सत्ता कायम हो जिस पर इस्लामी कट्टपंथियों का नियंत्रण हो। ऐसे में इस्लामी उग्रवाद को पराजित करने और नौ सालों तक अफगानिस्तान में युद्ध छेड़ने के अमेरिकी लक्ष्यों की नियति क्या होगी ? अमेरिका 2011 के बाद अमेरिका अफगानिस्तान में इसलिए नहीं रह सकता क्योंकि नौ सालों में जो हासिल नहीं किया जा सका उसको आगे भी हासिल नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर अफगानिस्तान में पाकिस्तान का लक्ष्य पूरा होता है तो निश्चय ही भारत रूस और ईरान को यह मंजूर नहीं होगा और जाहिर है इस तरह की सत्ता को अमेरिका का भी समर्थन हासिल नहीं होगा। इस परिदृश्य में बलूचिस्तान में भारत के प्रभाव और उजबेकिस्तान में भारत के वायुसैनिक अड्डे से पाकिस्तान विचलित है।
पाकिस्तान की रणनीति अफगानिस्तान में एक नया युद्द का शुरु करेगी और यह एक ऐसा युद्द होगा जिससे लड़ने के लिए जर्जर और अस्थिर पाकिस्तान के पास कोई दमखम नहीं है। इस पाकिस्तानी रणनीति का संचालन का सैनिक प्रतिष्टान के हाथ में है और भारत विरोधी उन्माद से ग्रसित पाकिस्तानी सेना एक बार फिर पाकिस्तान को विनाश के रास्ते पर ले जा रही है। इस भावी अफगान टकराव के दूरगामी परिणाम होंगे और इसकी सबसे अधिक तपिश अफगानी लोगों को झलनी पड़ेगी जो पिछले तीन दशकों से युद्द की आग में झुलस रहे हैं।
एक नए,एक अलग शीत युद्ध की दस्तक
सुभाष धूलिया
इतिहास में आज तक विश्व के सत्ता समीकरण कभी भी शांतिपूर्वक नहीं बदले हैं। एक बड़ी आर्थिक और सैनिक शक्ति के रूप में चीन का उदय से भी विश्व के सत्ता समीकरण डगमगा रहे हैं और अमेरिकी प्रभुत्व के लिए चुनौती उभर रही है । चीन की इस बढ़ती ताकत पर अंकुश लगाने के लिए अमेरिका ने आक्रामक रुख अपना लिया है। अमेरिका और चीन के बीच उभर रहे आर्थिक संघर्ष और सैनिक टकराव से कारण दुनिया पर एक नए शीत युद्ध के बदल मंडरा रहे हैं।
अमेरिका और सोवियत संध के बीच पहला शीत युद्ध दुनिया के अनेक सामरिक ठिकानों और सागर महासागर के मार्गों पर प्रभुत्व कायम करने के लिये लड़ा गया। शीत युद्ध के दौरान वास्तविक युद्ध इसलिये कभी नहीं हो पाया क्योंकि सोवियत संघ और अमेरिका की सैनिक ताकत लगभग बराबर थी। पारस्परिक विनाश के डर शीत युद्ध कभी प्रत्यक्ष युद्ध में नहीं बदला। इस शीत युद्ध का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि अमेरिका की आर्थिक और सैनिक ताकत अब भी चीन से कहीं अधिक है लेकिन विनाश करने वाली ताकत के मामले में चीन को कम भी कम कर नहीं आँका जा सकता ।
आर्थिक ताकत के मामले में हाल ही में चीन जापान को पीछे छोड़ दिया है और अमेरिका के बाद यह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत बन गया है। चीन की आर्थिक वृद्धि पर अगर इसी तरह बढ़त बनी रही तो अगले 20 साल में वह अमेरिका को भी पीछे छोड़ देगा। चीन के इस उभर के सामानांतर अमेरिका की आर्थिक ताकत में लगातार ह्रास हो रहा और दुनिया पर प्रभुत्व कायम रखने लिए अधिकाधिक सैनिक ताकत का सहारा ले रहा है। पिछले 20 सालों में अमेरिका दुनिया को यह संदेश दे चुका है कि उसके प्रभुत्व को ललकारने वाली किसी भी चुनौती को कुचलने के लिए वह सैनिक ताकत का प्रयोग करने से नहीं हिचकिचायेगा।
इराक और अफगानिस्तान पर अमेरिकी आक्रमण के पीछे आतंकवाद से कहीं अधिक विश्व पर प्रभुत्व कायम करने की व्यापक रणनीति रही है। इराक पर नियंत्रण के बाद तेल संसाधनों से संपन्न मध्य-पूर्व में अमेरिका को चुनौती देने वाला कोई नही है और ईरान से उपजने वाला प्रतिरोध को कुचलने के लिए अमेरिका कमर कसे हुए है। अफगानिस्तान पर नियंत्रण के बाद अमेरिका को मध्य- एशिया पर प्रभुत्व कायम करने के लिये एक अहम सामरिक ठिकाना मिल गया है। मौजूदा परिस्थियों में पाकिस्तान के लिए भी अमेरिका के चंगुल से निकलना आसान नहीं है ।
चीन की बढ़ती ताकत को रोकने के लिए अमेरिका ने घेराबंदी शुरु कर दी है। अमेरिका दक्षिण एशिया और मध्य एशिया के साथ ही मध्य पूर्व में भी चीन के दरवाजे लगभग बंद कर दिये हैं। चीन से लगे पूर्व और दक्षिण एशिया में भी अमेरिका ने अपनी मजबूत सैनिक उपस्थिति कायम कर ली है। दक्षिण चीन सागर अमेरिका और चीन के बीच टकराव का सबसे बडा केन्द्र बना हुआ है। इस सागर का समुद्री मार्ग ही चीन को बाकी दुनिया से जोड़ता है और इसके आर्थिक जीवन की धुरी है। चीन इस सागर को अपना प्रभाव क्षेत्र मानता है और यहां अमेरिका या किसी भी दूसरी ताकत की सैनिक उपस्थिति का विरोधी है।
हाल ही में अमेरिकी हिलेरी क्लिंटन ने कहा था कि दक्षिणी चीन सागर सभी के लिए समान रूप से खुला होना चाहिये तो चीन के विदेश मंत्री ने इस बयान को चीन पर हमले के समान ठहराया। इस सागर को लेकर चीन और वियतनाम के बीच विवाद है और अमेरिका ने वियतनाम के साथ समारिक गठजोड़ कायम कर लिया है और वियतनाम को नाभिकीय प्रोद्योगिकी देने पर भी बातचीत चल रही है। दक्षिणी चीन सागर पर प्रभुत्व कायम करने की अमेरिकी रणनीति में वियतनाम की अहम भूमिका हो सकती है इसी वजह से वियतनाम के प्रति चीन ने आक्रमक रुख अपना लिया है। अमेरिका ने ऑस्ट्रेलिया,जापान,सिंगापुर,दक्षिण कोरिया और वियतानाम के साथ सामरिक गठजोड़ कायम कर चीन को घेर लिया है। भारत पाकिस्तान और अफगानिस्तान से भी अमेरिका ने अलग-अलग तरह के सामरिक रिश्ते कायम कर लिये हैं। यहां तक कि चीन की इस घेराबंदी को लेकर रूस भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका का ही साथ दे रहा है। इस घेराबंदी से अमेरिका ऐसी स्थिति में आ गया है की कभी भी किसी विवाद की स्थिति में वह चीन की अर्थव्यवस्था का गला घोंट सकता है और बार बार आ रही आर्थिक मंदी से इस तरह के हालत पैदा हो सकतें हैं।
इस पृष्ठभूमि में लगता है कि एक बार फिर उसी तरह के हालात पैदा हो रहे हैं जिनके परिणामस्वरुप दुनिया में दो विश्व युद्ध लड़े गये। दुनिया के बाजारों,आर्थिक संसाधनों और सामरिक ठिकानों को लेकर जब-जब स्थापित महाशक्तियों को उभरती शक्तियों से चुनौती मिली तो इसका परिणाम युद्ध के रूप में ही सामने आया। तीस के दशक की महामंदी दूसरे विश्व युद्ध का एक बहुत बड़ा कारण थी। आज फिर आर्थिक मंदियों के आने-जाने का सिलसिला कायम हो गया है और हर मंदी के बाद नये आर्थिक टकराव पैदा हो रहे हैं। नये परिदृश्य में चीन और अमेरिका के बीच व्यापार युद्ध भी तेज हो रहा है और अमेरिका अपनी अनेक आर्थिक समस्यायों के लिए चीन को उत्तरदायी ठहरा रहा है। दूसरी ओर चीन अर्थव्यवस्था का लगातार विस्तार हो रहा है और इस बढ़ती अर्थव्यवस्था को बाजारों और आर्थिक संसाधानों की जरुरत होगी। चीन पहले ही अमेरिका को पीछे छोड़ते हुए दुनिया का ऊर्जा का सबसे बड़ा उपभोक्ता बन गया है।
इस तरह की परिस्थितियों में पिछली सदी ने विश्व युद्धों को जन्म दिया। कुछ हलकों में आशंका है कि दुनिया एक बार फिर नए टकराव अग्रसर है लेकिन इक्कीसवीं सदी की विश्व व्यवस्था में अभी तक कोई स्थायित्व नहीं आया है और जहां चीन की आर्थिक वृद्धि किसी मजबूत आर्थिक धरातल पर खड़ी नहीं है वहीं अमेरिकी प्रभुत्व की जमीन भी ऊबड़खाबड़ है। इसलिये मौजूदा हालातों में इस टकराव की हार-जीत का गणित और हार-जीत के अर्थ काफी जटिल और कठिन है।
इतिहास में आज तक विश्व के सत्ता समीकरण कभी भी शांतिपूर्वक नहीं बदले हैं। एक बड़ी आर्थिक और सैनिक शक्ति के रूप में चीन का उदय से भी विश्व के सत्ता समीकरण डगमगा रहे हैं और अमेरिकी प्रभुत्व के लिए चुनौती उभर रही है । चीन की इस बढ़ती ताकत पर अंकुश लगाने के लिए अमेरिका ने आक्रामक रुख अपना लिया है। अमेरिका और चीन के बीच उभर रहे आर्थिक संघर्ष और सैनिक टकराव से कारण दुनिया पर एक नए शीत युद्ध के बदल मंडरा रहे हैं।
अमेरिका और सोवियत संध के बीच पहला शीत युद्ध दुनिया के अनेक सामरिक ठिकानों और सागर महासागर के मार्गों पर प्रभुत्व कायम करने के लिये लड़ा गया। शीत युद्ध के दौरान वास्तविक युद्ध इसलिये कभी नहीं हो पाया क्योंकि सोवियत संघ और अमेरिका की सैनिक ताकत लगभग बराबर थी। पारस्परिक विनाश के डर शीत युद्ध कभी प्रत्यक्ष युद्ध में नहीं बदला। इस शीत युद्ध का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि अमेरिका की आर्थिक और सैनिक ताकत अब भी चीन से कहीं अधिक है लेकिन विनाश करने वाली ताकत के मामले में चीन को कम भी कम कर नहीं आँका जा सकता ।
आर्थिक ताकत के मामले में हाल ही में चीन जापान को पीछे छोड़ दिया है और अमेरिका के बाद यह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत बन गया है। चीन की आर्थिक वृद्धि पर अगर इसी तरह बढ़त बनी रही तो अगले 20 साल में वह अमेरिका को भी पीछे छोड़ देगा। चीन के इस उभर के सामानांतर अमेरिका की आर्थिक ताकत में लगातार ह्रास हो रहा और दुनिया पर प्रभुत्व कायम रखने लिए अधिकाधिक सैनिक ताकत का सहारा ले रहा है। पिछले 20 सालों में अमेरिका दुनिया को यह संदेश दे चुका है कि उसके प्रभुत्व को ललकारने वाली किसी भी चुनौती को कुचलने के लिए वह सैनिक ताकत का प्रयोग करने से नहीं हिचकिचायेगा।
इराक और अफगानिस्तान पर अमेरिकी आक्रमण के पीछे आतंकवाद से कहीं अधिक विश्व पर प्रभुत्व कायम करने की व्यापक रणनीति रही है। इराक पर नियंत्रण के बाद तेल संसाधनों से संपन्न मध्य-पूर्व में अमेरिका को चुनौती देने वाला कोई नही है और ईरान से उपजने वाला प्रतिरोध को कुचलने के लिए अमेरिका कमर कसे हुए है। अफगानिस्तान पर नियंत्रण के बाद अमेरिका को मध्य- एशिया पर प्रभुत्व कायम करने के लिये एक अहम सामरिक ठिकाना मिल गया है। मौजूदा परिस्थियों में पाकिस्तान के लिए भी अमेरिका के चंगुल से निकलना आसान नहीं है ।
चीन की बढ़ती ताकत को रोकने के लिए अमेरिका ने घेराबंदी शुरु कर दी है। अमेरिका दक्षिण एशिया और मध्य एशिया के साथ ही मध्य पूर्व में भी चीन के दरवाजे लगभग बंद कर दिये हैं। चीन से लगे पूर्व और दक्षिण एशिया में भी अमेरिका ने अपनी मजबूत सैनिक उपस्थिति कायम कर ली है। दक्षिण चीन सागर अमेरिका और चीन के बीच टकराव का सबसे बडा केन्द्र बना हुआ है। इस सागर का समुद्री मार्ग ही चीन को बाकी दुनिया से जोड़ता है और इसके आर्थिक जीवन की धुरी है। चीन इस सागर को अपना प्रभाव क्षेत्र मानता है और यहां अमेरिका या किसी भी दूसरी ताकत की सैनिक उपस्थिति का विरोधी है।
हाल ही में अमेरिकी हिलेरी क्लिंटन ने कहा था कि दक्षिणी चीन सागर सभी के लिए समान रूप से खुला होना चाहिये तो चीन के विदेश मंत्री ने इस बयान को चीन पर हमले के समान ठहराया। इस सागर को लेकर चीन और वियतनाम के बीच विवाद है और अमेरिका ने वियतनाम के साथ समारिक गठजोड़ कायम कर लिया है और वियतनाम को नाभिकीय प्रोद्योगिकी देने पर भी बातचीत चल रही है। दक्षिणी चीन सागर पर प्रभुत्व कायम करने की अमेरिकी रणनीति में वियतनाम की अहम भूमिका हो सकती है इसी वजह से वियतनाम के प्रति चीन ने आक्रमक रुख अपना लिया है। अमेरिका ने ऑस्ट्रेलिया,जापान,सिंगापुर,दक्षिण कोरिया और वियतानाम के साथ सामरिक गठजोड़ कायम कर चीन को घेर लिया है। भारत पाकिस्तान और अफगानिस्तान से भी अमेरिका ने अलग-अलग तरह के सामरिक रिश्ते कायम कर लिये हैं। यहां तक कि चीन की इस घेराबंदी को लेकर रूस भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका का ही साथ दे रहा है। इस घेराबंदी से अमेरिका ऐसी स्थिति में आ गया है की कभी भी किसी विवाद की स्थिति में वह चीन की अर्थव्यवस्था का गला घोंट सकता है और बार बार आ रही आर्थिक मंदी से इस तरह के हालत पैदा हो सकतें हैं।
इस पृष्ठभूमि में लगता है कि एक बार फिर उसी तरह के हालात पैदा हो रहे हैं जिनके परिणामस्वरुप दुनिया में दो विश्व युद्ध लड़े गये। दुनिया के बाजारों,आर्थिक संसाधनों और सामरिक ठिकानों को लेकर जब-जब स्थापित महाशक्तियों को उभरती शक्तियों से चुनौती मिली तो इसका परिणाम युद्ध के रूप में ही सामने आया। तीस के दशक की महामंदी दूसरे विश्व युद्ध का एक बहुत बड़ा कारण थी। आज फिर आर्थिक मंदियों के आने-जाने का सिलसिला कायम हो गया है और हर मंदी के बाद नये आर्थिक टकराव पैदा हो रहे हैं। नये परिदृश्य में चीन और अमेरिका के बीच व्यापार युद्ध भी तेज हो रहा है और अमेरिका अपनी अनेक आर्थिक समस्यायों के लिए चीन को उत्तरदायी ठहरा रहा है। दूसरी ओर चीन अर्थव्यवस्था का लगातार विस्तार हो रहा है और इस बढ़ती अर्थव्यवस्था को बाजारों और आर्थिक संसाधानों की जरुरत होगी। चीन पहले ही अमेरिका को पीछे छोड़ते हुए दुनिया का ऊर्जा का सबसे बड़ा उपभोक्ता बन गया है।
इस तरह की परिस्थितियों में पिछली सदी ने विश्व युद्धों को जन्म दिया। कुछ हलकों में आशंका है कि दुनिया एक बार फिर नए टकराव अग्रसर है लेकिन इक्कीसवीं सदी की विश्व व्यवस्था में अभी तक कोई स्थायित्व नहीं आया है और जहां चीन की आर्थिक वृद्धि किसी मजबूत आर्थिक धरातल पर खड़ी नहीं है वहीं अमेरिकी प्रभुत्व की जमीन भी ऊबड़खाबड़ है। इसलिये मौजूदा हालातों में इस टकराव की हार-जीत का गणित और हार-जीत के अर्थ काफी जटिल और कठिन है।
Thursday, 14 January 2010
युद्ध से नहीं पनपता लोकतंत्र
सुभाष धूलिया
अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इस्लामी दुनिया का दिल जीतने के लिए नई पहल के साथ अपनी पारी की शुरुआत की थी लेकिन अभी हाल ही में उन्होंने कहा है कि ‘हिंसक उग्रवाद’ के खिलाफ अमेरिका का संघर्ष केवल अफगानिस्तान और पाकिस्तान तक ही सीमित नहीं रहेगा। इसके तत्काल बाद यमन में एक अमेरिकी विमान को उड़ाने के विफल प्रयास के बाद अमेरिका ने यमन के तथाकथित अलकायदा के ठिकानों पर हवाई हमले किए जिनमें अनेक निर्दोष लोग मारे गए। 9/11 के आतंकवादी हमलों के उपरांत अमेरिका ने ‘आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक युद्ध’ छेड़ने की घोषणा की थी अब यह ‘हिंसक उग्रवाद के खिलाफ संघर्ष’ के रूप में पारिभाषित हो चुका है। लेकिन धरातल की वास्तविकता तो यही है कि यह संघर्ष इस्लामी दुनिया में एक बड़े युद्ध या कई युद्धों का रूप धारण करता चला जा रहा है।
अमेरिकी हमले सउदी अरब की सीमा से लगे यमन के शिया बहुल प्रांत में किए गए। इसके साथ ही यमन की अमेरिकीपरस्त तानाशाही सरकार ने भी अल कायदा के गढ़ों को ध्वस्त करने के लिए सैनिक अभियान छेड़ दिया है। इस अभियान में सउदी अरब की अमेरिकी पिठ्ठू सामंती सत्ता ने भी इस प्रांत में सैनिक कार्रवाईयां की हैं। मिस्त्र भी इस टकराव में कूद पड़ा है और सऊदी अरब के साथ इसने भी यमन में इस इस्लामी उग्रवाद के लिए ईरान को दोषी ठहराया है।
इस दृष्टि से ये घटनाक्रम एक छोटे से देश यमन के एक प्रांत में सैनिक कार्रवाई तक ही सीमित नहीं रह गया है बल्कि एक ओर अमेरिका और उसके समर्थक स्वयं यमन सरकार, सऊदी अरब और मिस्त्र और दूसरी ओर विरोधी ईरान भी इस टकराव से संबंद्ध हो गए हैं। यमन पर अमेरिका के हवाई हमले ऐसे समय में हुए हैं जब अफगानिस्तान में अमेरिका ने 30 हजार और सैनिक तैनात कर दिये हैं और पाकिस्तान की अफगानिस्तान से लगी सीमा पर विशेष दस्तों की गुप्त कार्रवाईयों के अलावा चालकविहीन विमान (ड्रोन) के हमले भी तेज हो गए हैं।
एक ओर तो अफगानिस्तान की स्थिति संभाले नहीं संभल रही है और दूसरी ओर पाकिस्तान पर बढ़ रहे हमलो से पाकिस्तान के भीतर भी नाजुक स्थिति पैदा हो रही है। साथ ही अमेरिका ने पाकिस्तान ने इस समय एक नई तरह की सैनिक उपस्थिति कायम कर ली है और अपने प्रतिष्टठानों की सुरक्षा के नाम पर एक निजी सुरक्षा एजेंसी ‘ब्लैकवाटर’ के दस्ते भी तैयार कर लिए हैं। दरअसल ब्लैकवाटर अमेरिकी की एक ऐसी निजी सुरक्षा एजेंसी है जिसे अमेरिकी सुरक्षातंत्र के अत्यंत प्रशिक्षित सेनानिवृत सुरक्षाकर्मी चलाते हैं। इसकी सैनिक और खुफिया क्षमता अमेरिकी एजेंसियों से किसी भी मायने में कम नहीं है। इराक और कई अन्य देशों में हिंसक कार्रवाईयों के लिए ये संस्था पहले ही काफी बदनाम हो चुकी है। अमेरिका ने इस एजेंसी के दस्तों को समय-समय पर ऐसे दशों में तैनात किया जिनमें अमेरिका प्रत्यक्ष रूप से युद्द में शामिल नहीं हो या किन्हीं अन्य कारणों से अमेरिकी सैनिकों की तैनाती का मसला संवेदनशील रहा है- पाकिस्तान भी इस श्रेणी के देशों में आता है। पाकिस्तान का सत्तातंत्र पहले ही ही अस्त-व्यस्त है और ऐसे में अमेरिका की इन कार्रवाईयों से इस पर संकट के नए बादल मंडरा रहे हैं।
पाकिस्तान में ऐसे समय में सत्ता के अनेक केन्द्र पैदा हो गए हैं जब इसे एक केन्द्रीकृत मजबूत सरकार की सबसे अधिक जरूरत है। राष्ट्रपति जरदारी के बारे में आम धारणा यह है कि वह अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए अमेरिका को रिझाने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं। यहां तक कि पाकिस्तान के सुरक्षातंत्र को एक तरह से अमेरिका के हवाले कर दिया है। उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान को अमेरिका से मिल रही अरबों डॉलर की मदद में एक शर्त यह भी है कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई और पाकिस्तानी सेना को यह प्रमाणपत्र देना होगा कि वे आतंकवाद के खिलाफ मजबूती से लड़ रहे हैं। अमेरिकी की इन तमाम तरह की दखल से अमेरिक –विरोधी रुझान प्रबल हो रहे हैं। ऐसे में पाकिस्तानी सत्ता के लोकप्रिय समर्थन में भारी ह्रास हो रहा है और इससे ‘सीमित पाकिस्तानी लोकतंत्र’ का भविष्य खतरे में पड़ता नजर आ रहा है।
अब ‘हिसंक उग्रावाद’ के खिलाफ अमेरिकी संघर्ष युद्ध इराक, अफगानिस्तान और पाकिस्तान तक ही सीमित नहीं रह गया है बल्कि यमन तक इसका विस्तार हो गया है और सउदी अरब और मिस्त्र भी इसमें कूद पड़े हैं। ईरान पहले ही अमेरिका के निशाने पर है और तमाम संकेत यही हैं कि ईरान नाभिकीय प्रोद्योगिकी विकसित करने के अपने कार्यक्रम से पीछ नहीं हटेगा और ऐसे में ईरान पर अमेरिकी-इजराइल हमला निश्चित सा जान पड़ता है। ईरान की नाभिकीय क्षमता को ध्वस्त किया जा सकता है और ऐसा नहीं भी होता और यह चन्द नाभिकीय हथियार विकसित भी कर लेता है तो भी इससे कहीं अधिक चिंता का विषय पाकिस्तान है जिसके पास अपेक्षातया कहीं बड़ा नाभिकीय हथियारों का जखीरा है। ईरान के अलावा अल्जीरिया, सूडान, सीरिया और सोमालिया अमेरिका के हिट लिस्ट में शामिल हैं।
इराक पर अमेरिका ने ‘लोकतंत्र और स्वतंत्रता’ के नाम पर हमला किया था और तत्कालीन अमेरिकी प्रशासन पर नव-अनुदारवादी इस कदर हावी थे कि उन्होंने सैनिक अभियान के बल पर इस्लामी दुनिया को ‘आधुनिक और लोकतांत्रिक’ बनाने का बीड़ा उठा लिया। इस अभियान में अमेरिका को उन सैनिक हितों औऱ आर्थिक हितों का भी पूरा समर्थन मिला जो इस क्षेत्र के तेल संसाधनों पर नियंत्रण कायम करना चाहते थे। लेकिन आज स्थिति यह है कि लोकतंत्र तो दूर की बात रही इराक और अफगानिस्तान तो एक देश के रूप में भी विखंडित हो चुके हैं।आज पाकिस्तान के लोकतंत्र का भविष्य भी अंधकारमय है। अमेरिका के सहयोगी यमन और सउदी अरब में सामंती तानाशाहियां राज करती हैं। दुनिया के इस भूभाग में लोकतंत्र का अकाल है और इस कारण अमेरिकी समर्थक और विरोधी दोनों ही श्रेणी के देशों में धार्मिक उग्रवाद का सामाजिक और राजनीतिक आधार विस्तृत हो रहा है। अमेरिका के सैनिक अभियान से रही-सही उदार लोकतांत्रिक और राजनीतिक धाराएं भी तबाह हो रही हैं। ‘लोकतंत्र और स्वतंत्रता’ का अमेरिकी अभियान विजय की दिशाहीन खोज में बर्बर तानाशाही सत्ताओं पर ही निर्भर होता चला जा रहा है।
अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इस्लामी दुनिया का दिल जीतने के लिए नई पहल के साथ अपनी पारी की शुरुआत की थी लेकिन अभी हाल ही में उन्होंने कहा है कि ‘हिंसक उग्रवाद’ के खिलाफ अमेरिका का संघर्ष केवल अफगानिस्तान और पाकिस्तान तक ही सीमित नहीं रहेगा। इसके तत्काल बाद यमन में एक अमेरिकी विमान को उड़ाने के विफल प्रयास के बाद अमेरिका ने यमन के तथाकथित अलकायदा के ठिकानों पर हवाई हमले किए जिनमें अनेक निर्दोष लोग मारे गए। 9/11 के आतंकवादी हमलों के उपरांत अमेरिका ने ‘आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक युद्ध’ छेड़ने की घोषणा की थी अब यह ‘हिंसक उग्रवाद के खिलाफ संघर्ष’ के रूप में पारिभाषित हो चुका है। लेकिन धरातल की वास्तविकता तो यही है कि यह संघर्ष इस्लामी दुनिया में एक बड़े युद्ध या कई युद्धों का रूप धारण करता चला जा रहा है।
अमेरिकी हमले सउदी अरब की सीमा से लगे यमन के शिया बहुल प्रांत में किए गए। इसके साथ ही यमन की अमेरिकीपरस्त तानाशाही सरकार ने भी अल कायदा के गढ़ों को ध्वस्त करने के लिए सैनिक अभियान छेड़ दिया है। इस अभियान में सउदी अरब की अमेरिकी पिठ्ठू सामंती सत्ता ने भी इस प्रांत में सैनिक कार्रवाईयां की हैं। मिस्त्र भी इस टकराव में कूद पड़ा है और सऊदी अरब के साथ इसने भी यमन में इस इस्लामी उग्रवाद के लिए ईरान को दोषी ठहराया है।
इस दृष्टि से ये घटनाक्रम एक छोटे से देश यमन के एक प्रांत में सैनिक कार्रवाई तक ही सीमित नहीं रह गया है बल्कि एक ओर अमेरिका और उसके समर्थक स्वयं यमन सरकार, सऊदी अरब और मिस्त्र और दूसरी ओर विरोधी ईरान भी इस टकराव से संबंद्ध हो गए हैं। यमन पर अमेरिका के हवाई हमले ऐसे समय में हुए हैं जब अफगानिस्तान में अमेरिका ने 30 हजार और सैनिक तैनात कर दिये हैं और पाकिस्तान की अफगानिस्तान से लगी सीमा पर विशेष दस्तों की गुप्त कार्रवाईयों के अलावा चालकविहीन विमान (ड्रोन) के हमले भी तेज हो गए हैं।
एक ओर तो अफगानिस्तान की स्थिति संभाले नहीं संभल रही है और दूसरी ओर पाकिस्तान पर बढ़ रहे हमलो से पाकिस्तान के भीतर भी नाजुक स्थिति पैदा हो रही है। साथ ही अमेरिका ने पाकिस्तान ने इस समय एक नई तरह की सैनिक उपस्थिति कायम कर ली है और अपने प्रतिष्टठानों की सुरक्षा के नाम पर एक निजी सुरक्षा एजेंसी ‘ब्लैकवाटर’ के दस्ते भी तैयार कर लिए हैं। दरअसल ब्लैकवाटर अमेरिकी की एक ऐसी निजी सुरक्षा एजेंसी है जिसे अमेरिकी सुरक्षातंत्र के अत्यंत प्रशिक्षित सेनानिवृत सुरक्षाकर्मी चलाते हैं। इसकी सैनिक और खुफिया क्षमता अमेरिकी एजेंसियों से किसी भी मायने में कम नहीं है। इराक और कई अन्य देशों में हिंसक कार्रवाईयों के लिए ये संस्था पहले ही काफी बदनाम हो चुकी है। अमेरिका ने इस एजेंसी के दस्तों को समय-समय पर ऐसे दशों में तैनात किया जिनमें अमेरिका प्रत्यक्ष रूप से युद्द में शामिल नहीं हो या किन्हीं अन्य कारणों से अमेरिकी सैनिकों की तैनाती का मसला संवेदनशील रहा है- पाकिस्तान भी इस श्रेणी के देशों में आता है। पाकिस्तान का सत्तातंत्र पहले ही ही अस्त-व्यस्त है और ऐसे में अमेरिका की इन कार्रवाईयों से इस पर संकट के नए बादल मंडरा रहे हैं।
पाकिस्तान में ऐसे समय में सत्ता के अनेक केन्द्र पैदा हो गए हैं जब इसे एक केन्द्रीकृत मजबूत सरकार की सबसे अधिक जरूरत है। राष्ट्रपति जरदारी के बारे में आम धारणा यह है कि वह अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए अमेरिका को रिझाने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं। यहां तक कि पाकिस्तान के सुरक्षातंत्र को एक तरह से अमेरिका के हवाले कर दिया है। उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान को अमेरिका से मिल रही अरबों डॉलर की मदद में एक शर्त यह भी है कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई और पाकिस्तानी सेना को यह प्रमाणपत्र देना होगा कि वे आतंकवाद के खिलाफ मजबूती से लड़ रहे हैं। अमेरिकी की इन तमाम तरह की दखल से अमेरिक –विरोधी रुझान प्रबल हो रहे हैं। ऐसे में पाकिस्तानी सत्ता के लोकप्रिय समर्थन में भारी ह्रास हो रहा है और इससे ‘सीमित पाकिस्तानी लोकतंत्र’ का भविष्य खतरे में पड़ता नजर आ रहा है।
अब ‘हिसंक उग्रावाद’ के खिलाफ अमेरिकी संघर्ष युद्ध इराक, अफगानिस्तान और पाकिस्तान तक ही सीमित नहीं रह गया है बल्कि यमन तक इसका विस्तार हो गया है और सउदी अरब और मिस्त्र भी इसमें कूद पड़े हैं। ईरान पहले ही अमेरिका के निशाने पर है और तमाम संकेत यही हैं कि ईरान नाभिकीय प्रोद्योगिकी विकसित करने के अपने कार्यक्रम से पीछ नहीं हटेगा और ऐसे में ईरान पर अमेरिकी-इजराइल हमला निश्चित सा जान पड़ता है। ईरान की नाभिकीय क्षमता को ध्वस्त किया जा सकता है और ऐसा नहीं भी होता और यह चन्द नाभिकीय हथियार विकसित भी कर लेता है तो भी इससे कहीं अधिक चिंता का विषय पाकिस्तान है जिसके पास अपेक्षातया कहीं बड़ा नाभिकीय हथियारों का जखीरा है। ईरान के अलावा अल्जीरिया, सूडान, सीरिया और सोमालिया अमेरिका के हिट लिस्ट में शामिल हैं।
इराक पर अमेरिका ने ‘लोकतंत्र और स्वतंत्रता’ के नाम पर हमला किया था और तत्कालीन अमेरिकी प्रशासन पर नव-अनुदारवादी इस कदर हावी थे कि उन्होंने सैनिक अभियान के बल पर इस्लामी दुनिया को ‘आधुनिक और लोकतांत्रिक’ बनाने का बीड़ा उठा लिया। इस अभियान में अमेरिका को उन सैनिक हितों औऱ आर्थिक हितों का भी पूरा समर्थन मिला जो इस क्षेत्र के तेल संसाधनों पर नियंत्रण कायम करना चाहते थे। लेकिन आज स्थिति यह है कि लोकतंत्र तो दूर की बात रही इराक और अफगानिस्तान तो एक देश के रूप में भी विखंडित हो चुके हैं।आज पाकिस्तान के लोकतंत्र का भविष्य भी अंधकारमय है। अमेरिका के सहयोगी यमन और सउदी अरब में सामंती तानाशाहियां राज करती हैं। दुनिया के इस भूभाग में लोकतंत्र का अकाल है और इस कारण अमेरिकी समर्थक और विरोधी दोनों ही श्रेणी के देशों में धार्मिक उग्रवाद का सामाजिक और राजनीतिक आधार विस्तृत हो रहा है। अमेरिका के सैनिक अभियान से रही-सही उदार लोकतांत्रिक और राजनीतिक धाराएं भी तबाह हो रही हैं। ‘लोकतंत्र और स्वतंत्रता’ का अमेरिकी अभियान विजय की दिशाहीन खोज में बर्बर तानाशाही सत्ताओं पर ही निर्भर होता चला जा रहा है।
Wednesday, 23 December 2009
मीडिया : व्यापार और साख के बीच
सुभाष धूलिया
भारतीय अर्थव्वस्था में मीडिया और मनोरंजन उद्योग सबसे तेजी से बढ़ रहे सेक्टरों में से एक है। एक अध्ययन के अनुसार यह उद्योग 18 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है और सन 2011 तक यह 1 हजार अरब रुपये का विशालकाय रूप धारण कर लेगा। देश में अखबारों के करीब 25 करोड़ पाठक हैं। इसके अलावा 35 करोड़ ऐसे लोग हैं जो पढ़ना-लिखना जानते हैं लेकिन अभी कोई पत्र-पत्रिकाएं नहीं पढ़ते। देश की आधे से ज्यादा आबादी 30 वर्ष से कम उम्र की है और मीडिया के लिए एक बड़ा संभावित बाजार है इससे जाहिर है कि देश में प्रिंट मीडिया के विस्तार की कितनी संभावनाएं मौजूद हैं। देश के 11 करोड़ घरों में टेलीविजन सेट हैं और इनमें से 65 प्रतिशत केबल सेटेलाइट से जुड़े हैं। मोटे तौर पर यह कह सकते हैं कि करीब 50 करोड़ लोग टेलीविजन देखते हैं। रेडियो की पहुंच लगभग पूरे देश में हैं। नयी प्रोद्योगिकियों के आने से इंटरनेट और मोबाइल में पसर रही क्रांति से सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि आने वाले वर्षों में भारतीय मीडिया उद्योग कैसा रूप धारण कर लेगा।
इस वक्त भारत का 30 करोड़ का मध्यमवर्ग है जिसके पास अतिरिक्त क्रय शक्ति है और मीडिया समेत सभी तरह के उत्पादों का एक बड़ा बाजार है। इस मध्यमवर्ग का लगातार विस्तार हो रहा है और जल्द ही यह यूरोपीय यूनियन से भी कहीं बड़ा बाजार बनने जा रहा है। भारतीय अर्थव्यवस्था की मौजूदा वृद्धि दर अगर जारी रही तो कुछ वर्षों में ही भारत अमेरिका और चीन के बाद विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होगी। (लेकिन यहां ये भी उल्लेख करना भी आवश्यक है कि अर्थव्यवस्था की वृद्धि और समूचे समाज के विकास में अंतर है, इस नयी अर्थव्यवस्था में करोड़ों लोग ‘बाजार’ से बाहर ही नहीं होंगे बल्कि नयी अर्थव्यवस्था में इनकी कोई उपयोगिता नहीं होगी)
भारतीय अर्थव्यवस्था, मीडिया और मनोरंजन उद्योग और बाजार में इस तरह की वृद्धि और विस्तार के साथ ही देश के राजनैतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन में इसके दखल और प्रभाव भी निरंतर गहरा और व्यापक होता जा रहा है। मीडिया के इस उद्योग में समाचार पत्र, रेडियो से लेकर सिनेमा संगीत और वीडियो गेमिंग जैसे नए उत्पाद भी आते हैं। इस उद्योग के मौटे तौर पर समाचार और मनोरंजन की दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है। सामाचार सेक्टर का हिस्सा मात्र 8 प्रतिशत होने के बावजूद भी यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह राजनीति को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है वहीं मनोरंजन का प्रभाव समाज और संस्कृति पर अधिक होता है। लेकिन मीडिया एक वैचारिक और सांस्कृतिक उद्योग भी है और इस रूप में मीडिया का हर उत्पाद राजनीति, अर्थशास्त्र और संस्कृति का एक संपूर्ण पैकेज होता है।
इस संदर्भ में सूचना और प्रसारण मंत्रालय की 2008-09 की वार्षिक रिपोर्ट के ये आंकड़े भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि देश के 394 पंजीकृत टेलीविजन चैनलों में 211 समाचार चैनल हैं। सन 2000 में ही निजी क्षेत्र में टेलीविजन का प्रवेश हुआ था लेकिन 9 वर्षों में ही इसने विशाल रूप घारण कर लिया है और राष्ट्रीय जीवन में एक अहम भूमिका अख्तियार कर ली है। आज भी सरकार के पास नए चैनलों के जितने भी आवेदन पत्र विचाराधीन हैं उनमें अधिकांश समाचर चैनलों के ही आवेदन है। मीडिया के स्वामित्व में भी परिवर्तन आ रहे हैं। परंपरागत उद्योगपतियों के अलावा हाल ही में मालामाल हुए उद्यमियों का समूह भी है जो विभिन्न कारणों से माडिया में प्रवेश कर रहे हैं भले ही ये उनके लिए घाटे का सौदा क्यों ना हो। इस घाटे की भरपाई वे अपने अन्य व्यापार से पैदा होने वाले मुनाफे से पैदा करते हैं।
इसके समानांतर मीडिया के परंपरागत चरित्र और स्वरूप में भी बुनियादी परिवर्तन आ रहे हैं। मीडिया सार्वजनिक हित के बजाय एक लाभकारी उद्योग बन रहा है जिसमें समाचार पेप्सी-कोक तरह उपभोग की वस्तु बन रहा है जिसका मकसद उपभोक्ताओं को आकृष्ट करना है। इसी कारण मीडिया में एक ऐसी होड़ मची हुई है जो किसी भी कीमत पर नयी अर्थव्यवस्था से जन्मे उपभोक्ता को जीतना चाहती है। नब्बे के दशक में शुरु किए गये नवउदारवादी सुधारों के उपरांत मीडिया ऐसा उद्यम बन गया है जिसका मकसद अधिकतम मुनाफा कमाना है और जो समाजिक सरोकारों से दूर होता जा रहा है।
इसके अलावा मीडिया के स्वामित्व का भी केन्द्रीकरण हो रहा है और इसकी अन्तर्वस्तु की विविधता संकुचित होती जा रही है। राजधानी दिल्ली का ही उदाहरण लें तो 15-20 वर्ष पहले यहां अनेक दैनिक अखबार थे जो हमारे राष्ट्रीय जीवन के विविध परिपेक्ष्य का प्रितिनिधित्व करते थे- टाइम्स ऑफ इंडिया मध्यमार्गी माना जाता था, हिन्दुस्तान टाइम्स सरकार समर्थक था तो इंडियन एक्सप्रेस के सरकार विरोधी तेवर हुआ करते थे। स्टेट्समेन एक दक्षिणपंथी अखबार था तो पैट्रियॉट वामपंथी रुझान रखता था। मदरलैंड जनसंघ की विचारधारा का प्रतिनिधित्व करता था तो नेशनल हेराल्ड क्रांग्रेस का प्रवक्ता था। लेकिन आज दिल्ली की मीडिया में ये विविधता खत्म हो गयी है और टाइम्स ऑफ इंडिया और हिन्दुस्तान टाइम्स का आधिपत्य कायम हो गया है। इन दोनों ही अखबारों के संपादकीय अन्तर्वस्तु में कोई बुनायीदी अंतर नहीं है और इनकी होड़ बाजार हड़पने तक ही सीमित है। इसके साथ ही आलोचनात्मक और गंभीर राजनीतिक पत्रकारिता हाशिये पर चली गयी है। आज मीडिया राष्ट्र और समाज के सामने एक दिन में समान रूप से 4-5 ऐसी घटनाओं को प्रस्तुत नहीं करता जिससे राष्ट्र और समाज का ऐजेंडा तय हो। कई बार आम लोगों के लिए यह समझना मुश्किल हो जाता है कि कौन सी घटनाएं महत्वपूर्ण हैं और कौन सी नहीं। परंपरागत रूप से एक संपादक, एक पत्रकार लोगों की प्राथमिकताओ को भी तय करता था और इस तरह राजनीति को प्रभावित करने और सामाजिक विकास का मार्ग प्रशस्त करने में अहम भूमिका निभाता था।
आज के परिदृश्य में एक अन्य रूप में भी मीडिया शक्ति का केन्द्रीकरण हो रहा है और 10-15 वर्ष पहले का स्थानीय, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय मीडिया का ढांचा भी ध्वस्त हो गया है। ‘क्षेत्रीय’ ने ‘स्थानीय’ को हड़प लिया है, ‘राष्ट्रीय’ ‘क्षेत्रीय’ में प्रवेश कर रहा है तो ‘क्षेत्रीय’ ने ‘राष्ट्रीय’ मीडिया में घुसपैठ शुरु कर दी है। चंद बड़े संस्थान बाजार के बहुत बड़े हिस्से को नियंत्रित करते हैं। इस प्रक्रिया के जारी रहने से मीडिया का निगमीकरण हो जाएगा और उद्योग, व्यापार और मीडिया के बीच की अंतररेखा विलुप्त हो जाएगी। यह रुझान इस बात से भी स्पष्ट होता है कि मुनाफा कमाने और बाज़ार कि हडपने के लिए किस तरह समाचार के मूल स्वभाव से से भटकाव पैदा हो रहा है और तथ्य और कल्पना का का विचारहीन मसाला पेश किया जा रहा है
मीडिया के स्वामित्व के केन्द्रीयकरण और अंतर्वस्तु के संकुचित होने के बाद लोगों को बड़ी मात्रा में समाचार और सूचना उपलब्ध हैं और यह दावा किया जाता है कि मुक्त अर्थव्यवस्था में लोगों के पास विकल्पों की भरमार है। लेकिन वास्तविक रूप से लोगों के विकल्प बहुत सीमित हो गये हैं और हर समाचार संगठन लगभग एक ही तरह के उत्पाद प्रस्तुत कर रहा है। टेलीविजन के क्षेत्र के बारे में तो यह कहा जा सकता है कि यह बाजार विरोधी है जहां हर दुकान एक ही ऐसा उत्पाद बेचा जा रहा है जिसमें सबसे अधिक मुनाफा कमाने की क्षमता हो।
मीडिया के स्वामित्व और अंतर्वस्तु में इन नकारात्मक रुझानों के समानांतर मीडिया की ताकत बढ़ती जा रहा है और लोकतांत्रिक विमर्श अधिकाधिक मीडिया पर निर्भर होता जा रहा है। राजनीतिक प्रचार का स्वरूप बदल गया है- अब घर-घर जाकर पहले जैसा प्रचार नहीं होता और ऐसी रैलियां भी नहीं होती कि नेताओ को सुनने के लिए भीड़ उमड़ पड़े। अब सारा ध्यान इस बात पर केन्द्रित किया जाता है कि किसी भी राजनीतिक गतिविधि के लिए कितना माडिया कवरेज किया जाए और इस कवरेज के लिए प्रबंधन की नयी तकनीकें विकसित हो गयी है। नेताओं की ऐसी जमात पैदा हो गयी है जो लोगों से जुड़ने के बजाय टेलीविजन के पर्दे पर परफॉर्म करने में ही अधिक दक्ष है। बुनियादी मुद्दों पर गंभीर राजनीतिक विमर्श की बजाय तू-तू मै-मैं का शोर ही अधिक रहता है। व्यापारिक होड़ में फंसे मीडिया को भी यही रास आता है और आज सूचना के मनोरंजनीकरण के बाद राजनीति का भी मनोरंजनीकरण हो रहा है। राजनीति के मनोरंजन के क्षेत्र में प्रवेश करने से लोकतांत्रिक प्रक्रिया में लोगों की भागीदारी को प्रोत्साहित करने की मीडिया की भूमिका में भारी ह्रास हुआ है। आज का मीडिया राजनीतिक जीवन का सतहीकरण कर रहा है और राजनीतिक जीवन में पनप रहे नकारात्मक रुझानों पर अंकुश लगाने की अपनी परंपरागत भूमिका से दूर हो रहा है। दूसरी ओर समाचारों के मूल स्वभाव से भी छेड़छाड़ की जा रही है जिसकी वजह से कई समाचारीय घटनाएं समाचार नहीं बनती और अनेक गैर समाचारीय घटनाएं बड़ी घटनाओं के तौर पर पेश की जाती है। इस प्रक्रिया के कारण लोग अनेक उन बड़ी घटनाओं से अवगत नहीं होते जिनका संबंध उनके जीवन से होता है।
मीडिया के व्यापारीकरण का ऐसा दौर पश्चिम के विकसित देशों में भी आया लेकिन यह तब हुआ जब पूरा समाज ही विकसित होकर मध्यमवर्ग में तब्दील हो चुका था। मध्यमवर्ग के पास इतना बौद्धिक कौशल होता है कि वह ऐसे समाचारों को स्वीकार नहीं करता जिनका वैज्ञानिक आधार न हो और जो अंधविश्वास पर टिके हों। भारत जैसे विकासशील समाज में स्थिति भिन्न है। इस तरह के समाचारों के नकारात्मक परिणामों का अनुमान इस घटना से लगाया जा सकता है कि कुछ समय पहले मध्यप्रदेश में एक अनजाने ज्योतिषि ने अपनी जन्मपत्री के आधार पर किसी एक दिन 4 बजे अपनी मृत्यु की भविष्यवाणी की थी। दो टेलीविजन चैनल इस ‘मृत्यु’ को लाइव प्रसारित कर रहे थे लेकिन ज्योतिषि की भविष्यवाणी सही नहीं निकली। यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण और गंभीर है कि अगर करोडों में एक प्रतिशत भी संभावना के चलते ज्योतिषि की 4 बजे मौत हो जाती तो इस देश के एक बड़े सामाजिक तबके की वैज्ञानिक सोच कई दशक पीछे चली गई होती। हिंदी सिनेमा लोकप्रिय भावनाओं को पकड़कर बोक्स ऑफिस हिट होने के लिए जाना जाता है. हाल ही की एक मूवी "पा" में जिस तरह समाचार मीडिया को निशाना बनाकर आम लोगों की भावना को पकड़ने की कोशिश की गयी है, इसके भी गहन विश्लेषण की जरुरत है कि न्यूज़ मीडिया किधर जा रहा है ? यह सवाल भी उठता है कि क्या आज न्यूज़ मीडिया कॉर्पोरेट पॉवर का एक अंग भर बनाकर नहीं रह गया है जिसमें पत्रकार की भूमिका बहुत कम रह गयी है ?
आज का मीडिया अधिकाधिक उस सामाजिक तबके पर केन्द्रित है जिसके पास अतिरिक्त क्रय शक्ति है और 5 हजार करोड़ के विज्ञापन का मुख्य लक्ष्य है। यही वह तबका है जो उपभोक्तावाद की गिरफ्त में है और नए-नए उत्पादों पर टूट रहा है। इन रुझानों के कारण मीडिया के साथ साख और विश्वसनीयता पर संकट के गहरे बादल मंडरा रहे हैं। एक उपभोक्ता मीडिया उत्पादों का भले ही कितना भी उपभोग क्यों ना करे लेकिन मीडिया को लेकर इसी के अंदर का नागरिक विचलित है, आक्रोश में है। इससे एक जटिल परिस्थिति पैदा हो रही है-एक ऐसा मीडिया जिस पर लोकतांत्रिक विमर्श अधिकाधिक निर्भर होता चला जा रहा है वही मीडिया अपनी साख और विश्वसनीयता को खो रहा है। ऐसे में लोकतंत्र और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में मीडिया की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल पैदा हो रहे हैं।
मीडिया और समाज के बीच एक खाई पैदा हो गयी है। व्यापारीकृत मीडिया काफी हद तक समाज का प्रतिबिंब नहीं रह गया है बल्कि समाज को प्रभावित करने की इसकी क्षमता संकीर्ण होती जा रही है। देश के राजनीतिक जीवन में पनप रही विकृतियों के प्रति मीडिया उदासीन दिखाई पड़ता है। एक ओर विज्ञापन उद्योग, मीडिया और उपभोक्ता के पारस्परिक संबंध इस विकासशील समाज में अभी पारिभाषित ही हो रहे हैं तो दूसरी ओर भारतीय समाज, लोकतंत्र और मीडिया के बीच के संबंध एक ऐसे दौर से गुजर रहे हैं जिनकी कोई स्पष्ट तस्वीर खींचना आज की ताऱीख में संभव नहीं दिखाई देता है।
भारतीय अर्थव्वस्था में मीडिया और मनोरंजन उद्योग सबसे तेजी से बढ़ रहे सेक्टरों में से एक है। एक अध्ययन के अनुसार यह उद्योग 18 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है और सन 2011 तक यह 1 हजार अरब रुपये का विशालकाय रूप धारण कर लेगा। देश में अखबारों के करीब 25 करोड़ पाठक हैं। इसके अलावा 35 करोड़ ऐसे लोग हैं जो पढ़ना-लिखना जानते हैं लेकिन अभी कोई पत्र-पत्रिकाएं नहीं पढ़ते। देश की आधे से ज्यादा आबादी 30 वर्ष से कम उम्र की है और मीडिया के लिए एक बड़ा संभावित बाजार है इससे जाहिर है कि देश में प्रिंट मीडिया के विस्तार की कितनी संभावनाएं मौजूद हैं। देश के 11 करोड़ घरों में टेलीविजन सेट हैं और इनमें से 65 प्रतिशत केबल सेटेलाइट से जुड़े हैं। मोटे तौर पर यह कह सकते हैं कि करीब 50 करोड़ लोग टेलीविजन देखते हैं। रेडियो की पहुंच लगभग पूरे देश में हैं। नयी प्रोद्योगिकियों के आने से इंटरनेट और मोबाइल में पसर रही क्रांति से सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि आने वाले वर्षों में भारतीय मीडिया उद्योग कैसा रूप धारण कर लेगा।
इस वक्त भारत का 30 करोड़ का मध्यमवर्ग है जिसके पास अतिरिक्त क्रय शक्ति है और मीडिया समेत सभी तरह के उत्पादों का एक बड़ा बाजार है। इस मध्यमवर्ग का लगातार विस्तार हो रहा है और जल्द ही यह यूरोपीय यूनियन से भी कहीं बड़ा बाजार बनने जा रहा है। भारतीय अर्थव्यवस्था की मौजूदा वृद्धि दर अगर जारी रही तो कुछ वर्षों में ही भारत अमेरिका और चीन के बाद विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होगी। (लेकिन यहां ये भी उल्लेख करना भी आवश्यक है कि अर्थव्यवस्था की वृद्धि और समूचे समाज के विकास में अंतर है, इस नयी अर्थव्यवस्था में करोड़ों लोग ‘बाजार’ से बाहर ही नहीं होंगे बल्कि नयी अर्थव्यवस्था में इनकी कोई उपयोगिता नहीं होगी)
भारतीय अर्थव्यवस्था, मीडिया और मनोरंजन उद्योग और बाजार में इस तरह की वृद्धि और विस्तार के साथ ही देश के राजनैतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन में इसके दखल और प्रभाव भी निरंतर गहरा और व्यापक होता जा रहा है। मीडिया के इस उद्योग में समाचार पत्र, रेडियो से लेकर सिनेमा संगीत और वीडियो गेमिंग जैसे नए उत्पाद भी आते हैं। इस उद्योग के मौटे तौर पर समाचार और मनोरंजन की दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है। सामाचार सेक्टर का हिस्सा मात्र 8 प्रतिशत होने के बावजूद भी यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह राजनीति को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है वहीं मनोरंजन का प्रभाव समाज और संस्कृति पर अधिक होता है। लेकिन मीडिया एक वैचारिक और सांस्कृतिक उद्योग भी है और इस रूप में मीडिया का हर उत्पाद राजनीति, अर्थशास्त्र और संस्कृति का एक संपूर्ण पैकेज होता है।
इस संदर्भ में सूचना और प्रसारण मंत्रालय की 2008-09 की वार्षिक रिपोर्ट के ये आंकड़े भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि देश के 394 पंजीकृत टेलीविजन चैनलों में 211 समाचार चैनल हैं। सन 2000 में ही निजी क्षेत्र में टेलीविजन का प्रवेश हुआ था लेकिन 9 वर्षों में ही इसने विशाल रूप घारण कर लिया है और राष्ट्रीय जीवन में एक अहम भूमिका अख्तियार कर ली है। आज भी सरकार के पास नए चैनलों के जितने भी आवेदन पत्र विचाराधीन हैं उनमें अधिकांश समाचर चैनलों के ही आवेदन है। मीडिया के स्वामित्व में भी परिवर्तन आ रहे हैं। परंपरागत उद्योगपतियों के अलावा हाल ही में मालामाल हुए उद्यमियों का समूह भी है जो विभिन्न कारणों से माडिया में प्रवेश कर रहे हैं भले ही ये उनके लिए घाटे का सौदा क्यों ना हो। इस घाटे की भरपाई वे अपने अन्य व्यापार से पैदा होने वाले मुनाफे से पैदा करते हैं।
इसके समानांतर मीडिया के परंपरागत चरित्र और स्वरूप में भी बुनियादी परिवर्तन आ रहे हैं। मीडिया सार्वजनिक हित के बजाय एक लाभकारी उद्योग बन रहा है जिसमें समाचार पेप्सी-कोक तरह उपभोग की वस्तु बन रहा है जिसका मकसद उपभोक्ताओं को आकृष्ट करना है। इसी कारण मीडिया में एक ऐसी होड़ मची हुई है जो किसी भी कीमत पर नयी अर्थव्यवस्था से जन्मे उपभोक्ता को जीतना चाहती है। नब्बे के दशक में शुरु किए गये नवउदारवादी सुधारों के उपरांत मीडिया ऐसा उद्यम बन गया है जिसका मकसद अधिकतम मुनाफा कमाना है और जो समाजिक सरोकारों से दूर होता जा रहा है।
इसके अलावा मीडिया के स्वामित्व का भी केन्द्रीकरण हो रहा है और इसकी अन्तर्वस्तु की विविधता संकुचित होती जा रही है। राजधानी दिल्ली का ही उदाहरण लें तो 15-20 वर्ष पहले यहां अनेक दैनिक अखबार थे जो हमारे राष्ट्रीय जीवन के विविध परिपेक्ष्य का प्रितिनिधित्व करते थे- टाइम्स ऑफ इंडिया मध्यमार्गी माना जाता था, हिन्दुस्तान टाइम्स सरकार समर्थक था तो इंडियन एक्सप्रेस के सरकार विरोधी तेवर हुआ करते थे। स्टेट्समेन एक दक्षिणपंथी अखबार था तो पैट्रियॉट वामपंथी रुझान रखता था। मदरलैंड जनसंघ की विचारधारा का प्रतिनिधित्व करता था तो नेशनल हेराल्ड क्रांग्रेस का प्रवक्ता था। लेकिन आज दिल्ली की मीडिया में ये विविधता खत्म हो गयी है और टाइम्स ऑफ इंडिया और हिन्दुस्तान टाइम्स का आधिपत्य कायम हो गया है। इन दोनों ही अखबारों के संपादकीय अन्तर्वस्तु में कोई बुनायीदी अंतर नहीं है और इनकी होड़ बाजार हड़पने तक ही सीमित है। इसके साथ ही आलोचनात्मक और गंभीर राजनीतिक पत्रकारिता हाशिये पर चली गयी है। आज मीडिया राष्ट्र और समाज के सामने एक दिन में समान रूप से 4-5 ऐसी घटनाओं को प्रस्तुत नहीं करता जिससे राष्ट्र और समाज का ऐजेंडा तय हो। कई बार आम लोगों के लिए यह समझना मुश्किल हो जाता है कि कौन सी घटनाएं महत्वपूर्ण हैं और कौन सी नहीं। परंपरागत रूप से एक संपादक, एक पत्रकार लोगों की प्राथमिकताओ को भी तय करता था और इस तरह राजनीति को प्रभावित करने और सामाजिक विकास का मार्ग प्रशस्त करने में अहम भूमिका निभाता था।
आज के परिदृश्य में एक अन्य रूप में भी मीडिया शक्ति का केन्द्रीकरण हो रहा है और 10-15 वर्ष पहले का स्थानीय, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय मीडिया का ढांचा भी ध्वस्त हो गया है। ‘क्षेत्रीय’ ने ‘स्थानीय’ को हड़प लिया है, ‘राष्ट्रीय’ ‘क्षेत्रीय’ में प्रवेश कर रहा है तो ‘क्षेत्रीय’ ने ‘राष्ट्रीय’ मीडिया में घुसपैठ शुरु कर दी है। चंद बड़े संस्थान बाजार के बहुत बड़े हिस्से को नियंत्रित करते हैं। इस प्रक्रिया के जारी रहने से मीडिया का निगमीकरण हो जाएगा और उद्योग, व्यापार और मीडिया के बीच की अंतररेखा विलुप्त हो जाएगी। यह रुझान इस बात से भी स्पष्ट होता है कि मुनाफा कमाने और बाज़ार कि हडपने के लिए किस तरह समाचार के मूल स्वभाव से से भटकाव पैदा हो रहा है और तथ्य और कल्पना का का विचारहीन मसाला पेश किया जा रहा है
मीडिया के स्वामित्व के केन्द्रीयकरण और अंतर्वस्तु के संकुचित होने के बाद लोगों को बड़ी मात्रा में समाचार और सूचना उपलब्ध हैं और यह दावा किया जाता है कि मुक्त अर्थव्यवस्था में लोगों के पास विकल्पों की भरमार है। लेकिन वास्तविक रूप से लोगों के विकल्प बहुत सीमित हो गये हैं और हर समाचार संगठन लगभग एक ही तरह के उत्पाद प्रस्तुत कर रहा है। टेलीविजन के क्षेत्र के बारे में तो यह कहा जा सकता है कि यह बाजार विरोधी है जहां हर दुकान एक ही ऐसा उत्पाद बेचा जा रहा है जिसमें सबसे अधिक मुनाफा कमाने की क्षमता हो।
मीडिया के स्वामित्व और अंतर्वस्तु में इन नकारात्मक रुझानों के समानांतर मीडिया की ताकत बढ़ती जा रहा है और लोकतांत्रिक विमर्श अधिकाधिक मीडिया पर निर्भर होता जा रहा है। राजनीतिक प्रचार का स्वरूप बदल गया है- अब घर-घर जाकर पहले जैसा प्रचार नहीं होता और ऐसी रैलियां भी नहीं होती कि नेताओ को सुनने के लिए भीड़ उमड़ पड़े। अब सारा ध्यान इस बात पर केन्द्रित किया जाता है कि किसी भी राजनीतिक गतिविधि के लिए कितना माडिया कवरेज किया जाए और इस कवरेज के लिए प्रबंधन की नयी तकनीकें विकसित हो गयी है। नेताओं की ऐसी जमात पैदा हो गयी है जो लोगों से जुड़ने के बजाय टेलीविजन के पर्दे पर परफॉर्म करने में ही अधिक दक्ष है। बुनियादी मुद्दों पर गंभीर राजनीतिक विमर्श की बजाय तू-तू मै-मैं का शोर ही अधिक रहता है। व्यापारिक होड़ में फंसे मीडिया को भी यही रास आता है और आज सूचना के मनोरंजनीकरण के बाद राजनीति का भी मनोरंजनीकरण हो रहा है। राजनीति के मनोरंजन के क्षेत्र में प्रवेश करने से लोकतांत्रिक प्रक्रिया में लोगों की भागीदारी को प्रोत्साहित करने की मीडिया की भूमिका में भारी ह्रास हुआ है। आज का मीडिया राजनीतिक जीवन का सतहीकरण कर रहा है और राजनीतिक जीवन में पनप रहे नकारात्मक रुझानों पर अंकुश लगाने की अपनी परंपरागत भूमिका से दूर हो रहा है। दूसरी ओर समाचारों के मूल स्वभाव से भी छेड़छाड़ की जा रही है जिसकी वजह से कई समाचारीय घटनाएं समाचार नहीं बनती और अनेक गैर समाचारीय घटनाएं बड़ी घटनाओं के तौर पर पेश की जाती है। इस प्रक्रिया के कारण लोग अनेक उन बड़ी घटनाओं से अवगत नहीं होते जिनका संबंध उनके जीवन से होता है।
मीडिया के व्यापारीकरण का ऐसा दौर पश्चिम के विकसित देशों में भी आया लेकिन यह तब हुआ जब पूरा समाज ही विकसित होकर मध्यमवर्ग में तब्दील हो चुका था। मध्यमवर्ग के पास इतना बौद्धिक कौशल होता है कि वह ऐसे समाचारों को स्वीकार नहीं करता जिनका वैज्ञानिक आधार न हो और जो अंधविश्वास पर टिके हों। भारत जैसे विकासशील समाज में स्थिति भिन्न है। इस तरह के समाचारों के नकारात्मक परिणामों का अनुमान इस घटना से लगाया जा सकता है कि कुछ समय पहले मध्यप्रदेश में एक अनजाने ज्योतिषि ने अपनी जन्मपत्री के आधार पर किसी एक दिन 4 बजे अपनी मृत्यु की भविष्यवाणी की थी। दो टेलीविजन चैनल इस ‘मृत्यु’ को लाइव प्रसारित कर रहे थे लेकिन ज्योतिषि की भविष्यवाणी सही नहीं निकली। यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण और गंभीर है कि अगर करोडों में एक प्रतिशत भी संभावना के चलते ज्योतिषि की 4 बजे मौत हो जाती तो इस देश के एक बड़े सामाजिक तबके की वैज्ञानिक सोच कई दशक पीछे चली गई होती। हिंदी सिनेमा लोकप्रिय भावनाओं को पकड़कर बोक्स ऑफिस हिट होने के लिए जाना जाता है. हाल ही की एक मूवी "पा" में जिस तरह समाचार मीडिया को निशाना बनाकर आम लोगों की भावना को पकड़ने की कोशिश की गयी है, इसके भी गहन विश्लेषण की जरुरत है कि न्यूज़ मीडिया किधर जा रहा है ? यह सवाल भी उठता है कि क्या आज न्यूज़ मीडिया कॉर्पोरेट पॉवर का एक अंग भर बनाकर नहीं रह गया है जिसमें पत्रकार की भूमिका बहुत कम रह गयी है ?
आज का मीडिया अधिकाधिक उस सामाजिक तबके पर केन्द्रित है जिसके पास अतिरिक्त क्रय शक्ति है और 5 हजार करोड़ के विज्ञापन का मुख्य लक्ष्य है। यही वह तबका है जो उपभोक्तावाद की गिरफ्त में है और नए-नए उत्पादों पर टूट रहा है। इन रुझानों के कारण मीडिया के साथ साख और विश्वसनीयता पर संकट के गहरे बादल मंडरा रहे हैं। एक उपभोक्ता मीडिया उत्पादों का भले ही कितना भी उपभोग क्यों ना करे लेकिन मीडिया को लेकर इसी के अंदर का नागरिक विचलित है, आक्रोश में है। इससे एक जटिल परिस्थिति पैदा हो रही है-एक ऐसा मीडिया जिस पर लोकतांत्रिक विमर्श अधिकाधिक निर्भर होता चला जा रहा है वही मीडिया अपनी साख और विश्वसनीयता को खो रहा है। ऐसे में लोकतंत्र और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में मीडिया की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल पैदा हो रहे हैं।
मीडिया और समाज के बीच एक खाई पैदा हो गयी है। व्यापारीकृत मीडिया काफी हद तक समाज का प्रतिबिंब नहीं रह गया है बल्कि समाज को प्रभावित करने की इसकी क्षमता संकीर्ण होती जा रही है। देश के राजनीतिक जीवन में पनप रही विकृतियों के प्रति मीडिया उदासीन दिखाई पड़ता है। एक ओर विज्ञापन उद्योग, मीडिया और उपभोक्ता के पारस्परिक संबंध इस विकासशील समाज में अभी पारिभाषित ही हो रहे हैं तो दूसरी ओर भारतीय समाज, लोकतंत्र और मीडिया के बीच के संबंध एक ऐसे दौर से गुजर रहे हैं जिनकी कोई स्पष्ट तस्वीर खींचना आज की ताऱीख में संभव नहीं दिखाई देता है।
Tuesday, 8 December 2009
The News Reporting
Definition of News
News is a report of any current event, idea or problem which interest large number of people BUT it acquires different meanings and concepts in different political, economic and socio-cultural environment.
What makes news?
1. New information
2. New perspective and Role of News Media
3. How things work, How things are supposed to work; and How things normally work
Structure of a News Story
Intro
Elaboration of intro
Descriptive details
Additional information
Background information
Elements of news
A news report must answer following questions
Who
What
When
Where ----------- generally factual
Why
How ----------------- Element of interpretation is introduced
Newsworthiness
How to decide newsworthiness of an event, idea or problem
(Evaluating information or any other information package)
Audience
Impact
Consequences
Proximity
Timeliness
Prominence (Size)
Context
Policy Parameters
Specific Informational Value
Unusualness
The investigative process
Story idea
Formation of story idea
Formulation of the problem
Preliminary research feasibility study
Plan of action-Synopsis
BASE BUILDING: THE SPIRAL OF RESEARCH
(Moving form ‘unknown’ to ‘known’)
• Written sources (sources of information)
• The sources of knowledge experts, Books, research or specialized journals
• Sources of experiences
• Reportage- Field trips- Observations
• Research interviews
• Partisan sources
• Key interviews
Two Major Streams in Journalism
Episodic Journalism: Reporting Event: What was happening
Thematic Journalism: Reporting the process that goes into happening of the event; Explain why it was happening
News Sources
Examples of sources include:
1. official records
2. publications or broadcasts
3. officials in government or business, organizations or corporations
4. witnesses of crime, accidents or other events
5 people involved with or affected by a news event or issue
Reporters are expected to develop and cultivate sources. This applies especially if they regularly cover a specific topic, known as a "beat".
However, beat reporters must be cautious of becoming too close to their sources. Reporters often, but not always, give greater leeway to sources with little experience.
As a rule of thumb, but especially when reporting on controversy, reporters are expected to use multiple sources. Outside journalism, sources are sometimes known as a "news source".
Credibility
Principles to be observed while reporting and event or editing a news report
Accuracy
Fairness
Balance
Attribution
Objectivity
Various types of journalistic writings
The elements that define the journalistic writing :
• Facts
• Analysis and interpretation
• Comments, opinion and views
News item
News report
News analysis
Interpretative reporting
Feature/featured reporting
Interview
Reportage
Reviews (of books, plays, concerts etc.)
Commentary
Article
Editorial
Profile
Interviewing
An interview is a special kind of conversation. It is a conversation between a journalist and a person who has facts or opinions which are likely to be newsworthy.
News involves people. Whatever news story you are researching, there will be a person or some people who know what you need to know, or who have relevant opinions. They will usually be happy to tell you.
Your job is to find these people, and then ask them what you want to know. That is an interview.
An interview takes place when a journalist asks another person questions with the aim of discovering facts, opinions or emotions.
In some respects it is different from an ordinary conversation, which can be haphazard and unstructured.
An interview should have both a structure and a clear purpose. But it should not be so formal that the person being interviewed feels uncomfortable. There is a distinct line between interviewing someone and interrogating them.
The art of conversation – providing moments of reflection, sympathy and humour, for instance – is an important ingredient of a successful interview.
Types of interviews
1. Informational interview
2. Opinion interview
3. Analytical interview
4. Vox Pop
5. Controversial interview
6. Confrontational interview
7. Emotional interview
8. Profile interview etc.
Interview techniques
Open question
Closed question
Loaded question
Leading question
Multiple answer questions
Link question
Devils advocacy
Question tips
Keep your questions short, simple and specific.
Short: The audience wants to hear the interviewee’s answers, not your questions. Don’t attempt to show off your own knowledge or opinions.
Simple: Complicated questions confuse the interviewee as well as the audience.
Specific: Asking a very general question invites the interviewee to ramble on about anything of his or her choosing.
Critical questions for detecting bias
The media applies a narrative structure to ambiguous events in order to create a coherent and causal sense of events
What is the author's / speaker's socio-political position?
Does the speaker have anything to gain personally from delivering the message?
Who is paying for the message? What is the bias of the medium? Who stands to gain?
What sources does the speaker use, and how credible are they? Does the speaker cite statistics? If so, how and who data gathered the data? Are the data being presented fully?
How does the speaker present arguments? Is the message one-sided, or does it include alternative points of view?
If the message includes alternative points of view, how are those views characterized? Does the speaker use positive words and images to describe his/her point of view and negative words and images to describe other points of view?
Kinds of Biases
Commercial bias
Visual bias
Bad news bias
Narrative bias
Status Quo bias
Fairness bias
Glory bias
News is a report of any current event, idea or problem which interest large number of people BUT it acquires different meanings and concepts in different political, economic and socio-cultural environment.
What makes news?
1. New information
2. New perspective and Role of News Media
3. How things work, How things are supposed to work; and How things normally work
Structure of a News Story
Intro
Elaboration of intro
Descriptive details
Additional information
Background information
Elements of news
A news report must answer following questions
Who
What
When
Where ----------- generally factual
Why
How ----------------- Element of interpretation is introduced
Newsworthiness
How to decide newsworthiness of an event, idea or problem
(Evaluating information or any other information package)
Audience
Impact
Consequences
Proximity
Timeliness
Prominence (Size)
Context
Policy Parameters
Specific Informational Value
Unusualness
The investigative process
Story idea
Formation of story idea
Formulation of the problem
Preliminary research feasibility study
Plan of action-Synopsis
BASE BUILDING: THE SPIRAL OF RESEARCH
(Moving form ‘unknown’ to ‘known’)
• Written sources (sources of information)
• The sources of knowledge experts, Books, research or specialized journals
• Sources of experiences
• Reportage- Field trips- Observations
• Research interviews
• Partisan sources
• Key interviews
Two Major Streams in Journalism
Episodic Journalism: Reporting Event: What was happening
Thematic Journalism: Reporting the process that goes into happening of the event; Explain why it was happening
News Sources
Examples of sources include:
1. official records
2. publications or broadcasts
3. officials in government or business, organizations or corporations
4. witnesses of crime, accidents or other events
5 people involved with or affected by a news event or issue
Reporters are expected to develop and cultivate sources. This applies especially if they regularly cover a specific topic, known as a "beat".
However, beat reporters must be cautious of becoming too close to their sources. Reporters often, but not always, give greater leeway to sources with little experience.
As a rule of thumb, but especially when reporting on controversy, reporters are expected to use multiple sources. Outside journalism, sources are sometimes known as a "news source".
Credibility
Principles to be observed while reporting and event or editing a news report
Accuracy
Fairness
Balance
Attribution
Objectivity
Various types of journalistic writings
The elements that define the journalistic writing :
• Facts
• Analysis and interpretation
• Comments, opinion and views
News item
News report
News analysis
Interpretative reporting
Feature/featured reporting
Interview
Reportage
Reviews (of books, plays, concerts etc.)
Commentary
Article
Editorial
Profile
Interviewing
An interview is a special kind of conversation. It is a conversation between a journalist and a person who has facts or opinions which are likely to be newsworthy.
News involves people. Whatever news story you are researching, there will be a person or some people who know what you need to know, or who have relevant opinions. They will usually be happy to tell you.
Your job is to find these people, and then ask them what you want to know. That is an interview.
An interview takes place when a journalist asks another person questions with the aim of discovering facts, opinions or emotions.
In some respects it is different from an ordinary conversation, which can be haphazard and unstructured.
An interview should have both a structure and a clear purpose. But it should not be so formal that the person being interviewed feels uncomfortable. There is a distinct line between interviewing someone and interrogating them.
The art of conversation – providing moments of reflection, sympathy and humour, for instance – is an important ingredient of a successful interview.
Types of interviews
1. Informational interview
2. Opinion interview
3. Analytical interview
4. Vox Pop
5. Controversial interview
6. Confrontational interview
7. Emotional interview
8. Profile interview etc.
Interview techniques
Open question
Closed question
Loaded question
Leading question
Multiple answer questions
Link question
Devils advocacy
Question tips
Keep your questions short, simple and specific.
Short: The audience wants to hear the interviewee’s answers, not your questions. Don’t attempt to show off your own knowledge or opinions.
Simple: Complicated questions confuse the interviewee as well as the audience.
Specific: Asking a very general question invites the interviewee to ramble on about anything of his or her choosing.
Critical questions for detecting bias
The media applies a narrative structure to ambiguous events in order to create a coherent and causal sense of events
What is the author's / speaker's socio-political position?
Does the speaker have anything to gain personally from delivering the message?
Who is paying for the message? What is the bias of the medium? Who stands to gain?
What sources does the speaker use, and how credible are they? Does the speaker cite statistics? If so, how and who data gathered the data? Are the data being presented fully?
How does the speaker present arguments? Is the message one-sided, or does it include alternative points of view?
If the message includes alternative points of view, how are those views characterized? Does the speaker use positive words and images to describe his/her point of view and negative words and images to describe other points of view?
Kinds of Biases
Commercial bias
Visual bias
Bad news bias
Narrative bias
Status Quo bias
Fairness bias
Glory bias
WHERE DOES NEWS COME FROM?
An idea is an angle about a subject that you believe will interest the readers of your newspaper. Without new ideas the editorial pages would be pretty dull. But where do ideas come from? And how do you find them?
When you are lucky, an idea can sometimes find you. But more often you have to search for ideas. This sounds difficult, but it doesn’t have to be. Every writer has their own way of developing ideas. The longer you work for a particular newspaper, the more attuned you will become to the type of ideas that will interest your readers.
By cultivating an alert mind and training your powers of observation, you will acquire the skill of spotting suitable material. Wherever you are and whatever you are doing, think about every person, every experience and every event in terms of a potential story. Talk to people. Be interested in new subjects. There are feature ideas everywhere. It’s just a case of realising them. When you find them, write them down.
People relate to a wide range of subjects. Many are common to everyone, including relationships and emotional issues, work, money, family, health, education, self-improvement, local and community issues, children, transport…..The list is endless. The only limits are your imagination and your ability to make an idea relevant
Your own eyes and ears
Reporters have a special duty to keep looking for the next story. But everyone who works for a news organisation should be feeding the news machine with stories: things they’ve seen and heard for themselves. The staff are first resource of newsgathering.
The Emergency Services
Newsrooms should have systems in place to make sure they learn quickly about anything of interest, by contacting the emergency services frequently. It is advisable to have a list of the main telephone numbers in a prominent position in the newsroom, and a schedule for calling them.
Contacts
Contacts are the people who provide information to a reporter regularly. They may be official or non-official. Every journalist should keep a list of these people and their contact details – telephone numbers, e-mail, address and so on. They should also try to find out people’s private home and mobile telephone numbers, so they can call them out of hours – or just out of the office, where it may be difficult for the person to speak freely.
Readers, Listeners, Viewers
Encourage your listeners, viewers or readers to call in with potential stories and help them make the news. But always double check any information they provide. They are not journalists and may have misinterpreted an incident.
Eyewitnesses
Ordinary people who see extraordinary things provide a sense of immediacy and a human touch of colour to the facts. However, they may be in a state of shock - and are often unreliable as far as hard facts are concerned.
News Agencies
News agencies are companies which provide news to a number of outlets for a fee. Stories used to be delivered via a telegraph wire to a printer in the newsroom, hence the alternative name wires service.
The Internet
The World Wide Web is an invaluable and unprecedented tool for journalists. Never before have we had so much information at our fingertips.
Search engines are useful in helping you to unearth masses of information on the subject you are researching. And, of course, you can remain instantly up to date on current affairs by using reputable international news sites, such as the BBC.
There is, however, a downside. The internet throws up so much information that it can take valuable hours to sift through the mass of data to find what you need. And not all internet content is reliable. Pick and choose your sites carefully, cross-checking your facts with other information sources when you are in doubt.
In general, however, looking for feature ideas on the internet can be far more convenient than any other method of research. Many newspapers and magazines publish their own websites.
As well as the most familiar aspect of the internet, the world-wide web (WWW), the collection of millions of pages of text, pictures and often sound and video, there are groups discussing thousands of subjects. They are all a potentially rich source of information and contacts. Official web sites – of companies, organisations and government departments – are an excellent source of facts. Unofficial web sites are a great source of gossip and rumour. They are notoriously unreliable.
The Diary
When information is received about events that are happening in the future, this should be written into a diary so that those working on the day are aware of it.
Files
Documents that relate to a future date should be stored in a file until the relevant day. Most newsrooms find it useful to keep a set of folders numbered 1 to 31 for each day of the month, and another set for each month. At the start of each month, the contents are transferred into the day files.
Another file, called the futures folder, can be kept for ideas which are not related to a specific date. When it is quiet, a reporter can look through the folder for ideas that might work up into a story.
Another type of file is the archive or cuttings file, consisting of newspaper cuttings and past scripts relating to ongoing stories and major events. It is a vital reference and a continuing record of events, and itself a source of information.
Further afield
There will surely be a national or international story that you could find a local angle on. This is called ‘localising’ the story.
The Past
You can also revisit one of your major recent stories that has gone a little quiet. What has happened while everyone’s attention was elsewhere?
Other media
Ideas from newspapers
When you read each edition of any newspaper, including your own, ideas for features should leap out at you from almost every page, provided you think laterally and allow your imagination to wander a little.
Let’s start with news stories, which can provide a wealth of feature ideas. Read the news with a feature journalist’s eye. Think about the story and the people who are quoted. Is there a wider issue that needs to be discussed? Is there an interesting personality who emerges from a news story and is worthy of a feature in their own right? Is there an element missing from the news story, one which could be expanded into a feature? And the most important question of all – will your readers be interested in it?
Television and Radio
The world continues to shrink as the internet and satellite broadcasting bring people on different continents in instant contact with information and news reports of events as they unfold.
If your readers have access to television and radio, you should keep a keen eye on the content they are watching. It is forming an additional agenda in their lives, of which the newspaper needs to be aware.
People who appear on TV become popular with your readers. These personalities are useful to interview for features. Television and radio also produce documentaries, which are the elongated versions of newspaper features. Programmes such as these can fuel new ideas.
Other printed material – books and magazines
If books and magazines are sent into your office, make a point of reading them, with a view to finding ideas. If they aren’t, buy them or find them in a library. In addition to books, libraries usually keep copies of national and foreign magazines and newspapers, plus reports and academic journals.
Books can provide ideas because they are likely to have been researched over a long period of time and authors will have dug out interesting stories on a wide variety of issues.
For example, if the history of a shipwreck off the coast of your country had been uncovered in a new book, you could interview the author for a feature. You could also talk to the team of divers who uncovered the secrets of the wreck, and even seek out descendants of any survivors of the disaster.
Magazines may focus on subjects as diverse as economics and politics or fashion and beauty. They might be glossy, national publications or stapled, community-based pamphlet-style magazines. They are useful background reading.
By using lateral-thinking skills, you will find a whole range of ideas to develop and adapt. For example, women all over the world enjoy buying clothes and looking their best. If your newspaper has a feature page which is geared towards fashion and beauty, magazines will help you spot trends to pass on to your readers.
Ideas from newspapers: Advertisements
Although you are more likely to find feature ideas from news stories, there are other sections of a newspaper which will give you inspiration. Reading the advertisements often sparks the imagination.
Here’s an example: You notice that a number of shops are advertising cut-price sales at an unusual time of the year. When you think about it, you wonder whether people are short of cash, causing a down-turn in trade. You telephone a couple of shop managers who confirm that their profits are suffering and that they are trying to boost trade by offering bargains.
Think about what feature ideas you might get from these advertisements and write them down before going onto the next page to see how your ideas match ours.
Contacts
When you have read all your newspapers, magazines and useful websites, listened to the radio and watched TV, yet find yourself still struggling for a good idea, what can you do next? Pick up the telephone and start talking to some real people!
From the outset of their careers every journalist should have established a contacts book or file. Each time you meet someone new, carry out an interview or find out background information, record the details in your book or on your computer file. The file should be organised in an alphabetical system, so that the data is easy to retrieve.
Enter the full name of the contact, their occupation, their home and business addresses and all phone numbers. If the person is not someone whose name you are likely to recall easily, but they have helped you with their expertise on business issues, for instance, cross-reference their entry under ‘business’ too.
Your contacts book should be jealously guarded. People give you their private phone numbers and details because they trust you. Some people lead very private lives and do not want to be pestered by constant phone calls. Don’t leave your book lying around for others to use.
If you treat them courteously, contacts become one of the best sources of new ideas and information because they multiply. You may have 100 contacts and each one of those 100 will have 100. The numbers start to build dramatically.
On days when it is difficult to find inspiration, make a few random calls to people in your book. Ask them what is happening. Are they doing anything new? Have they heard information about anything in general?
This is hugely useful when you write for a specialist feature section, like health, for instance, since your contacts will work and socialise with many hundreds more in that field, giving you the best chance of a scoop.
Ideas File
If budding authors had money for every plot they have thought up for a brilliant novel in the middle of the night, but failed to write down, they might all be rich. It is the same with features.
When an idea occurs to you, write it down that instant. You can be sure you will not remember it if you leave it to chance.
Keep the ideas in one notebook or one computer file, so that you can browse through it from time to time. The idea may not be useful immediately, but something may happen in the future to trigger its use.
Organised journalists will take their ideas file one step further by filing away relevant newspaper and magazine cuttings, press releases, emails and website printouts in folders with each idea.
Chances are that if you get excited by an idea – and so do the people around you – then your readers will too.
PR Departments
Public Relations or Press Relations departments in government organisations and businesses are staffed by people who have a three-way function in life.
These PR departments will set up interviews and supply background information for your features, which is useful and saves you time.
The same staff will also ‘sell’ you a story. They will telephone, email and send you press releases. They will also invite you to events to celebrate the launch of new products or premises, or policies.
It is important to realise when you are simply being sold an advert and when there is a real story worth printing. There is sometimes a fine dividing line between the two. You must decide whether there is a story worthy of public attention or whether it would be giving a product or organisation free publicity by mentioning it. Decide too whether you need to question the basis of the PR department’s story.
Press Releases
Where the information is factual and interesting, press releases can be a useful source of news. However, the content is more usually bland and worthless corporate puffery, dressed up as interesting editorial.
Press Conferences
The journalist should be selective about which conferences are covered and which information is reported. Sometimes they are vital; other times irrelevant.
If it’s boring, leave and go and find a real story.
There are plenty of other things happening in the world!
Summary
Ideas
Ideas are not difficult to conceive if you open your mind to the possibility that they can come from all around you. Be alert and train your powers of observation. Start to question everything that you see. Ask yourself how, what, where, who, when and why? You will start to look at the world in a different light. But when you are thinking of ideas, don’t select only the ones that appeal to you. Writing features is not a self-indulgent pastime. Think of your readers. Are they likely to buy your newspaper to read the feature you are planning?
Newspapers Both your own, and other people’s newspapers are a constant source of features ideas. Read news stories to look for missed or new angles. Read advertisements and look through the What’s On diary of events.
Magazines, books and other publications Read through magazines to spot trends and features that might adapt for a newspaper readership. Books often produce good story angles, particularly if they focus on real-life events.
The Internet The World Wide Web is an invaluable sources of information. But not all of the information contained in it is reliable. When in doubt, cross-check with another source.
TV and Radio Both television and radio are popular worldwide since satellite technology made them more accessible. If your readers are watching TV, it is useful to know what they are likely to view. Features can include interview with personalities from TV or spin-offs from documentary and factual programmes
Contacts There is no better source of ideas that are likely to produce exclusive material than your own contacts. Every journalist should cultivate contacts from the moment they start in the job. Keep a book or a file with the personal details of everyone interesting you meet or interview.
Ideas File The world is full of people who had a brilliant idea in the middle of the night, but forgot to write it down. Organised journalists jot down ideas for features immediately. Even better, they create files, with cuttings from newspapers and magazines, printouts from the internet, emails and other relevant background information.
PR Departments These will try very hard to ‘sell’ you an idea for a feature. The more space they gain for their client, without having to pay advertising charges, the happier the client becomes. Although good PR departments do come up with well-targeted ideas, beware that you are not being duped into carrying advertising material. Remain objective.
Diary Events All newspapers keep a diary in which to record the dates, times and places of future events. These may include visits by government ministers, major criminal trials, protest meetings, sporting events etc. Writers will find it useful to browse through this list, making a note of events that might lend themselves to feature treatment.
When you are lucky, an idea can sometimes find you. But more often you have to search for ideas. This sounds difficult, but it doesn’t have to be. Every writer has their own way of developing ideas. The longer you work for a particular newspaper, the more attuned you will become to the type of ideas that will interest your readers.
By cultivating an alert mind and training your powers of observation, you will acquire the skill of spotting suitable material. Wherever you are and whatever you are doing, think about every person, every experience and every event in terms of a potential story. Talk to people. Be interested in new subjects. There are feature ideas everywhere. It’s just a case of realising them. When you find them, write them down.
People relate to a wide range of subjects. Many are common to everyone, including relationships and emotional issues, work, money, family, health, education, self-improvement, local and community issues, children, transport…..The list is endless. The only limits are your imagination and your ability to make an idea relevant
Your own eyes and ears
Reporters have a special duty to keep looking for the next story. But everyone who works for a news organisation should be feeding the news machine with stories: things they’ve seen and heard for themselves. The staff are first resource of newsgathering.
The Emergency Services
Newsrooms should have systems in place to make sure they learn quickly about anything of interest, by contacting the emergency services frequently. It is advisable to have a list of the main telephone numbers in a prominent position in the newsroom, and a schedule for calling them.
Contacts
Contacts are the people who provide information to a reporter regularly. They may be official or non-official. Every journalist should keep a list of these people and their contact details – telephone numbers, e-mail, address and so on. They should also try to find out people’s private home and mobile telephone numbers, so they can call them out of hours – or just out of the office, where it may be difficult for the person to speak freely.
Readers, Listeners, Viewers
Encourage your listeners, viewers or readers to call in with potential stories and help them make the news. But always double check any information they provide. They are not journalists and may have misinterpreted an incident.
Eyewitnesses
Ordinary people who see extraordinary things provide a sense of immediacy and a human touch of colour to the facts. However, they may be in a state of shock - and are often unreliable as far as hard facts are concerned.
News Agencies
News agencies are companies which provide news to a number of outlets for a fee. Stories used to be delivered via a telegraph wire to a printer in the newsroom, hence the alternative name wires service.
The Internet
The World Wide Web is an invaluable and unprecedented tool for journalists. Never before have we had so much information at our fingertips.
Search engines are useful in helping you to unearth masses of information on the subject you are researching. And, of course, you can remain instantly up to date on current affairs by using reputable international news sites, such as the BBC.
There is, however, a downside. The internet throws up so much information that it can take valuable hours to sift through the mass of data to find what you need. And not all internet content is reliable. Pick and choose your sites carefully, cross-checking your facts with other information sources when you are in doubt.
In general, however, looking for feature ideas on the internet can be far more convenient than any other method of research. Many newspapers and magazines publish their own websites.
As well as the most familiar aspect of the internet, the world-wide web (WWW), the collection of millions of pages of text, pictures and often sound and video, there are groups discussing thousands of subjects. They are all a potentially rich source of information and contacts. Official web sites – of companies, organisations and government departments – are an excellent source of facts. Unofficial web sites are a great source of gossip and rumour. They are notoriously unreliable.
The Diary
When information is received about events that are happening in the future, this should be written into a diary so that those working on the day are aware of it.
Files
Documents that relate to a future date should be stored in a file until the relevant day. Most newsrooms find it useful to keep a set of folders numbered 1 to 31 for each day of the month, and another set for each month. At the start of each month, the contents are transferred into the day files.
Another file, called the futures folder, can be kept for ideas which are not related to a specific date. When it is quiet, a reporter can look through the folder for ideas that might work up into a story.
Another type of file is the archive or cuttings file, consisting of newspaper cuttings and past scripts relating to ongoing stories and major events. It is a vital reference and a continuing record of events, and itself a source of information.
Further afield
There will surely be a national or international story that you could find a local angle on. This is called ‘localising’ the story.
The Past
You can also revisit one of your major recent stories that has gone a little quiet. What has happened while everyone’s attention was elsewhere?
Other media
Ideas from newspapers
When you read each edition of any newspaper, including your own, ideas for features should leap out at you from almost every page, provided you think laterally and allow your imagination to wander a little.
Let’s start with news stories, which can provide a wealth of feature ideas. Read the news with a feature journalist’s eye. Think about the story and the people who are quoted. Is there a wider issue that needs to be discussed? Is there an interesting personality who emerges from a news story and is worthy of a feature in their own right? Is there an element missing from the news story, one which could be expanded into a feature? And the most important question of all – will your readers be interested in it?
Television and Radio
The world continues to shrink as the internet and satellite broadcasting bring people on different continents in instant contact with information and news reports of events as they unfold.
If your readers have access to television and radio, you should keep a keen eye on the content they are watching. It is forming an additional agenda in their lives, of which the newspaper needs to be aware.
People who appear on TV become popular with your readers. These personalities are useful to interview for features. Television and radio also produce documentaries, which are the elongated versions of newspaper features. Programmes such as these can fuel new ideas.
Other printed material – books and magazines
If books and magazines are sent into your office, make a point of reading them, with a view to finding ideas. If they aren’t, buy them or find them in a library. In addition to books, libraries usually keep copies of national and foreign magazines and newspapers, plus reports and academic journals.
Books can provide ideas because they are likely to have been researched over a long period of time and authors will have dug out interesting stories on a wide variety of issues.
For example, if the history of a shipwreck off the coast of your country had been uncovered in a new book, you could interview the author for a feature. You could also talk to the team of divers who uncovered the secrets of the wreck, and even seek out descendants of any survivors of the disaster.
Magazines may focus on subjects as diverse as economics and politics or fashion and beauty. They might be glossy, national publications or stapled, community-based pamphlet-style magazines. They are useful background reading.
By using lateral-thinking skills, you will find a whole range of ideas to develop and adapt. For example, women all over the world enjoy buying clothes and looking their best. If your newspaper has a feature page which is geared towards fashion and beauty, magazines will help you spot trends to pass on to your readers.
Ideas from newspapers: Advertisements
Although you are more likely to find feature ideas from news stories, there are other sections of a newspaper which will give you inspiration. Reading the advertisements often sparks the imagination.
Here’s an example: You notice that a number of shops are advertising cut-price sales at an unusual time of the year. When you think about it, you wonder whether people are short of cash, causing a down-turn in trade. You telephone a couple of shop managers who confirm that their profits are suffering and that they are trying to boost trade by offering bargains.
Think about what feature ideas you might get from these advertisements and write them down before going onto the next page to see how your ideas match ours.
Contacts
When you have read all your newspapers, magazines and useful websites, listened to the radio and watched TV, yet find yourself still struggling for a good idea, what can you do next? Pick up the telephone and start talking to some real people!
From the outset of their careers every journalist should have established a contacts book or file. Each time you meet someone new, carry out an interview or find out background information, record the details in your book or on your computer file. The file should be organised in an alphabetical system, so that the data is easy to retrieve.
Enter the full name of the contact, their occupation, their home and business addresses and all phone numbers. If the person is not someone whose name you are likely to recall easily, but they have helped you with their expertise on business issues, for instance, cross-reference their entry under ‘business’ too.
Your contacts book should be jealously guarded. People give you their private phone numbers and details because they trust you. Some people lead very private lives and do not want to be pestered by constant phone calls. Don’t leave your book lying around for others to use.
If you treat them courteously, contacts become one of the best sources of new ideas and information because they multiply. You may have 100 contacts and each one of those 100 will have 100. The numbers start to build dramatically.
On days when it is difficult to find inspiration, make a few random calls to people in your book. Ask them what is happening. Are they doing anything new? Have they heard information about anything in general?
This is hugely useful when you write for a specialist feature section, like health, for instance, since your contacts will work and socialise with many hundreds more in that field, giving you the best chance of a scoop.
Ideas File
If budding authors had money for every plot they have thought up for a brilliant novel in the middle of the night, but failed to write down, they might all be rich. It is the same with features.
When an idea occurs to you, write it down that instant. You can be sure you will not remember it if you leave it to chance.
Keep the ideas in one notebook or one computer file, so that you can browse through it from time to time. The idea may not be useful immediately, but something may happen in the future to trigger its use.
Organised journalists will take their ideas file one step further by filing away relevant newspaper and magazine cuttings, press releases, emails and website printouts in folders with each idea.
Chances are that if you get excited by an idea – and so do the people around you – then your readers will too.
PR Departments
Public Relations or Press Relations departments in government organisations and businesses are staffed by people who have a three-way function in life.
These PR departments will set up interviews and supply background information for your features, which is useful and saves you time.
The same staff will also ‘sell’ you a story. They will telephone, email and send you press releases. They will also invite you to events to celebrate the launch of new products or premises, or policies.
It is important to realise when you are simply being sold an advert and when there is a real story worth printing. There is sometimes a fine dividing line between the two. You must decide whether there is a story worthy of public attention or whether it would be giving a product or organisation free publicity by mentioning it. Decide too whether you need to question the basis of the PR department’s story.
Press Releases
Where the information is factual and interesting, press releases can be a useful source of news. However, the content is more usually bland and worthless corporate puffery, dressed up as interesting editorial.
Press Conferences
The journalist should be selective about which conferences are covered and which information is reported. Sometimes they are vital; other times irrelevant.
If it’s boring, leave and go and find a real story.
There are plenty of other things happening in the world!
Summary
Ideas
Ideas are not difficult to conceive if you open your mind to the possibility that they can come from all around you. Be alert and train your powers of observation. Start to question everything that you see. Ask yourself how, what, where, who, when and why? You will start to look at the world in a different light. But when you are thinking of ideas, don’t select only the ones that appeal to you. Writing features is not a self-indulgent pastime. Think of your readers. Are they likely to buy your newspaper to read the feature you are planning?
Newspapers Both your own, and other people’s newspapers are a constant source of features ideas. Read news stories to look for missed or new angles. Read advertisements and look through the What’s On diary of events.
Magazines, books and other publications Read through magazines to spot trends and features that might adapt for a newspaper readership. Books often produce good story angles, particularly if they focus on real-life events.
The Internet The World Wide Web is an invaluable sources of information. But not all of the information contained in it is reliable. When in doubt, cross-check with another source.
TV and Radio Both television and radio are popular worldwide since satellite technology made them more accessible. If your readers are watching TV, it is useful to know what they are likely to view. Features can include interview with personalities from TV or spin-offs from documentary and factual programmes
Contacts There is no better source of ideas that are likely to produce exclusive material than your own contacts. Every journalist should cultivate contacts from the moment they start in the job. Keep a book or a file with the personal details of everyone interesting you meet or interview.
Ideas File The world is full of people who had a brilliant idea in the middle of the night, but forgot to write it down. Organised journalists jot down ideas for features immediately. Even better, they create files, with cuttings from newspapers and magazines, printouts from the internet, emails and other relevant background information.
PR Departments These will try very hard to ‘sell’ you an idea for a feature. The more space they gain for their client, without having to pay advertising charges, the happier the client becomes. Although good PR departments do come up with well-targeted ideas, beware that you are not being duped into carrying advertising material. Remain objective.
Diary Events All newspapers keep a diary in which to record the dates, times and places of future events. These may include visits by government ministers, major criminal trials, protest meetings, sporting events etc. Writers will find it useful to browse through this list, making a note of events that might lend themselves to feature treatment.
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